Friday, 8 April 2011

चिंगारी का सफ़र

देर सवेर चिंगारी आग में बदलेगी
और
गलियों के लैम्प -पोस्टों को
रौशन करते हुए,
झोपड़ों में किरण
उगाते हुए,
देखते ही देखते
ताज-ओ-तख़्त तक पहुंचेगी...
भीषण आग बन कर
झुलसाएगी सोने का सिंहासन,
पिघलायेगी जंजीरें...
इतनी तपिश होगी
कि बर्फ-सा जमा लहू,
फिर
तैरने लगेगा रगों में...

7 comments:

  1. लहू को दौडना ही चाहिए ...ताज औ तख्त बदलने की ताकत होती है जनता में ..अच्छी प्रस्तुति

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  2. चिंगारी में जब हवा लग गई है तो आग में ज़रूर बदलेगा!! कमाल की कविता!!

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  3. सफर सही दिशा में है,निष्कर्ष सार्थक निकलेगा।

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  4. फौजिया जी! अब वक़्त इंतज़ार का नहीं है .....आइये ! हम सब इमानदारी से अपने कर्तव्यों को पहचानें और स्वयं को भ्रष्टाचार में शामिल होने से रोककर इस हवा को इतना भड़का दें कि चिंगारी आग में बदल जाए .....

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  5. fauzia jee, main hindi me kavita kendrit laghupatrika nikalta hun 'sanket' aap apna address bhejen, taki ank apko bhej sakun, apki kavitaaen prabhaavit karti hain...

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