Friday, 6 May 2011

नहीं चाहिए...

नहीं चाहिए तुम्हारा
सुझाव, दिमाग या हिसाब - किताब
ना ही चाहिए तुम्हारी
समझ, अकल या सही - गलत...
मैं तय कर लूंगी खुद अपने रास्ते,
संभल जाउंगी खुद अपने वास्ते...
गिर पड़ी गर उड़ते- उड़ते
पंख फैलाउंगी फिर हँसते-हँसते...
छलके मोती चुग लूंगी,
दुनिया की ना सुध लूंगी...
जो कमियां मेरी हैं
वो जिम्मेदारियां मेरी हैं...
तुम ना कोशिश करो
सीधी राहें सुझाने की,
ना ही हिम्मत करो
मुझे बचाने की...
तुम चाहते मेरा बचाव हो,
मैं चाहती अपना फैलाव हूँ...
सो
नहीं चाहिए तुम्हारा
सुझाव, दिमाग या हिसाब - किताब

13 comments:

  1. तुम चाहते मेरा बचाव हो,
    मैं चाहती अपना फैलाव हूँ...
    सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  2. मैं तय कर लूंगी खुद अपने रास्ते,
    संभल जाउंगी खुद अपने वास्ते...
    गिर पड़ी गर उड़ते- उड़ते
    पंख फैलाउंगी फिर हँसते-हँसते...

    नारियों ने बार -बार सिद्ध किया है कि उन्हें किसी सहारे kee आवश्यकता नहीं ....उनमें ज़ज्बा है अपने पैरों पर खड़े होने का ....और अपना अच्छा-बुरा सोच कर फैसला करने का .

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  3. अपनी सिकुड़न दूसरे के फैलाव से अधिक विस्तृत होती है।

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  4. तुम चाहते मेरा बचाव हो,
    मैं चाहती अपना फैलाव हूँ...

    पंछी बनू उड़ते फिरूं मस्‍त गगन में ... याद आ गया.
    सुन्‍दर भाव-अभिव्‍यक्ति के लिए धन्‍यवाद.

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  5. bahut sunder kavita hai!!

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  6. बागी रवैये और स्वाधीन भाव का मिश्रण, अच्छा है :)

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  7. बड़े ही हिसाब-किताब से लिखी गई कविता है... उत्कृष्ट...

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  8. bahut hi khubsurat tarikey se likhaa hai
    http://shayaridays.blogspot.com

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  9. fauziya ji aapke poetry bahut achi hai..........

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