Saturday, 19 March 2011

मिलन...


चलो ज़िन्दगी को

रंगों

सा खिलने दें...



काला भी एक

रंग है,

कि

आओ उसे भी

सफ़ेद से गले

मिलने दें...



ये मिलन

ठीक नहीं ना सही,

अश्कों को

फिर भी

लहू में जी भर के

घुलने दें...




14 comments:

  1. ameen fauziya ji.
    काला भी एक
    रंग है,
    कि
    आओ उसे भी
    सफ़ेद से गले
    मिलने दें..

    bahut khoob.

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  2. Tere badan-ki aag-se aankho'n mei'n hai dhanak,
    Apne lahoo-se rang ye paida nahi'n huye.

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  3. अल्फ़ाज़ चुप है..
    अश्क बोल रहे है..
    काला हो या सफ़ेद ..
    ज़िन्दगी में रंग घोल रहे है..

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  4. बेहतरीन पंक्तियाँ।

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  5. aapne kam se kam safed aur kaale ko rang me to shumaar kiya... inhe to koi rang maanne ko taiyaar hi nahi hota...

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  6. behatar najariya.......rangon ko aur holi ko dekhne ka ek alag najariya.

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  7. sach me aisee hi holi ho...jab har rang dikhe..:)

    holi to beet gayee, ek behtareen rachna deekh gayee...badhai..!

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  8. ओह ...अश्कों को लहू में घुलने दें ..गज़ब लिखा है

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  9. achchha hai... lekin ab khushmijaazi ka rang liye koi poem post kijiye..

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  10. छोटे छोटे शब्द रचना - भले लगे.

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  11. अश्कों को

    फिर भी

    लहू में जी भर के

    घुलने दें...

    बेहतरीन पंक्तियाँ !

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  12. वाकई, सुन्दर अभिव्यक्ति है :)

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