Thursday, 11 August 2011

आईना उलटा


सपने छुए? वो उड़ गए
ख्वाब चूमे? लो फुर गए,
क़दम बढ़ाए
राहों से खुद ही जुड़ गए...

आंसू बाधें? वो बह गए
अश्क रोके? लो गिर पड़े,
दिल में सांस भरी
देखो हंस पड़ी...

कल से भागे? टकरा गए
झूठी हिम्मत? लड़खड़ा गए,
अक्स-ए-आईना उलटा
बेवजह क्यूं शर्मिन्दा हुए...

11 comments:

  1. wowwwww.. superb.. :)

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  2. wowwwwww.. superb.. :)

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  3. फौजिया जी ! आप आती तो देर में हैं पर जब भी आती हैं धमाका कर देती हैं, बहुत अच्छी रचना........ एक-एक पंक्ति अपने में बहुत कुछ कह रही है ....बेहतरीन ...बेहतरीन ......

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  4. Adbhut....:-)

    www.poeticprakash.com

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  5. छूट गया जो, जाने दे।

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