Tuesday, 10 May 2011

चल कुछ किताबें जोड़ें...

चल कुछ किताबें जोड़ें

कुछ पन्ने उलटायें

कुछ स्याही बिखेरें

कुछ दवात गिरायें...

चल अब...

कि बहुत हुआ

चूल्हा-चकला, बर्तन-कपड़े

चल कि अब खत्म करे

सिलाई-कढ़ाई, हार-झुमके

सिलाइयां पीछे छोड़े,

क़लम उठायें,

ज़ंजीर उतारें, सिंदूर फेंके

नकाब को मिलकर

आग में झोंके...

पायल अड़े तो उसे भी तोड़ें,

ज़ुल्फ़ फंसे तो उसे भी खोलें,

चल कि अब

बारिश में सड़क किनारे बैठें,

एक छत ढूंढ़ें

एक चादर बिछाये...

कुछ किताबें जोड़ें

कुछ पन्ने उलटायें

कुछ स्याही बिखेरें

कुछ दवात गिरायें...

20 comments:

  1. बहुत खुब.....सुन्दर. वाकई.

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  2. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (12-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. parivartan ki chah,bachpan ko fir se jeene ki kaamna...wah !!! bahut sundar...

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  4. किताबें आपसे इतना कुछ करवा ले . तो लौट चलें उनकी ओर सब छोड़ कर .

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  5. बहुत सुन्दर ...बदलाव की ओर बढते कदम

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  6. बहुत खूब ... समय के साथ बदलता है सोच और कर्म का दायरा ... अच्छी रचना है ..

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  7. प्रिय फ़ौज़िया रियाज़ जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    चल कुछ किताबें जोड़ें...
    और
    नहीं चाहिए...

    दो कविताएं पढ़ी हैं अभी तक आपकी …
    बहुत शानदार लिखती हैं आप ।
    ईमानदारी से कहूं तो मुरीद हो गया आपकी लेखनी का …

    पहली बार आया हूं , लेकिन बार बार आना पड़ेगा अब
    हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  8. किश्वर नाहिद की एक नज़्म याद आ गयी इसे पढ़ कर......

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  9. वो अनकही बचपन की यादें
    आँखों में प्रश्न,मासुम सी बातें
    रेत मे घरोंदे बनाना फिर मिटाना
    बारिश में कागज की नाव चलाना
    वो अनकही बचपन की यादें.....
    बहुत ही अच्छा लिखा आपने, पढ कर मन उदास हो गया, सुबह के पाँच बजने वाले हैं नेट में 6-7 घंटे बैठना सार्थक हो गया ।

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  10. badhiya rachna aur blog dono ke liye meri hardik shubhkamnayen
    sader,
    dr.bhoopendra
    rewa
    mp

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  11. क्या खूब ख्याल है, इस कागज और स्याही का ही तो सब कमाल है..

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  12. चूल्हे की कालिख को स्याही के रूप में बदलते देख अच्छा लगता है...

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  13. बहुत ख़ूब। बहुत उम्दा।

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  14. kabile tarif...bahut khub likha hai aapne...

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  15. बहुत खूब और बहुत सुंदर

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  16. Pehli baar aana hua yahan. Vyakti ko wahi karna chahiye jiske liye wo khud ko sabse upyukt samjhe.
    Jaapki kavita nari ko uske bandhe bandhaye role se mukt karne ko prerit karti hai.

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  17. बहुत ही बढ़िया। सीधा और सादा।

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  18. कितना गहरा लिखती हो तुम फौजिया. कुछ चुम्बकीय आकर्षण है तुम्हारी लेखनी में. तुम्हारी कितनी ही रचनाएँ पढ़ चुकी हूँ सुबह से लेकिन अभी भी मन नहीं भरा.

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