Saturday, 12 January 2013

अन्धेरे के भेद...



उसके जिस्म पर कहीं कोई जला निशान नहीं है जिसे वो अपने मां-बाप को दिखाये. उसका चेहरा भी किसी प्रताड़ित की गयी औरत जैसा सूजा हुआ नहीं रहता. बल्कि उसकी आंखें आज भी बिल्कुल वैसी हैं जैसी स्कूल में थीं… चमकती हुई. वो अपने मजाज़ी खुदा आतिफ़ के खिलाफ़ समाज की अदालत में किसी तरह का कोई सुबूत नहीं जुटा सकती. शादी के कुछ रोज़ बाद जब ज़रीन ने अपनी मां से दबे-छुपे लफ़्ज़ों में खुद पर हर रात गुज़रने वाली तकलीफ़ें बयान करनी चाहीं तो मां ने ये कह कर खामोश कर दिया था “मर्द की मोहब्बत धीरे-धीरे चढ़ती है पगली, कड़वी-कसेली बीतेगी तब मीठा-सौंधा आयेगा.” 

ज़रीन की शादी को दो साल हो चुके हैं लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी मीठा-सौंधा नहीं सुना. बस यही, इस महीने चार सलवार-कमीज़ सिलवाई, कल नये बुन्दे बनवाये या आज ‘बालिका वधु’ में क्या हुआ. अगर वो मेरी बचपन की दोस्त ना होती तो मैं भी उसके घर की नई फ़्रिज और नयी चादरों को देखकर सुकून पा लेती कि ज़रीन खुश है. दुनिया के सामने जान छिड़कने वाला आतिफ़ असल में उसे किस-किस तरह तहस-नहस करता है ये मुझ तक भी ना पहुंचता. शुक्र है मैं उसकी मां नहीं हूं. 

बचपन में ज़रीन जब घर आती थी तो हम सीधा मेरे कमरे में घुस कर दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लेते थे. उस वक्त ये कॉमिक्स पढ़ने या दुपट्टों से साड़ी बांधने के लिये होता था. कुछ सालों बाद दरवाज़े के पीछे वाली सहेलियां इस उधेड़बुन में रहतीं कि फ़लां ज़रीन के घर की बालकनी में रोज़ कागज़ की पर्चियां क्युं फेंकता है. पर अब दरवाज़ा बन्द होने पर ज़रीन ऐसे मुर्झाती है जैसे किसी फूल के मुर्झाने के सीन को फ़ास्ट-फ़ॉर्वड कर दिया गया हो. अभी पिछले हफ़्ते ही कितनी बेबसी से कह रही थी “यार क्या बताऊं, मेरा ज़रा भी दिल नहीं चाहता. बस आफ़त है जो रोज़ रात गुज़रती है” मेरे पूछने पर कि महीने के उन दिनों आतिफ़ का क्या रवैया होता है, उसने बताया “उससे ‘इन्हें’ फ़र्क नहीं पड़ता, मेरे रोकने पर भी नहीं सुनते, हालांकि डॉक्टर मुझे डांट चुकी है, इंफ़ेक्शन हो गया था.” 

आज जब मैंने गुस्से में कहा कि तेरे मुंह में ज़बान नहीं है? चिल्ला नहीं सकती? शोर क्युं नहीं मचा देती? उसकी मनमानी क्युं सहती है? ये तो रेप है! ज़रीन मुझे तंज़ से देखते हुए बोली “ये शादी है, बालकनी में आने वाली पर्चियां नहीं कि जिसका चाहा जवाब दिया और जिसका नहीं चाहा कूड़े में डाल दी. उसका हक है मुझपर, आतिफ़ जैसे चाहे वैसे खुद को हाज़िर करना होगा. अगर नहीं करती तो वो करवाना जानता है. मुझसे दस गुना ज़्यादा ताकत है उसमें. फिर इस्लाम भी तो मर्द से यही कहता है “बीवी तुम्हारी कोई बात ना माने तो पहले उसे समझाओ, ना समझे तो दोबारा समझाओ और फिर भी ना समझे तो बस समझा ही दो 

शायद ज़रीन कल भी आये और बैठते वक्त फिर से तकलीफ़ होने की शिकायत करे. ज़रीन से जब भी मिलती हूं दिल लरज़ जाता है, पूरे जिस्म में झुरझुरी दौड़ जाती है. मैं जानती हूं बन्द दरवाज़े के पीछे मैं उसे कल भी सुनूंगी. फ़र्क होगा कि अब मुझे उस पर पहले से ज़्यादा तरस आयेगा.

ज़रीन मेरे बचपन का साथ है, जो आज हर रोज़ सुबह आईने में संवरती है और देर रात बिस्तर में बिखरती है. अक्सर ये कह कर खुद को बहलाने की कोशिश करती हूं कि उसकी ‘अरेंज्ड मैरिज’ है. पर मेरी इस कोशिश पर वंदना की फोन कॉल पानी फेर देती है. वंदना को तो ज़रीन का साया छू कर भी नहीं गुज़रता. वो कोई सहने, मरने, खटने वाली लड़की नहीं है. ऑफ़िस में कोई उसके सामने ज़बान खोलने से पहले दस दफ़ा सोचता था. वंदना की ‘लव मैरिज’ का लव पहली रात ही उड़न-छू हो गया. कहती है “उमेश वैसे तो बहुत प्यार करता है, बस ‘उस वक्त’ ही उसे कुछ हो जाता है. पर कोई बात नहीं, वैसे भी खींच-तान नोच-खसोट मर्दों पर जंचती है.” 

दिन की रोशनी में ज़रीन और वंदना बेहद मुख्तलिफ़ हैं. सच तो ये है कि आतिफ़ का मौहल्ले वाला जिमखाना, उमेश के शीशे वाली बिल्डिंग के कॉन्फ़रेंस हॉल से कोसों दूर है. पर अन्धेरा सारे भेद मिटा देता है.

11 comments:

  1. लाजवाब... शानदार कहानी... हालांकि पता नहीं क्यों लगा मानो कहानी बीच से कपच दी गई हो... बिल्कुल फिल्मों की तरह... ड्यूरेशन कम करने के लिए।

    ReplyDelete
  2. aksar apko padhta hu.....'shadi' se lekar domestic violence tak...ap jis tarah se mudde laati hain...thts brilliant.

    ReplyDelete
  3. इत्तेफाक की बात है इस देश में ये "जुर्म "की लिस्ट में नहीं है

    कोई कानून" मेराईटल रेप" के लिए नहीं है

    ReplyDelete
  4. band kamro mein ghatne wali kahniyon ko awaaz de di fauziya

    ReplyDelete
  5. Sharing the story here...hope u dont mind...
    https://www.facebook.com/groups/ThinkersForumGroup

    ReplyDelete
  6. Jhankjhor diya hai apke shabdo ne....umda
    http://ehsaasmere.blogspot.in/

    ReplyDelete
  7. dil ko chhukar chirne wali aurat ki bebasi ki sachchai..... achhe se bayan ki hai.

    shubhkamnayen

    ReplyDelete
  8. Don't use anybody. its as crime as rape..

    ReplyDelete
  9. Shandar kahani...Hamzabaan se aapke blog ka link mila. Blog posts lajawab hain. InshaAllah aage b aate rehna hoga yahan.

    ReplyDelete
  10. जानदार कहानी................

    ReplyDelete