Sunday, 13 March 2011

हूक-सी उठती है...


रोना नहीं आता
बस
हूक-सी
उठती है...
चीखती नहीं
बस
आह निकलती है...

झिंझोड़ दिया हो
जैसे किसी ने
बांह पकड़कर
कितना
चल सकते हो
मेरी जान अकड़कर...

टूटी इमारतें,
मलबों का ढेर,
निर्मल पानी,
निर्मम पानी,
बेबाक पानी,
बेहिसाब पानी...

बहुत सहने के
बाद,
जैसे भड़की धरती...
दर्द दबाए
दबाए
जैसे तड़पी धरती...

रोना नहीं आता
बस
हूक-सी
उठती है...

12 comments:

  1. रोना नहीं आता
    बस
    हूक-सी
    उठती है...sach hai, bas hook si uthti hai

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  2. ise vatvriksh ke liye bhejiye rasprabha@gmail.com per parichay tasweer blog link ke saath

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  3. बेहतरीन, यही हूक चीर जाती है हृदय को, बिना आवाज़।

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  5. रोना नहीं आता
    बस
    हूक-सी
    उठती है...
    चीखती नहीं
    बस
    आह निकलती है...

    बहुत मर्मस्पर्शी रचना..बहुत सुन्दर

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  6. कुछ बातें,
    कई हरकतें,
    अनेक यादों से गुजरने पर.
    रोना नहीं आता,
    बस हूक उठती है.

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  7. "बहुत सहने के
    बाद,
    जैसे भड़की धरती...
    दर्द दबाए
    दबाए
    जैसे तड़पी धरती..."


    काश !
    सब समझ पाते इस दर्द को
    इस तड़प को
    तो क्यों आता कोई सूनामी ....
    क्यों बहते आँसू
    क्यों तड़पती कोई धरती ........

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  8. मार्मिक और बेहतरीन अभिव्यक्ति!

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  9. निर्मम पानी.....

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  10. बहुत सहने के
    बाद,
    जैसे भड़की धरती...
    दर्द दबाए
    दबाए
    जैसे तड़पी धरती...

    बहुत खूब .
    सलाम.

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  11. कूक नहीं है यह
    जोंक सी चिपटती है।

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  12. जब सर के ऊपर से बहता है पानी... तो जीवनदायिनी नहीं जानलेवा हो जाता है!! उम्दा अभिव्यक्ति - निर्मल पानी, निर्मम पानी, बेबाक पानी, बेहिसाब पानी....

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