Thursday, 24 February 2011

खुद से परे

चाहते तो
हो मुझे
जानती हूँ,
कवितायेँ
यूँ ही
तो नहीं
गढ़ते रहते...
जुल्फों, आँखों
और खुशबू
के किस्से
झूठ तो नहीं
मढ़ते रहते...
पर
शायद तुम
वाक़िफ नहीं,
खुद से
परे भी
एक खुद है...
जो चिड़चिड़ाती,
झल्लाती, गुस्सेल
है,
जो लम्स से
पिघलती नहीं,
रिश्तों में
बेमेल है...
आज एक झलक
को बेचैन हो,
उस रूप से डर
जाओगे,
इश्क की डाल
से
चंद रोज़ में
उतर आओगे...

15 comments:

  1. कल्पना और वास्तविकता के बीच झूलता मन।

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  2. प्यार तो आत्मिक होता है। जो सारी जिंदगी खत्म नहीे होता। शारीरीक प्यार तो मात्र आकर्षण होता है। वो वेशक खत्म हो जाता है। बेहद ही सुंदर रचना। आभार। अगर वक्त मिले तो कभी हमारी रचनाओं पर भी गौर करें।

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  3. वाह ...बहुत खूब कहा है आपने ।

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  4. बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

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  5. सिर्फ़ ज़ुल्फ़ों, आंखों और खुश्बू के किस्से गढ़ना तो बस ऐसा है कि कोई आशिक हो आपका!! और आशिकी को बहुत गंभीरता से न लें. चाहने और मानने में फ़र्क होता है. जो चाहेगा भी और मानेगा भी.. वो आपके हर रूप में आपके साथ खड़ा होगा. आपके चिड़चिड़ेपन को दूर न कर सका तो कम-अज़-कम उसमें आपके साथ होगा, डरकर भागेगा नहीं!!
    हां अगर अब चाहता है, आशिकी है तो ज़रूर उतर जाएगा इश्क़ की डाल से...

    वैसे कविता अच्छी लगी!! बहुत खूब!! लिखते रहिए.

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  6. जैसी की आपसे उम्मीद की जाती है. एक अच्छी कविता. केवल चेहरे की सुन्दरता को लेकर कसीदे पढ़ना प्यार नहीं हो सकता है.
    सुनदर रचना.

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  7. बहुत अच्छे …बढ़िया है खूब

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  8. आज एक झलक
    को बेचैन हो,
    उस रूप से डर
    जाओगे,
    इश्क की डाल
    से
    चंद रोज़ में
    उतर आओगे...
    बेहद सुंदर रचना

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  9. बहुत ख़ूबसूरत रचना..

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  10. इश्क की डाल से चंद रोज़ में उतर आओगे...
    सही बात है शरीर में कैमि‍क्‍लस असंतुलन के कारण ही आदमी चने के झाड़ पर चढ़ जाता है और जब गि‍रता है तो असलि‍यत मालूम पड़ती है

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  11. bahut umda....alfaaz kaha se laau aapki tareef ke liye

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  12. कृपया बाजू पट्टी में लगे स्वचालित प्लेयर को हटाएं या फिर उसे बाई डिफ़ॉल्ट म्यूट रखें. जैसे ही पेज लोड होता है यह बजने लगता है जो सामान्य ब्राउजिंग में व्यवधान व खीज पैदा करता है.

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  13. yesa hi jikra koi mere baare me b karta hai....bahut hi achha likha h.

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