Saturday, 25 July 2009

चलो कि हौसला बुलंद है

हम सभी अपनी ज़िन्दगी के लिए कुछ सोचते हैं तय करते हैं, एक ऐसे रास्ते पर चलना शुरू करते हैं जहाँ यकीन होता है की आखिरकार मंजिल मिलेगी ही. पर उस रास्ते पर चलते हुए हम भूल जाते हैं की ज़िन्दगी ज़रूरी नहीं वैसे ही चले जैसे हम सोचते हैं , कोई ज़रूरी नहीं हम ज़िन्दगी को जैसे लेते हैं ज़िन्दगी भी हमे वैसे ही ले. कई बार आगे बढ़ने की होड़ में हम खुद को ही भूलने लगते हैं, ज़िन्दगी की उलझनों में यूँ फसते हैं की बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है मंजिल तक पहुँचने के लिए जी तोड़ मेहनत करते हैं कोशिश करते हैं लेकिन जब मंजिल करीब दिखाई पड़ती है तो होश आता है की हम खुद को तो कबका खो चुके हैं अब मंजिल पर जाएँ तो कैसे? न पैरों में जान बाक़ी है न होसलों में उड़ान, न सोच में मजबूती है ना दिल में सुकून...मगर फिर भी ज़िन्दगी चलने का नाम है, तोह बस उठिए और चलना शुरू करिए फिर से वही जोश वही जूनून खुद में भरिये क्यूंकि अगर आप खुद को हौसला नहीं देंगे तो और कोई ही आपके साथ नहीं खड़ा होगा, अगर आप खुद को प्यार नहीं करेंगे तो कोई और भी आप को प्यार नहीं करेगा.