Saturday, 12 February 2011

पटियाला हाऊज़ ’नॉट’ फ़ुल

इस हफ़्ते आप सिनेमा थियटर में फ़िल्म देखना ही चाहते हैं, ॠषि कपूर के फ़ेन हैं और अक्षय को उनकी मशहूर वाहियात हंसी से अलावा भी कुछ समझते हैं तो बेशक देखें.

Strength – संगीत, sensible अक्षय और smooth एडिटिंग. फ़िल्म की शुरुआत शफ़ाकत अली खान की गज़ब आवाज़ से होती है. ’क्रेडिट’ के साथ-साथ चलता खूबसूरत संगीत और अक्षय का इन्ट्रोडक्शन बताता है कि ये फ़िल्म पिछले दो साल में आयी अक्षय कुमार की सभी फ़िल्मों से अलग हैये बात और है किपटियाला हाऊज़बॉलिवुड की बाकी फ़िल्मों से अलग नहीं है). शंकर-एहसान-लॉय का सुर-तालऔर अन्विता दत्त के शब्दों ने मिल कर फ़िल्म के लिए बेहतरीन संगीत तैयार किया है. (पर एल्बम का सबसेमोहक गीतआदत है वोफ़िल्म में मौजूद नहीं है) कहानी में दम ना होने के बावजूद आपपटियाला हाऊज़कोकिस्तों में ही सही पर बर्दाशत कर सकते हैं और इसका श्रय जाता हैएडिटिंगको. (

Loopholes- कहानी और अनुष्का शर्मा. स्क्रिप्ट कमज़ोर है, ॠषि कपूर जैसे कमाल के एक्टर भी अगर घिसी पिटी लाइनें बोलेंगे, तब भी कागज़ का शून्य स्क्रीन पर साफ़ दिखेगा. और फ़िल्म के शुरु होने के १५ मिनट के अंदर अगर आप फ़िल्म का अंत समझ जायें तो अगले ढ़ाई घंटे काटना बेहद झिलाऊ हो जाता है. बेटे और बाप के बीच का प्यार, बेटे के सपने, पिता का अहंकार फिर बेटे की नाफ़र्मानी और अंत में पिता का बेटे को गले लगा लेना. ओह! बेहद फ़िल्मी.

अनुष्का शर्मा भले ही कट्रीना जितनी पॉपुलर ना हों पर उन्हें पसंद करने वाले भी कम नहीं हैं. मगर दीपिका पदुकोन और सोनम कपूर के दौर में जगह बनाने के लिये सिर्फ़ अच्छा दिखना काफ़ी नहीं है. यशराज कैंप से बाहर झांकने के लिये कम से कम अच्छी डायलॉग डिलीवरी तो ज़रूरी ही है और अनुष्का यहीं मार खाती हैं. चेहरे पर प्यारे भाव, आलिशान कॉस्टुम पर मुंह खोला नहीं कि असलियत सामने.

Hit Or Flop- जवाब है ’Flop’. पहली वजह, अक्षय कुमार का ट्रैक रिकोर्ड. दूसरी वजह, निखिल आडवानी का कमज़ोर निर्देशन और तीसरी वजह ’पटियाला हाऊज़’ के सिनेमा तक ना खींच पाने योग्य ’ट्रेलर’. पहले दिन ही थियेटर आधा खाली तो आगे का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

Story:- गुर्तेज सिंह (ॠषि कपूर) लंडन के साउथ हॉल में अपने परीवार के साथ रहते हैं. एक दिन उनके बड़े भाई (प्रेम चोपड़ा) को नस्लवाद हमले में मार दिया जाता है. गुर्तेज पर इसका बहुत प्रभाव पड़ा और वो गोरों से अपने बराबरी का हक पाने की लड़ाई में लग गये. उनके मन में कट्टरवाद से लड़ते हुए खुद कट्टरवादी के रंग आ गये. अब वो अंग्रेज़ों से नफ़रत करते हैं और अपने बेटे को भी यही सिखाते हैं. अक्षय कुमार यानि ’गट्टु’ एक तेज़ गेंदबाज़ है और उसके ख्वाब क्रिकिट से शुरु होकर क्रिकिट पर ही खत्म होते हैं.यहां तक कि उसे इंग्लेंड टीम की तरफ़ से खेलने का मौका मिलता है. पर गुर्तेज को ये मंज़ूर नहीं कि उनका बेटा अंग्रज़ों की तरफ़ से खेले सो वो गट्टु को धमकी देते हैं कि अगर उसने फिर से क्रिकेट के बारे में बात की तो वो अपनी जान दे देंगे. गट्टु जो की एक आदर्श बेटा है ये बात गांठ बांध लेता है. साउथ हॉल का वो घर ’पटियाला हाउज़’ जहां पूरा परिवार रहता है, वहां सभी सपने देखते हैं पर किसी के भी पास सपने पूरे करने और खुद अपने लिये लड़ने की हिम्मत नहीं है. वजह, घर के सबसे बड़े बेटे गट्टु का आदर्श बेटा होना और पिता की हर बात मानना. फिर एक दिन किस्मत पलटी खाती है और गट्टु को अपना ख्वाब पूर करने यानि इंग्लेंड की तरफ़ से खेलने का एक और मौका मिलता है. गट्टु की हिम्मत बढ़ाने के लिये उसके साथ होती है सिमरन (अनुष्का). अब गट्टु किस तरह एक बार फिर खड़ा होता है और अपने पिता के खिलाफ़ जाता है. धीरे-धीरे किस तरह गट्टु की मदद के लिये पूरा ’पटियाला हाउज़’ एकजुट हो जाता है कहानी यही है. फ़िल्म को ’रियलिस्टिक टच’ देने के लिये गेस्ट अपीरियंस में इंगलेंड के पूर्व कप्तान ’नासिर हुसैन’, ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ’एन्ड्रियू सायमंड्स’ के अलावा और भी खिलाड़ी हैं. ब्रिटिश एक्टर अरमान किरमानी ने ’जस्सी’ के छोटे से रोल को काफ़ी अच्छे से निभाया है.’दबंग’ देखने के बाद जिन्हें लगा था कि डिंपल कपाडिया अभिनय भूल गयी हैं उन्हें एहसास होगा कि वो गलत थे. ’दो दुनी चार’ के बाद ॠषि कपूर एक बार फिर बताते हुए कि जब स्क्रीन पर आऊंगा तो वो सिर्फ़ मेरी होगी.

6 comments:

  1. hmmmmmmmmmmmmmmmm sameekshaa to acchhi hai...sach.....!!!

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  2. बहुत अच्छे!! हालांकि आपके चेताने का असर नहीं हो सकता क्योंकि पढ़ने के पहले देख ली थी!! इमानदार समीक्षा है लेकिन मुझे लगा कि डिंपल अभिनय की बजाय ओवर कर रही थीं और ऋषि कपूर गुस्सैल कैरेक्टर की बजाय किसी कॉमेडियन की भूमिका निभाते-से लगे.

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