Thursday, 2 April 2015

चिन डिम्पल


रातभर उस चेहरे में ढूंढा
ठुड्डी पर गड्ढा,
रातभर फोटो फ़्रेम ने भी दीवार तलाशी
उतरी तस्वीरें दोबारा लगाई नहीं जातीं
खिंचते हैं नए क्लेवर,
फिर शीशा चढ़ाकर बसाई जाती हैं
पुरानी दीवारें
रहते हैं पुराने कैन्वस के निशान
बस तब तक,
जब तक दीवारें फिर से रंगी नहीं जातीं

2 comments:

  1. शीशा चढ़ाकर बसाई जाती हैं ...पुरानी दीवारें ...तभी तो पुराने कैनवस के निशान ज़ल्दी मिट जाते हैं । हम सब शीशे के मोह में जकड़े हुये हैं ........ब्रोकेबल ग्लास और दे ही क्या सकता है ........

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  2. एक थी फ़ौज़िया, एक है फ़ौज़िया, एक होगी फ़ौज़िया.

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