Sunday, 13 April 2014

पुरानी रूह

अपने लिखे कुछ पुराने ख़त देखे
बेपरवाह लफ्ज़ देखे
बेगुनाह हर्फ़ देखे

पता है,
ख़तों में मेलों का ज़िक्र था
झूलॉ का 
झीलों का भी
उन किताबों का जो पढ़ी नहीं
उन ग़ज़लों का जो सुनी नहीं
हर उस शय का शौक़ झलकता मिला 
जिससे वास्ता नहीं पड़ा

ख़तों के उस जज़ीरे पर ताज़गी थी
अरमानों के पौधे
तब तक सांस ले रहे थे
लुटना, उजाड़ना,
सूख के प्यासा मर जाना
अभी बाक़ी था
हाँ अभी बाक़ी था,
 ख़्वाब की सांस घुटना
बिलख-बिलख कर रो रहे 
जज़्बों को लपेट कर,
किसी कनस्तर में डाल देना

अभी बाक़ी था
तमाशा बनना
बेवकूफ़ बनना
हताशा बनना
अभी बचा था
`समझदार' होना
`परिपक्व' होना
और वो क्या कहते हैं
`दुनिया को समझना'

पुराने ख़तों से ताकती रूह,
मुस्कुराती थी
उसके लिए आज,
एक राज़ था
और
राज़ तो दिलचस्प ही होते हैं
दिलकश ही होते हैं
आज से अनजान 
वो अब भी,
उन पन्नों के बीच
बेख़ौफ़ दौड़ रही है  
जुमले दर जुमले
उछल रही है

तो चलिए उसे कुछ ना बताएँ
खुशफ़हम रूह को
सियाही से सूरज बनाने दें