Tuesday, 22 February 2011

तलाश...

सबके हाथों में
अपने-अपने
माज़ी के टुकड़े हैं,
आज जो
दबा है हथेली में
उसका छोर
तो जाने कब से
पकडे हैं...
उस एक पल
के इंतज़ार
में घंटों
खिडकियों से
झाँका
सड़क पर सड़क
पार की,
वही लम्हा
जो माजी को
हथेली से
छुड़ाएगा,
जो खालीपन के
खौफ से
आगे बढ़ाएगा...
उस एक लम्हे
की तलाश
में
सब लम्हे
सफ़र पर हैं.

13 comments:

  1. तलाश को
    उद्देश्य मत बनाओ,
    न ही इसके बहाने,
    सफ़र ही करो..

    निरुद्देश्य चलो,
    साथ जिसके भी चाहो,
    बस अपने से अलग न होना,
    चलते रहना,
    सोचे-समझे बगैर,
    मन के कहे से...

    फिर देखना,
    बिजली-सी चमकेगी,
    लम्हा मिल जाएगा,
    साफ हो जाएगा सब,
    पानी की तरह,
    ढूंढ़ना बंद कर दो,
    तो मिल जाएगा...

    बहुत अच्छा लिखा है!! कशमकश को शब्दों में कारीगरी से ढाला है.
    उस एक लम्हे की तलाश में,
    सड़क पर सड़क पार की...

    उस एक लम्हे की तलाश में,
    सब लम्हे सफ़र पर हैं... अच्छी पंक्तियां

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  2. maza aagaya.. mazi,haal or mustakbil ko yaad kr, imagination k jawab nhn

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  3. बहुत उम्दा नज़्म.
    THOSE WHO FORGET HISTORY ARE CONDEMNED TO REPEAT IT.
    माजी को भी पकडे रहीये,नए लम्हों की तलाश में सफ़र भी करते रहिये.
    सलाम.

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  4. ग्रेट जॉब फोजिया ,
    मज़ा आ गया, जिस कम मैं दिल लगे वो जरूर करना चाहिए !
    किसी न किसी दिन किसी न किसी तरह आपकी प्रार्थना जरूर पूरी होगी हो सकता हैं आपको एकदम वो ना मिले जो आपने चाहा मगर वो जरूर मिल गया जो अल्लाह आपके लिए बेहतरीन समझता हैं !

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  5. bahut khoob!!! behtari ki taraf ab aap gaamzan hain!! bahan khush raho!

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  6. पर बात वही है फोन नहीं लगता है.

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  7. उस एक लम्हे
    की तलाश
    में
    सब लम्हे
    सफ़र पर हैं

    बहुत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति..

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  8. खालीपन का कारवाँ बढ़ता रहेगा, रोक कर सुस्ता लें।

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  9. भावनात्मक अभिव्यक्ति ! शुभकामनायें आपको !

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