Wednesday, 3 March 2010

मैं मुसलमान हूँ

मेरा जन्म हिंदुस्तान में हुआ है यहीं पली बड़ी हूँ अपने मुल्क से बेहद प्यार है. जब छोटी थी तो स्कूल में जब भी किसी क्लास में पाकिस्तान के बारे में ज़िक्र होता तो सब मेरी तरफ देखने लगते. मुझे अपने क्लासमेटस पर बेहद गुस्सा आता. उस वक़्त मेरा बच्चा मन यही सोचता जब इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच होता है तब मैं इंडिया के जीतने की दुआएं मांगती हूँ. फिर ऐसा क्यूँ? सब पाकिस्तान का ज़िक्र आते ही मेरी तरफ क्यूँ घूरते हैं.

खैर वो बचपन की बात थी पर अब भी हालात बदले नहीं हैं. मेरे ऑफिस में एक जनाब हैं जिन्हें पाकिस्तान से बेहद नफरत है और वो इस नफरत को भारत के प्रति अपना देशप्रेम मानते हैं. पाकिस्तान से नफरत यानी हिंदुस्तान से देशप्रेम ये फिलोसोफी मुझे आजतक समझ नहीं आई. कहते हैं की दोनों मुल्कों के आम लोगों के दिल में एक दुसरे के लिए प्यार है और हुकूमत अपने फायदे के लिए जंग करती है. मगर असल में दोनों ही मुल्कों के आम लोगों के बीच बेपनाह नफरत है. बंटवारे के वक़्त सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा नहीं बंटा था बल्कि दिल भी बंट गए थे.

मैं नमाज़ नहीं पढ़ती रोज़े नहीं रखती खुद को नास्तिक मानती हूँ पर ऑफिस में एक शिवसेना समर्थक जनाब की बातें सुन कर लग रहा है की मैं खुद को नास्तिक कह कर पल्लू नहीं झाड सकती. नास्तिकता मेरी विचारधारा है पर जन्म से मैं एक मुसलमान हूँ. इस्लामिक परिवेश में पैदा हुई हूँ, माँ बाप बड़ी बहन, खानदान के लोग सब नमाज़ पढ़ते हैं रोज़े भी रखते है पर साथ ही हिंदुस्तान और पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में हिंदुस्तान की जीत पर ख़ुशी मनाते हैं. जब कहीं ब्लास्ट हो तब वो भी उतने ही परेशां या दुखी होते हैं जितना कोई गेंर मुस्लिम. हालही में मेरे एक दोस्त को किसी ने आतंकवादी कहा क्यूंकि कसाब के ऊपर हो रही किसी debate में उन्होंने कहा "कसाब को इतनी जल्दी फांसी नहीं दी जा सकती क्यूंकि पुलिस को कसाब से बहुत कुछ उगलवाना हज़ाहिर सी बात है यही अगर किसी गेंर मुस्लिम ने कहा होता तो उसकी देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं उठता.
ये सब सोच कर आँख में उसी तरह आंसू आ जाते है जिस तरह राष्ट्रगान सुनते हुए जज़्बात में पलकें भीग जाती हैं.

40 comments:

  1. ह्म्म्म.... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट..

    ReplyDelete
  2. यह इस देश की सबसे बड़ी व्यथा है .
    कुछ लोगों के नजरिये के कारण एक समूह शक़ की नजर से देखा जाता है . मुझे ऐसा लगता है की इस बारे में स्तिथ सुधारने के लिए एक भगीरथ प्रयास की जरूरत है .

    ReplyDelete
  3. ये हमारे देश की विडम्बना है कि कुछ ही लोग ऐसे हैं जो कि बुराई कि जड़ हैं और उनके कारण पूरी कौम को बदनाम होना पड़ा है, कहावत है एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है। क्या प्रयास करना है यह तो कौम को ही सोचना होगा और उसके लिये कुछ सक्रिय कार्य करना होगा।

    ReplyDelete
  4. "फौज़िया, हकीकत में अभी भी मुस्लमानों के बारे में बहुत ज़्यादा भ्रांतियाँ फैली पड़ी हैं या फिर फैलाई गई हैं।नेताओं ने उस मध्यम वर्ग को पनपने ही नहीं दिया जो कि समाज को जोड़ने का काम करता है लिहाज़ा ये सब तो होगा ही । और फिर संवाद की कमी भी सबसे बड़ा कारण है
    जब बात ही नहीं होगी तो फिर उल्टे-सीधे अंदाज़े तो लगेंगे ही...."
    amitraghat.blogspot.com

    ReplyDelete
  5. shayad yehi har us bhaarteeya ki kahani hai jo insaniyat se prem karta hai.. wo kis religion se hai isse koi fark nahin padta..

    ReplyDelete
  6. धर्म, जाति आदि के आधार पर अंदाजा लगाना कि अमुक इंसान ऐसा होगा उस इंसान के प्रति और इंसानियत के प्रति अन्याय है. हर धर्म या जाति में हर तरह के लोग होते हैं - सच्चा दर्द बयां करता हुआ सुंदर आलेख.

    ReplyDelete
  7. नमस्कार , बहुत ही बढ़िया पोस्ट लिखी है आपने मैं आपकी भावना और दर्द को समझ सकता हूँ। लेकिन सिर्फ कुछ लोगो की वजह से। ना तो मुसलमान गलत हैं और ना ही हिन्दू। ना ही कुरान गलत है और ना ही कोई हिन्दू ग्रन्थ। गलत है तो सिर्फ सोच।
    धन्यवाद्।
    मेरा ब्लॉग है :http://taarkeshwargiri.blogspot.com

    ReplyDelete
  8. आपके विचार और दर्द से पूरी सहमति है। अपने अनुभव से जानता हूं कि नास्तिक, विद्रोही और प्रगतिशील और हर समुदाय, संगठन, गुट आदि से बचकर चलने वाले के लिए तो ये तक़लीफें कई गुना बढ़ जातीं हैं। मगर मैं आपसे सलाह लेना चाहूंगा कि आखि़र आगे के लिए रास्ता क्या है ? एक तो पुराना तरीका है कि पक्के या अच्छे हिंदू या मुसलमान बनो। मगर मुझे लगता है यह रास्ता हमें किसी राहत देने वाली मंज़िल तक पहुंचा नहीं पाया। कम या ज़्यादा तो होते रहे मगर झगड़े कभी रुक नहीं सके। एक दूसरा रास्ता है जो अपेक्षाकृत बहुत ही कम आज़माया गया है। वो यह है कि हम हिंदू-मुसलमान के लबादे उतार फेंके और सिर्फ इंसान होने की ओर बढ़ चलें।

    ReplyDelete
  9. .
    .
    .
    आदरणीय फौजिया जी,

    आप खुद को नास्तिक मानती हैं और नास्तिक होना अपने आप में एक बहुत बड़ी बहादुरी है...आंसू मत बहाओ...जब कोई गलत-सलत बोले वहीं पर उसे टोक और रोक दो... बी ब्रेव... बहुत कम महिलायें होती हैं आप सीं... May your tribe flourish!

    ReplyDelete
  10. sach sach hai...ye ham s..sab ka dard hai..nice post!

    ReplyDelete
  11. Adaab fauziya ji ....
    bahut achcha mazmoon hai aapka .... jaisa ki aapne byaa kiya aapke office or surrounding me kuch aise mentality ke log rehte hai jo oot patang batein karte hai jinka koi meaning hota ...lekin sach maane to unki bhi galti nahi hai woh bas chand raajneeti ke logo se shikaar hue insaan hai jinke dimaag me nafrat naam ke seed ko uga diya gaya hai .... khair bura lagta hai jab koi in heen bhavnao se hume jaise sachche hum vatni ko dekhta hai ...to mano aisa lagta hai hum insaan hi hai aur kuch aur ...hamari bhi koi vajood or nishaani hai kya ...jo kuch beshtar log aisi nafrat bhari nigaahon se dekhte hai ... insaaniyat ko pehchaano yaaro phir dekho zindagi kitni khushgawaar guzre gi .... kaash yeh baat sabki samajh aajaaye... see my blogs if u get time...
    best rgds
    aleem azmi

    http://aleemazmi.blogspot.com/

    ReplyDelete
  12. chand logon ke aise khayaalat se aap sabko dosh to nahi de sakti. mere achhe mitron mein kayi musalmaan hai. main v nastik hun. kyonki dharm ka funda mujhe samajh nahi aata...

    waise aapne ek sahi mudde ko uthaya hai. bachpan mein main v pakistan ke haarne par Naushad ko chidhaya karta tha. par wo bachpan kee baatein thi. nayi pidhi ke sath ye dwesh-bhaav khatm ho raha hai....

    ReplyDelete
  13. यह इस देश की सबसे बड़ी व्यथा है .
    कुछ लोगों के नजरिये के कारण एक समूह शक़ की नजर से देखा जाता है . मुझे ऐसा लगता है की इस बारे में स्तिथ सुधारने के लिए एक भगीरथ प्रयास की जरूरत है ,

    IS SAMASYA KA SAMADHAN HAI
    HINDU AUR MUSALMAN DONO HI APNE APNE DHARMO KO
    CHHOR KAR INSANIYAT KA DHARM APNA LO

    SAB APNE NAM KE AGE

    BHARTIYA
    BHARATVASI
    INSAN
    PREMI
    DAYALU
    SADBHAVI

    ADII ADII SURNAME LIKHNA
    SURU KAR DO

    SHIV RATAN GUPTA SADBHAVII
    9414783323

    ReplyDelete
  14. सुरेन्द्र शर्मा की चार लाइन कहना चाहूंगा..

    मंदिर या मस्ज़िद की, या किसी इमारत की,
    माटी तो लगी इसमें भाई अपने भारत की,

    लहू बहा हिन्दु का, अल्लाह शर्मिन्दा रहा,
    मरा मुसलमां तो राम कब ज़िन्दा रहा..

    बिखरे-बिखरे हैं सभी, आओ इक घर में रहे,
    क्या पता तुम ना रहो, क्या पता हम ना रहें...

    फ़ौज़िया, हिन्सु और मुसलमान होना बुरा नहीं है.. पर दिक़्क़त तो ये है कि हम सिर्फ़ यही बन कर रह गये हैं... काश हम इसके अलावा इन्सान भी रहे होते..

    ReplyDelete
  15. आपके संस्मरण/आलेख में बहुसंख्य आबादी का दर्द है.

    दीपक मशाल, संजय ग्रोवर की बात ध्यान देने वाली है.

    जो कोई भी ऐसे विचार या वक्तव्य रखे जिसमे नफरत की बू आती हो, उसे वहीँ जवाब देना चाहिए, प्रेम से समझाया जा सकता है.

    एक बात सब याद रखें, जब घर (देश) ही नहीं होगा तो हम सजायेंगे किसे... अपने देशवासियों जिनमे बहुत से अक्ल के दुश्मन हैं, उनको प्रेमपूर्वक समझाना ही एकमात्र रास्ता है.

    यदि इसे हम सार्वजनिक जीवन का हिस्सा माने और संयमित रहते हुए सुधार कार्य करें तो सुन्दर परिणाम बहुत जल्द देखने को जरुर मिलेंगे.

    आप सबसे संवाद कायम हो रहा है, ये भी तो अच्छी शुरुवात है :)

    ReplyDelete
  16. ye kahna asan hai ki ham apke dard ko samajhte hain. bahut se log jo yahn bhali baten kar rahe hain, kaii doosrei posts par saampradaayik jahar ugal chuke hain. aise logon ke bayan dekhkar to yh kahte bhi dar lagta hai ki main apka dard samjhta hoon. desh ke dushmanon ki ban aayi hai aur ve deshbhakti ke certificate jari karte hain.

    ReplyDelete
  17. पांचवी कक्षा जब किसी मुस्लिम सहपाठी के होली के पहले दिन रंग लगा दिया तो वो बहुत नाराज हुआ और बताया कि वो अगर होली खेलेगा तो दोजख मैं जायेगा....ये नहीं खेलना हिंदु ही खेलते हैं ऐसा उनके मस्जिद के मौलवी ने उसे बताया था और मकर संका्रांि पर पतंग उङाने पर भी यही सजा मिलने वाली है....बङे हुए तो मुस्लिम मौहल्ले मैं स्थित हमारी विडियो की दुकान पाकिस्तान से क्रिकैट मैच के दिन इसलिए बंद रखनी पङती थी कि पाकिस्तान की जीत पर बजती हुई तालियां पिघले हुए शीशे की भांति कानों मैं पङती थी.....तब पहली बार लगा कि कुछ तो सही नहीं है.....आज भी कोई दुराग्रह नहीं है मुस्लिमों के लिए पर जब बार बार जिहाद और आतंकवाद के नाम पर पूरे देश मैं बम फटते हुए देखता हूं...कश्मीर के पंडितों की हालात देखता हूं ....तो लगता हैं कि आप जैसे चंद लोग ही क्यों ये सब कहते हैं....क्यों नहीं पूरा समाज उठकर ये कहता हैं कि हां मैं मुसलमान हूं....ये हिंदुस्तान कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक है....कश्मीर हमारा है....खैर आप ने बहुत वाजिब लिखा आपने ...साधुवाद....

    ReplyDelete
  18. दिल से लिखी गयी बात, आपके दर्द ने भी प्रभावित किया

    एक जनाब हैं जिन्हें पाकिस्तान से बेहद नफरत है और वो इस नफरत को भारत के प्रति अपना देशप्रेम मानते हैं.

    इससे बड़ी बात और क्या होगी ?

    यह सब पढ़े लिखे अनपढ़ हैं और इन्हें अपने ज्ञान पर नाज़ हैं, इतराते फिरते हैं यह ठेकेदार...

    आप निराश ना हों, सभी ऐसे नहीं हैं... ऐसे लोगों को तवज्जु ना दें. यही कहूँगा.

    ReplyDelete
  19. फ़ौज़िया जी आप की वेदना समझ सकता हूँ ! आप की इस पोस्ट का जवाब मेरे विगत के एक पोस्ट से मिल जायेगा किशोर अज्वाणी जी के माध्यम से ये सवाल सभी से था ! http://umdasoch.blogspot.com/2010/02/blog-post.html

    ReplyDelete
  20. फौजिया जी ,जो दर्द आपने महसूस किया है ...उसके कारण क बीज बहुत छोटे में लोगों के मन में बो दिए जाते है ,जो पहले एक हिचक फिर असंवेदनशीलता का रूप ले लेता है ,मुझे याद है बचपन में एक मुस्लिम सहपाठी जो बहुत अछि मित्र भी थी उसका लंच शेयर करने को सभी मित्र तैयार नहीं होते थे सारे दिन की दोस्ती उस आधे घंटे में मानो पॉज की स्तिथि में आ जाती थी,....

    ReplyDelete
  21. फौजिया,
    दिल से लिखी गई पोस्ट के लिए दिल से आभार...
    ह और म जब तक हम नहीं बनेंगे, ये सब चलता रहेगा...
    किसी भी इनसान का ख़ून टेस्ट कराके देख लो ए, बी, एबी या ओ ही आएगा...हिंदू, मुसलमां, सिख, ईसाई लिखा हुआ नहीं आएगा...मैं मानता हूं कि जब तक ये सारी पहचान छोड़कर अपनी सिर्फ एक पहचान...भारतीय...नहीं बनाएंगे, दुनिया में आगे नहीं बढ़ जाएंगे...

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  22. आपसे सहानुभुति प्रकट करता हूँ. भारत सबका है. अगर हिन्दु नफरत करते तो मुस्लिम वैसे ही गायब हो जाते जैसे पाकिस्तान और हमारे कश्मीर से हिन्दु. अतः रोना बन्द करें और सबसे पहले अपनी कौम के लोगो से शिकायत करें. आज भी वे पटाखे कानों में गुजँते है जो पाकिस्तान की जीत पर फोड़े जाते थे.

    जय हिन्द!

    ReplyDelete
  23. आप जैसे नास्तिक और गैरइस्लामिक नजरिये के और कितने मुसलमान हैं ?
    आप क्यों फजीहत मोल ले रही हैं -तसलीमा की कितनी बुरी गत हुयी है !

    ReplyDelete
  24. ek dabi hui chingari si aapki kalam hai ....sirf dharmsthan me jaane par astik ya nastik nahin hote ...bina koi pehchan ke ek insaan ko dusara insaan madad kar paye to vahi insaaniyat ka dharm hi sabse bada hota hai ...

    ReplyDelete
  25. ये नहीं कहुंगा कि दुखती रग पर हाथ रख दिया, हां ये भी नहीं कहुंगा कि मैं आपके दर्द को समझ सकता हुं ।
    कैसा दर्द और कैसी दुखती रग । लिखे को पोढा । ऐसी बातें आये दिन सुनने को भी मिल जाती हैं । ये सब सिवाय संकुचित सोच के कुछ नहीं है । ऐसे लो आपको हर धर्म और जात में मिल जायेंगे ।
    धर्म से ही नफ़रत नहीं करते ये । आपने सुना नहीं है ये चमार है, डोम है, ये मुसुहर है । क्या बीतता होगा उनपर ।
    जहां भी ऐसे अध-पागल लोग मिलते हैं, मुंह-तोड़ जबाव दिजिये उन्हें । थोड़ी सी भी गुंजाईश हो तो उनकी औकात भी लगे हाथ बताती रहें ।
    लीक से हट कर चलना शुरु किया है तो तकलीफ़ तो होगी ही ।
    आल इज़ वेल....!

    ReplyDelete
  26. मेरी इस कविता में कहीं ना कहीं आपका दर्द उजागर हो रहा है...
    'ये क्या हो रहा है !'
    न जाने ये क्या हो रहा है
    हर कोई संवेदनाएं खो रहा है
    सब हो गए हैं भावशून्य
    मानवता गहरी नींद में सो रहा है।।

    इंसानों में परस्पर
    तलवार टकरा रहे हैं
    राम और अल्ला में
    लोग बांटे जा रहे हैं।।

    हर ओर है
    रक्त रंजित मंज़र
    धर्म की तलवार से
    लोग काटे जा रहे हैं।।

    लोगों में गुम है
    चेतना और ताकत
    अब खोने लगे हैं
    इंसान अपनी इंसानियत।।
    सौरभ कुणाल
    voi news

    ReplyDelete
  27. samajh nahi aata ki iase logon se kaise nipaTa jaye. aaj kal main apane gaun men hun. roj raat ko ek do ghanTe ki baat chit men teen chaar log thik use tarah vyvahaar karate mil jaate hain jaise is desh kaa har muslamna laaden ho.
    sab ko aatankvaadi samajhne vaalon me mere parivaar ke ek sadasy bhi hani.
    parson raat baat karate hue uanaki aankho me jo gussa ,maine dekha to dar gaya.
    aisa laga ki ek hindu aatakvadi ho gaya.
    lekin main yahi chahata hun ki apane aas paas vaalon ko in maslon par achChi se achhi janakaari mai dene ki koshish karata hun.
    tarak se baar karana chahata hun.
    haalat badalne chahiyeh.

    ReplyDelete
  28. फौजिया जी आपकी बातें दुरुस्त हैं..हम बचपन में जो समाज देख रहे हैं शहरों में वो भी अब बदल गया है....हम सब कुछ हैं बस भारतीय नहीं हो पा रहे.... न होने दिया जाता है..हर ज्यादती को धर्म पर थोप देते हैं....बाहर से आकर बसे लोग तो हिन्दुस्तानी हो गए..पर भारतीय खून बाहर का होता जा रहा है....जिन्ना के दादा हिंदु ही थे.....अब सवाल ये है कि सदियों पुरानी गलतियों को क्या अब ठीक करने के चक्कर में आज बर्बाद कर दें क्या?......दोनो तरफ के नेता यही करते हैं..करगिन में बहे खून मैं कौन सा खून धार्मिक था कोई बताएगा..??????

    ReplyDelete
  29. KOEE BAHUT BADAA BADLAAV NAHI HONE WAALAA IN BAATON SE... KI HAM BHAARTIYAA HO JAAYEN, HINDU-MUSALMAAN NAA RAHEN...

    TAB... INDIA-AMERICA-BRITAN AUR BAAQI DESHON KEE COMMUNITY BANEGI AUR UNPAR VIVAAD HOGAA...

    ZARURAT DHARM-NIRPEKSHA BANNE KI NAHEEN... ZARURAT TO RAASHTRA-NIRPEKSH BANNE KEE HAI...

    ReplyDelete
  30. फ़ौज़िया,

    कल्पना करो ऐसे देश की जहा, मैं सोचु के मुझे आज कैसे आगे बड़ना है, जहा मेरी एनर्जी लगे अपने आप को और उचा उठाने मे, जहा मैं और संपन्न और खुश रहने के बारे मे सोचु और मेरा जो मन करे वही करू, ना की मेरी आज की स्थिति का दोष दूसरो पर थोपु. धर्म ने हमे नही बनाया हमने धर्म को बनाया है, और जिन इंसानो ने धर्म के नियम बनाए है, वो भी मेरी और तुम्हारी तरह इंसान ही थे, हर व्यक्ति को धर्म के नियमो को अपने तराजू पेर तोलना चाहिए फिर मानना है या नही ये आप की मर्ज़ी. बेशक हर व्यक्ति को इन्ही सोच से चलना चाहिए ना की अपनी बुद्धि को दूसरो के हाथो मे गिरवी देना चाहिए भले ही वो हमारे पूर्वज हो या किसी मंदिर के पुजारी या किसी मस्जिद के मौलवी.

    ReplyDelete
  31. main aapko bar bar daad deta hun

    ReplyDelete
  32. Kabhi likha tha
    Is Ram aur Rahim ke naamo ki ladai mein yaaro
    Ek naam admi ka bhi tha bechara saheed ho gaya
    Apne likha us se sehmat hoon.Kise sooch ko badalne ke liye khule dil wale Samaj ki zarurat hoti hai.Woh hi desh vikas kar rahe hain jahan religion koi mudda hi nahi hai. Unfortunately Indo-Pak mein sari soch hi religion per tiki hue hai.Currupt and do nothing NETA devide kerke maze mein hain.Nobody (bheed)wants to hear a sane voice Harhar/allahoakber ka nara lagao .Bekoof bandaron(JANTA) ko ladao aur vote luto.Abto safedposh jati ke bhi hisse kar chuke hain

    ReplyDelete
  33. In the root of increasing terrorist activities in every country and every continent, the so called the people of islamik fath are found involved in the name of jihad. We have to redefine the Islam by removing faulty teachings.

    ReplyDelete