Sunday, 6 November 2011

इन्सान नहीं हैवान

बकरा ईद उन त्योहारों में से है जिनमें जहालत और ज़लालत की हद पार होती है. बकरों-भेड़ों को ऊंचे दामों पर खरीद के लाना अपने घर में बांधना, प्यार करना, पुचकारना और फिर कुछ रोज़ बाद ईद पर अपने आंगन में ही उसे ज़िबह (बलि) कर देना. पूरा आंगन खून से लाल, गर्दन एक तरफ़ पड़ी छटपटा रही होती है और बकरे को खींच कर ऊंचाई पर टांग दिया जाता है. जब जिस्म का सारा खून बह जाता है तब कसाई आ कर उसे ले जाता है और शाम तक उसके छोटे-छोटे खाने लायक टुकड़े कर के घर पहुंचा देता है. रात को खाने में वो जानवर जिसे दो दिन पहले तक बहुत दुलारा जा रहा था मसाले में भुन कर चटकारे ले लेकर खाया जाता है. इस्लाम में बकरा ईद के बारे में ये मान्यता है कि इन्सान को क़ुर्बानी दिये जाने वाले जानवर से जितना लगाव और जुड़ाव होगा क़ुरबानी उतना ही पुण्य दिलायेगी. ऐसा नहीं है कि क़ुर्बानी का चलन सिर्फ़ इस्लाम में है, भारत के कई हिस्सों में मनोकामना पूरी करने के लिये तांत्रिकों के सामने जानवरों यहां तक कि बच्चों की भी बलि दी जाती रही है. मगर फिर भी दोनों ही मसले पूरी तरह से अलग हैं. बकरा ईद पर जो होता है वो खुले आम सीना चौड़ा कर के बेहिसों की तरह होता है. सबसे बड़ी बात ये है कि ज़्यादातर घरों में ये सब इस कदर बेनियाज़ी से होता है कि घर के बच्चे भी जानते हैं उनका प्यारा पालतू बकरा कल खूंटी से बंधने की जगह प्लेट में आ जायेगा.

ऐसे ही बेशर्मी के त्योहारों में से एक है करवा-चौथ. कोई पति अपनी पत्नी से प्यार करता है, उसकी फ़िक्र करता है तो ये कैसे मुमकिन है कि पत्नी दिनभर कुछ खाये पिये ना और पति महोदय आराम से अपनी उम्र बढ़वाते रहें. इसी लिस्ट में छठ और तीज भी शामिल हैं जहां बेटे और भाई के लिये औरत दिन भर भूखी रहती है. ठंड के मौसम में पानी में नंगे पांव घंटों खड़ी रहती है. समाज के कई त्योहार इन्सान से इन्सानियत का लबादा उतारते रहते हैं.

इश्वर के आगे अपनी श्रद्दा साबित करने के लिये जानवर की क़ुरबानी देना ज़रूरी है. मर्द के आगे अपना प्यार साबित करने के लिये भूखा रहना ज़रूरी है. घूमफिर कर बात आती है खुद को या किसी और को तकलीफ़ देने की. ये तो साइकॉलजी भी मानती है कि जानते बूझते खुद को दर्द देना या फिर किसी को चोट पहुंचा कर खुशी मनाना दिमागी बीमारी है.

इन्सान से बड़ा वहशी जानवर कोई नहीं है, अगर आप इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते तो इन्सान के खुशियों भरे त्योहारों, मान्यताओं या फिर खेलों पर नज़र डाल लीजिये. इन्सान अपने फ़ायदे के लिए वक़्त-वक़्त पर कुदरत के तोहफ़ों को उजाड़ता रहा है. चाहे फ़र्नीचर बनाने के लिये पेड़ काटने हों या फ़ैक्ट्रियों के लिये जंगल के जंगल उजाड़ने हों.

अब हमारे खेल ही देख लीजिये कुश्ती या बॉक्सिंग. एक आदमी दूसरे को तब तक पीटेगा जब तक सामने वाला लहुलुहान ना हो जाये. एक के दांत टूटेंगे तो दूसरे की आंख फूटेगी. एक खिलाड़ी दूसरे को उठा कर ज़ोर से ज़मीन पर पटकेगा और भीड़ में जोश भर जायेगा. उस पर सफ़ाई में ये भी कहा जायेगा कि बॉक्सिंग में कैसे मारना है और कैसे नहीं इसके नियम होते हैं. इसीलिए ये खेल ग़ैर-कानूनी नहीं है बल्कि हैवानियत के मेडल भी मिलते हैं. अमरीका में यू.एफ़.सी (अल्टीमेट फ़ाइटिंग चैम्पियनशिप) की मार-काट को भी खेल ही कहा जाता है. यहां तक कि यू.एफ़.सी को खास कर ये कह कर प्रमोट किया जाता है कि इसमें को नियम नहीं. कई बड़े देशों में महंगे टिकट खरीद मां-बाप अपने बच्चों को लेकर ये वहशीपन देखने जाते हैं. इस खेल में भीड़ बस खून देखना चाहती है, शोर में बस यही सुनायी देता है “बहुत अच्छे, मारो, मारो”. एक खिलाड़ी को जब ज़ोर से मुंह पर मुक्का पड़ेगा और उसका जबड़ा टूट जायेगा तो शोर उठेगा “वाह! क्या बात है…किल हिम किल हिम”. स्पेन की बुलफ़ाइटिंग में हज़ारों लोग सांड और आदमी की भिड़ंत देखने जुटते हैं. सब लोग आदमी के ज़िंदा रहने की कामना करते हैं सांड को पहले एक तलवार से ज़ख्मी किया जाता है और फिर जंग शुरू होती है. खेल के आखिर में कोई एक मरता है, अगर आदमी मर जाये तो भीड़ को बड़ा दुख पहुंचता है. खेल को सफल तब माना जाता है जब सांड के खून से मिट्टी सन जाती है और वो मैदान में दम तोड़्ता है.

वैसे तो हम अक्सर ही अपने वहशी होने का सुबूत देते रहे हैं पर हमारे शौक़, त्योहार और मान्यताएं हमारी इन्सानियत की नौटंकी की पोल खोलती रहती है. स्वामी विवेकानंन्द के अनुसार “मज़बूत बनो क्युंकि बलि हमेशा भेड़ या बकरे की दी जाती है, शेर की नहीं” तो हम शेर तो नहीं बने क्युंकि उसके पास ज़िन्दा रहने का और कोई साधन नहीं है, वो मारेगा तभी जीएगा पर हम शौक़, स्वाद और आस्था का विश्वास दिलाने के लिये मारते हैं, भूखा रखते हैं यहां तक कि सिर्फ़ मज़े के लिये किसी को पीट-पीट कर उसका चेहरा सुजा देते हैं.

अगर आप अब भी मानते हैं कि इन्सान न्रम दिल है. तो पिछले दिनों चाइना में हुई घटना को याद कीजिये जहां दो साल की एक बच्ची को सड़क पर मरता हुआ छोड़ दिया गया था. क़रीब अठारह लोग बच्ची के पास से गुज़रे पर किसी ने भी उसे अस्पताल पहुंचाने की ज़हमत नहीं उठाई. एक-दो लोग आंख मूंद कर चलते बनें तो इत्तेफ़ाक मान सकते हैं पर इतने लोग बिना मदद किये गुज़र जायें तो सवाल खुद पर ही उठने लगता है. हमें ज़िन्दगी नहीं खून पसन्द है, हंसी नहीं चीख लुभाती है, सुकून नहीं खौफ़ सुलाता है. हम इन्सान नहीं हैवान हैं.

24 comments:

  1. sach kaha, insaan se badaa wahshi koi nahi. aur 95% jhagde (chhote hon ya bade) ke peechhe isi tatha kathit dharm ke anuyayiyon ka hi haath hota hai. mujhe ye dar hai ki aap ko kaafir n ghoshit kar koi fatwa n de diya jaaye....

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  2. फौजिया ..इंसान के भीतर का हिंसक पशु आज भी ज़िंदा है ..बेहद पसंद आया तुम्हारा आलेख

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  3. पशु-वध और करवा चौथ\छठ पर स्वेच्छा से किये जाने वाले व्रत में समानता कैसे मान सकती हैं आप? मैं बात को धर्म या मजहब से नहीं जोड़ रहा, एक में दूसरे का गला रेता जा रहा है और दूसरे में स्वेच्छा से खुद को तपाया जा रहा है। मेरी पत्नी मेरे मना करने के बावजूद मेरी कुशलता के लिये सारा दिन उपवास रखती है तो मेरे मन में उसके लिये जो भाव आते हैं, उनका कोई मूल्य नहीं है। हाँ, सिर्फ़ धर्म के नाम पर जबरन यदि ऐसे व्रत करवाये जायें तो वह गलत है।
    इंसान के सबसे वहशी जानवर होने की बात से सौ फ़ीसदी सहमत।

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  4. पुराने तेवर में लिखा आपका नया आलेख जिस कडवे सच को नंगा करता है वह वाकई हिला देने वाला है...

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  5. आपकी एक बात से सहमत हूँ...
    निरीह जानवर को दुलार पुचकार कर रखना और शाम ढले चटखारे ले कर अपने उदर में उतार लेना...उसपर से तुर्रा ये कि जानवर को जितने प्यार से रखे और बाद में उसकी कुर्बानी दें तो ज्यादा सबाब मिलता है....कमाल की बात है...!!!
    मैं किसी भी तरह की बलि के विरूद्ध हूँ...
    जहाँ तक करवा चौथ और छठ की बात है...तो मुझे ये बताएँ....ये जो ४० दिन का रमजान होता है वो किस मर्ज़ की दवा है...?
    जिस ख़ुदा को देखा नहीं उसके लिए सारा दिन भूखा-प्यासा रहना...यही नहीं ..इस्लामिक देशों में जो मुस्लिम नहीं हैं उनको भी ज़बरदस्ती पाबंदी में रखना....पब्लिक जगहों में खाना खाने नहीं देना यहाँ तक कि पानी भी नहीं पीने देना...छोटे-छोटे बच्चों तक भी इस नियम का पालन करने के लिए मजबूर करना...अगर किसी ने रास्ते में खाना खा लिया तो उसे पकड़ कर उस पूरे महीने के लिए जेल में डाल देना....उसे क्या कहेंगे..???

    करवा चौथ मैं करती हूँ और अपनी मर्ज़ी से अपने पति के प्रति अपना प्यार, आस्था और विश्वास व्यक्त करने के लिए करती हूँ....भगवान् से उनकी लम्बी उम्र के लिए दुआ करती हूँ...मुझे कोई परेशानी नहीं होती...अपने बच्चों के लिए पूरे मन से दुर्गा अष्टमी करती हूँ...क्यूंकि मैं अपने पति से अपने बच्चों से बे-इन्तेहाँ प्यार करती हूँ...उनके लिए एक दिन भूखा रहना और ईश्वर से प्रार्थना करना मेरी नज़र में इतना बड़ा त्याग नहीं है....उनके लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ...मेरे पति मुझे हमेशा मना करते हैं....लेकिन ये मेरा अपना फैसला होता है...फिर एक दिन भूखा रहना और किसी को जान से ही मार देना दोनों की तुलना किस हिसाब से आप कर रहीं हैं...????
    आप ख़ुद ही कहें..अगर आपका बच्चा बीमार हो जाए तो क्या आपका दिल नहीं करता कि ..या ख़ुदा इसकी सारी तकलीफ मुझे मिल जाए....उसे आप क्या कहेंग ? या फिर जब आप खाना देतीं हैं अपने पति और बच्चों को तो क्या आप सबसे पहले ख़ुद ही खा लेती हैं...नहीं ना...मुझे यकीन है जो बचता होगा सबको देने के बाद आप वहीँ खातीं हैं...क्या आपके पति ने आपसे कह है ऐसा करने..? नहीं ना..!
    आपकी कुर्बानी की बात से इत्तेफाक है..लेकिन करवा-चौथ और छठ जैसे पवित्र पर्वों को इस घ्रिणित कुर्बानी के साथ ना ही जोडें तो अच्छा रहेगा...
    बकिया सब ठीक है...

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  6. सुन्दर लेख. उसी पुराने तेवर में लिपटे शब्द, विचारों में खलबली पैदा करते हुए.

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  7. हर धर्म में बहुत अच्छी अच्छी बातें होती हैं और कई बुराइयाँ भी। फिर चाहे वो हिन्दू धर्म हो , इस्लाम हो या कोई और धर्म । इस्लाम कि बहुत सी बातें इतनी ऊँची हैं कि और धर्मों में भी नहीं मिल्तीं। जहाँ तक पशुवध की बात है तो भारत के कई मंदिरों में तो ये घिनौना काम खुलेआम होता है मगर हाँ इसे त्योहार कि शक्ल दे देना बहुत ही खेदजनक है और ऐसी परम्पराओं के निर्वाह से पहले किसी को खुद से पूछना चाहिए कि क्या कोई पैग़म्बर इस तरह की हिंसा की बात कर सकता होगा ? बक़रीद की कथा के अनुसार हज़रत इब्राहीम ने अपने बेटे की क़ुर्बानी दी मगर उसकी जगह तुम्बा निकला । और जो भी अकीदतमंद इस त्योहार पर कुर्बानी को जायज़ ठहराता है उसे अपने अकीदे पर कायम रहते हुए हज़रत इब्राहीम कि तरह ही अपने बेटे या बेटी कि कुर्बानी देनी चाहिए अगर उसका अकीदा सच्चा हुआ तो वहाँ भी उसे तुम्बा ही मिलना चाहिए ।
    दरअसल ये एक घटना को लेकर चलाई गई बर्बरतापूर्ण परंपरा है जिसके विरुद्ध आपका लिखना बहुत हिम्मत का और सराहना का काम है । इस्लाम के प्रति एक सच्चे और समझदार मुसलमान जैसी ही श्रद्धा रखते हुए मैं ये बताना चाहता हूँ कि कुरान शरीफ में कुछ जगहों पर पशुवध को भयंकर पाप बताया गया है।
    यहाँ पर आपके द्वारा करवा चौथ और , छठ जैसे त्योहारों का उल्लेख प्रासंगिक नहीं लगता । इससे आपकी असल बात हलकी पड़ने लगती है । लेकिन शायद आपने एक बैलेंस बनाने के लिए ये कोशिश की होगी । मगर इनकी सराहना करने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दू धर्म भी भयानक कुरीतियों का शिकार है और अपने बहुस्त्रीगामी पतियों के लिए ऐसे मूर्खतापूर्ण उपवास करने के लिए स्त्रियों को अक्सर बाध्य भी किया जाता है ।
    अगर ऐसे त्योहारों कि जड़ में जाएं तो ऐसी मजबूर स्त्रियाँ मिलेंगी जिन्हें कभी पुरुषवादी समाज ने इस करवाचौथ रूपी कुरीति का बीज बोने के लिए बाध्य किया होगा । पेट फुलाकर ये कहने वाले मर्द कि उनकी पत्नी तो मना करने पर भी जिद करके ये व्रत करती है , ज़रा अपने गिरहबान में झाँक कर भी देखें कि वो अपनी पत्नी कि आयु बढाने के लिए कौन सा उपवास करते आए हैं। यही बात उन कुंद बुद्धि स्त्रियों को भी सोचनी चाहिए जो अपनी आधार हीन हठ धर्मिता को विवेक का जामा पहनाने की जुगत में रहती हैं ।
    अंत में यही कहूँगा कि आपने बहुत हिम्मत करी और करते रहिए । और अपनी तीखी बातों को किसी भय या शिष्टतावश संतुलित करने कि कोशिश मत करिए । क्योंकि सच , कई बार , वाकई बहुत कड़वा होता है । किसी भी धर्म की कुरीतियों को दूर करने के लिए उसकी स्त्रियों का आवाज़ उठाना बेहद ज़रूरी होता है ।

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  8. हम सब साथ हैं, इसी तरह लोगों को जागरुक करते रहो, शायद बदलाव की बयार बह जाये।

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  9. ज्वलंत विषय पर बेबाकी से लिखने के लिये आप बधाई की पात्र हैं। हिंसा किसी भी रूप में सुखकर नहीं होती और फिर सामूहिक हिंसा के बारे में तो सोचकर ही तकलीफ़ होती है। हाँ, खुद उपवास करना और दूसरे की हत्या करने में सचमुच एक बड़ा अंतर है। फिर भी कुल मिलाकर आलेख अच्छा लगा।

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  10. एक बार फ़िर से आपके उठाये मुद्दे की तारीफ़ करते हुये स्पष्ट करता हूँ कि पशु-वध\बलि के बारे में बात करते समय कहीं भी और कैसे भी हिन्दू धर्म को बेनेफ़िट ऑफ़ डाऊट देने की कोशिश नहीं की गई है। बल्कि देखा जाये तो इस कुरीति को बहुत हद तक कम किया जा चुका है, गिने चुने मंदिरों में ही अब ऐसा होता है और यकीनन वहाँ भी यह बंद होगी और इसे कम करने में 'within the circle' प्रोटैस्टर्स का ही रोल है। जो चीज गलत है, वो गलत ही है।
    Mr. Anonymous ने जो कहा है, सब ठीक ही कहा है। अपनी गिरहबान में झाँककर ही अपनी पत्नी से व्रत करने से मना करता हूँ, लेकिन वो मुझे ही डाँट डपटकर चुप करवा देती है और यकीनन वो कुंद बुद्धि नहीं है। वैसे ऐसा आक्षेप लगा जानकर वो व्रत करना बंद कर देगी तो इन साहब का आभार ही मानूँगा:) बात बढ़ाने को कहीं तक भी बढ़ाई जा सकती है, लेकिन और भी गम हैं ..।
    आखिरी पैरा इन्हीं साहब का आभार सहित, "अंत में यही कहूँगा कि आपने बहुत हिम्मत करी और करते रहिए । और अपनी तीखी बातों को किसी भय या शिष्टतावश संतुलित करने कि कोशिश मत करिए । क्योंकि सच , कई बार , वाकई बहुत कड़वा होता है । किसी भी धर्म की कुरीतियों को दूर करने के लिए उसकी स्त्रियों का आवाज़ उठाना बेहद ज़रूरी होता है।"
    एक अच्छे आलेख के लिये बधाई।

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  11. मैं बलि के खिलाफ किंतु व्रत आदि की बलि से तुलना करना गलत है..... बलि में हम हम किसी जानवर को मारते हैं... लेकिन व्रत में हम खुद मरते हैं..... माँ बच्चों के लिये, पत्नी पति के लिये या बहन भाई के लिये व्रत आदि करती है तो वह किसी जानवर की बलि नहिं देती बल्कि खुद कष्ट सहन करती है...... और हाँ जो व्रत रखने की अवस्था में नहीं होतीं या नहीं रखना चाहती उनसे कोई जोर जबरद्स्ती करके व्रत नहीं रखवा सकते....

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  12. @Fauziya Reyaz r u vegetarian or non- vegetarian, reply honestly ..after that i will put my opinion on this post...

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  13. फौज़िया... बाते घुमा फिराकर न करके सीधी सीधी कहने वाली तुम्हारी ये पोस्ट भी बहुत पसंद आई...

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  14. श्रीमान संजय@मो सम कौन? मेरा इरादा किसी को आहत करने का या व्यक्ति विशेष पर आक्षेप लगाने का क़तई नहीं था . मेरी बातें वस्तुतः व्यापक सन्दर्भ में कही गई हैं और मुझमें उस समय क्योंकि उक्त टिप्पणियाँ पढ़के ये विचार उपजे थे तो शब्दों की योजना कुछ ऎसी बन पड़ी कि वे आपको अपनी ओर इंगित लगे .ख़ैर, बुरा लगा हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ . वैसे मेरा मानना है कि कम -अज़- कम एक दिन के कठोर व्रत का अनुभव तो हर व्यक्ति को कर ही लेना चाहिए मगर करवाचौथ या छठ वगैरह पुरुषवादी समाज की उपज है इसमें कोई संदेह नहीं . ध्यान देने योग्य बात ये है कि कोई ऐसा प्रचलित व्रत का त्योहार नज़र नहीं आता जो हिन्दू पुरुष अपनी पत्नी , बेटी , बहन या माँ के मंगल के लिए करता हो . क्यों ना एक पहल ऎसी भी की जाए !:)..... और इन बातों को मैं बहस का मुद्दा भी नहीं मानता क्योंकि अहले नज़र को ग़लतियाँ साफ़-साफ़ दिखा ही करती हैं . मगर आपने जिस सहिष्णुता से मेरी टिप्पणी को लिया और जिस शिष्टता से उस पर अपनी टिपण्णी की, वो सराहनीय है . इससे लगता है कि आप एक खूबसूरत दिल वाले इंसान हैं और अब तो मुझे ये पूरा यकीन हो गया है कि आपकी पत्नी आपके मना करने पर भी ज़बरदस्ती ये व्रत करती होंगी :) . वो भी कुंद बुद्धि नहीं होंगी मगर परम्पराओं का , मान्यताओं का, कामनाओं का , प्रभाव इतना तीव्र होता है की अच्छे अच्छों की बुद्धि कुंद कर दे . हालाँकि आज कल तो ये सब त्योहार तपश्चर्या से ज्यादा फैशन बन गए हैं .
    और अंत में फौज़िया से ये कहना चाहूँगा कि वो इन टिप्पणियों का जवाब भी दें ताकि ये न लगे की बस एक शगूफ़ा छोड़ कर चुप हो गईं . इससे उनका अपना पक्ष भी कमज़ोर होगा . Incredible Gufran साहब की टिप्पणी में पूछा गया सवाल भी बहुत अहम है इसका भी जवाब ज़रूर दें . और अगर हम खुद को कहीं गलत पाएं तो उसे स्वीकार लेने में भी कोई हानि नहीं बल्कि ये किसी व्यक्ति की महानता है .

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  15. pashu bali ke viruddh likhne ke liye hats off!

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  16. अपने इन्द्रिय सुख के लिए किसी निरीह जीव की हत्या किसी भी समाज में क्यों न की जाय निंदनीय ही कही जायेगी.

    बुल फाइटिंग, ऊँट दौड़ ...जैसी निर्मम प्रथाओं का अंत होना चाहिए.

    व्रत एक प्रकार का संकल्प है.....जो स्वेछा से किसी शुभेच्छा के लिए धारण किया जाता है .....यदि इन्हें किसी पर आरोपित किया जाय तो निश्चित ही अधर्म है.

    बकरीद के साथ व्रत का उल्लेख भले ही प्रासंगिक न हो पर फौजिया की भावना की निर्मलता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है.

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  17. ऐसे ही साफ़-साफ़ लिखने से कुछ हो सकता है।
    व्रत हो या सती, सब स्त्रियों के लिए क्यों हैं ?
    सलाम !

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  18. आपके बेबाक विचार अच्छे लगे, परन्तु जानवरों के प्रति निर्दयता की तुलना बोक्सिंग के खेल से करने से ये थोड़े हल्के पड़ते दिखाई देते हैं | प्रथम तो बोक्सिंग कुछ बातों का विशेष ध्यान रखा जाता, जैसे एक विशेष पदार्थ मुक्केबाजों के मुख में डाला जाता है ताकि चोट न लगे | इसके अतिरिक्त इस खेल के अनेक स्वास्थय लाभ भी हैं | एक स्वास्थय सम्बन्धी वेबसाइट के अनुसार:

    1: The Ultimate Workout

    The typical boxing training session stimulates all muscle groups, and provides the perfect combination of aerobic (with oxygen) and anaerobic (short-burst, without oxygen) exercise. Indeed, the boxers' workout is guaranteed to get anyone into the best shape of their lives.
    To perfect the basic boxing skills while developing the stamina to survive three, 3-minute rounds of sparring (actual fighting in a controlled gym-setting to prepare for the real thing), one needs to be supremely conditioned and strong enough to throw powerful punches from Round 1 through Round 3.

    The boxing workout improves every type of physical capacity: strength, power, coordination, aerobic fitness, anaerobic fitness and endurance. Exercises that are emphasized include, heavy bag, speed-ball spring-ball and medicine-ball work, skipping, running, weight-training (calisthenics mainly) and wind-sprints.



    A Twist To Complex Training For Boxing!
    Boxing is a sport that thrives in the ghetto. Many gyms are located in city community centers that lack funding for expensive training devices. These gyms cannot afford Olympic barbell sets or other proprietary tools. Find some ways here ...
    [ Click here to learn more. ]


    Exercises are shortened and combined to form a circuit or performed independently over a longer period. In short, boxing improves reflexes, endurance, flexibility, coordination, speed, power and cardiovascular fitness.
    A sample boxing workout (about one-hour).

    Warm-up: 5 minutes on exercise bike followed by stretching of all major muscle groups.
    Sit-ups with medicine ball: three sets of 25.
    Skipping five sets of two-minutes.
    Five two-minute rounds on heavy bag.
    Three two-minute rounds on the speed-ball.
    Side laterals: three sets of 15.
    Bike: five minutes to cool down.
    Note: All exercises have a 1-minute rest between rounds as per the period given between rounds in an actual boxing match.

    2: Confidence
    Possessing the skills to look after yourself gives you a significant amount of confidence. Contrary to popular belief, boxers typically do not seek confrontation. Their skills and confidence convey an inward belief that there is nothing to prove. If you have nothing to prove, you will be less compelled to prove it.
    However, if boxers needs to protect themselves in a self-defense situation, they will be more adept at finishing things quickly and cleanly, due to heightened confidence levels and skill.

    When someone is confident in the ability to defend themselves physically, this often translates to a psychological benefit of self-contentment and peace of mind.


    3: Stress Relief
    Boxing is the ultimate sport for countering stress, in my view. The combination of strength training and aerobic work provides the best of both worlds in terms of feeling a muscular pump and stimulating the cardiovascular system - both of which enhance psychological well-being.
    After a hard day, hitting the heavy bag for 5-to-6 rounds serves as a tremendous stress release. Boxing (particularly concentrating on the focus mitts) enhances the ability to relax, which helps keep the boxer calm and poised under pressure. In this sense, boxing might help one to manage their life more efficiently.

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  19. अपने पिछले कमेन्ट में एक बात ओर जोड़ना चाहूँगा, बोक्सिंग के खेल में खिलाड़ी स्वयं अपनी इच्छा से जाता है, क्योंकि उसमें उस खेल में प्रतिभा होती है, उसे जोर ज़बरदस्ती से उसमे धकेला नहीं जाता | जो व्यक्ति खेल से जुड़ा होता है वह मार खाने पर भी हैवानियत का अनुभव नहीं करता |

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  20. वैसे भी जो लोग बोक्सिंग, मार्शल आर्ट या कुश्ती का अर्थ मारपीट समझते हैं, उन्हें इन खेलों के बारे में क ख ग भी मालूम नहीं | इन खेलों का उद्देश्य अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करना एवं आत्म रक्षा में निपुण होना है | खेल सीखने वालों को स्वयं पर नियंत्रण रखने के सख्त निर्देश होते हैं तथा अनेक मार्शल आर्ट्स में छात्रों को क्रोध पर नियंत्रण रखने के लिए ध्यान आदि भी सिखाये जाते हैं | साथ ही उन्हें उनके कर्तव्य जैसे किसी निर्बल की रक्षा करना, से भी अवगत कराया जाता है | हाँ, जिन खेलों में मारकाट होता है वह अवश्य अमानवीय हैं |

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  21. This was an incredible post & i loved reading it. Though there are some factual misinterpretation about a festival called "Chhat". This is not a ritual which are meant for women to practice for good health and prosperity of Male members of their family. But it is just a festival where people irrespective of there caste and gender preach Lord Sun. you can say that it is selfish as they worship for well-being not for society. But I dont know, what the devotees aspire for, what encourages them to follow such an arduous practices, if it is world peace or just about there family. But the underlying fact which i want to stress upon is "chhat" puja is not only meant for women as others like "teej" or "karwa-chhauth". Men do practice this puja in same tone as Women. But as Women tends to be more religious they easily outnumber their counterparts.... I will not go in why they are more religious because that will amount to blog not a comment....

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  22. aise vicharo ka jitna swagat karo kam hain jai hind

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