Friday, 21 January 2011

सोचा था


मेरी ज़िन्दगी
किसी के इर्द-गिर्द
नहीं बीतेगी
सोचा था,
किसी का
अनकहा पहरा
नहीं होगा
सोचा था,
वार पर, हर बार
पलट वार
करुँगी
सोचा था,
बेहिस पत्थर
बेआवाज़ खिलौना
बेसुकूं शख्स
नहीं हो सकती
सोचा था,
ताउम्र सोचा
मगर आज
हकीकत से
मुलाक़ात हुई.

12 comments:

  1. जिसे हम हकीकत समझते हैं वह हकीकत ही हो, जरूरी नहीं!!

    बहरहाल बहुत अच्छी कविता!!

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  2. तुमने कम से कम सोचा तो सही....
    लगी रहो मेरी कवियित्री...

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  3. अच्छी कविता. उम्मीद करते हैं कि आप जैसी तेज लेखिका के चारो तरफ दूर दूर तक कोई कहा या अनकहा पहरा नहीं रहेगा. आमीन!!

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  4. बिना सोचे तो असम्भव ही था। मन फिर हुंकार भरेगा, विचार मत ढलने दीजिये।

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  5. khud ko jitna socha jaye,utni hi uljhan hoti hai.sundar!

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  6. I really enjoyed reading the posts on your blog.

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  7. सुन्दर शब्दों की बेहतरीन शैली ।
    भावाव्यक्ति का अनूठा अन्दाज ।
    बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।

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  8. Aaj socha hai,kal haqiqat me badal sakte ho
    yeh bhi kam nahi dil me tamnna to rakhte ho

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  9. Aaj socha hai,kal haqiqat me badal sakte ho
    yeh bhi kam nahi dil me tamnna to rakhte ho

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  10. बिल्कुल सही कहा. कविता वास्त्विकता के बेहद करीब है.

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