Saturday, January 12, 2013

अन्धेरे के भेद...



उसके जिस्म पर कहीं कोई जला निशान नहीं है जिसे वो अपने मां-बाप को दिखाये. उसका चेहरा भी किसी प्रताड़ित की गयी औरत जैसा सूजा हुआ नहीं रहता. बल्कि उसकी आंखें आज भी बिल्कुल वैसी हैं जैसी स्कूल में थीं… चमकती हुई. वो अपने मजाज़ी खुदा आतिफ़ के खिलाफ़ समाज की अदालत में किसी तरह का कोई सुबूत नहीं जुटा सकती. शादी के कुछ रोज़ बाद जब ज़रीन ने अपनी मां से दबे-छुपे लफ़्ज़ों में खुद पर हर रात गुज़रने वाली तकलीफ़ें बयान करनी चाहीं तो मां ने ये कह कर खामोश कर दिया था “मर्द की मोहब्बत धीरे-धीरे चढ़ती है पगली, कड़वी-कसेली बीतेगी तब मीठा-सौंधा आयेगा.” 

ज़रीन की शादी को दो साल हो चुके हैं लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी मीठा-सौंधा नहीं सुना. बस यही, इस महीने चार सलवार-कमीज़ सिलवाई, कल नये बुन्दे बनवाये या आज ‘बालिका वधु’ में क्या हुआ. अगर वो मेरी बचपन की दोस्त ना होती तो मैं भी उसके घर की नई फ़्रिज और नयी चादरों को देखकर सुकून पा लेती कि ज़रीन खुश है. दुनिया के सामने जान छिड़कने वाला आतिफ़ असल में उसे किस-किस तरह तहस-नहस करता है ये मुझ तक भी ना पहुंचता. शुक्र है मैं उसकी मां नहीं हूं. 

बचपन में ज़रीन जब घर आती थी तो हम सीधा मेरे कमरे में घुस कर दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर लेते थे. उस वक्त ये कॉमिक्स पढ़ने या दुपट्टों से साड़ी बांधने के लिये होता था. कुछ सालों बाद दरवाज़े के पीछे वाली सहेलियां इस उधेड़बुन में रहतीं कि फ़लां ज़रीन के घर की बालकनी में रोज़ कागज़ की पर्चियां क्युं फेंकता है. पर अब दरवाज़ा बन्द होने पर ज़रीन ऐसे मुर्झाती है जैसे किसी फूल के मुर्झाने के सीन को फ़ास्ट-फ़ॉर्वड कर दिया गया हो. अभी पिछले हफ़्ते ही कितनी बेबसी से कह रही थी “यार क्या बताऊं, मेरा ज़रा भी दिल नहीं चाहता. बस आफ़त है जो रोज़ रात गुज़रती है” मेरे पूछने पर कि महीने के उन दिनों आतिफ़ का क्या रवैया होता है, उसने बताया “उससे ‘इन्हें’ फ़र्क नहीं पड़ता, मेरे रोकने पर भी नहीं सुनते, हालांकि डॉक्टर मुझे डांट चुकी है, इंफ़ेक्शन हो गया था.” 

आज जब मैंने गुस्से में कहा कि तेरे मुंह में ज़बान नहीं है? चिल्ला नहीं सकती? शोर क्युं नहीं मचा देती? उसकी मनमानी क्युं सहती है? ये तो रेप है! ज़रीन मुझे तंज़ से देखते हुए बोली “ये शादी है, बालकनी में आने वाली पर्चियां नहीं कि जिसका चाहा जवाब दिया और जिसका नहीं चाहा कूड़े में डाल दी. उसका हक है मुझपर, आतिफ़ जैसे चाहे वैसे खुद को हाज़िर करना होगा. अगर नहीं करती तो वो करवाना जानता है. मुझसे दस गुना ज़्यादा ताकत है उसमें. फिर इस्लाम भी तो मर्द से यही कहता है “बीवी तुम्हारी कोई बात ना माने तो पहले उसे समझाओ, ना समझे तो दोबारा समझाओ और फिर भी ना समझे तो बस समझा ही दो 

शायद ज़रीन कल भी आये और बैठते वक्त फिर से तकलीफ़ होने की शिकायत करे. ज़रीन से जब भी मिलती हूं दिल लरज़ जाता है, पूरे जिस्म में झुरझुरी दौड़ जाती है. मैं जानती हूं बन्द दरवाज़े के पीछे मैं उसे कल भी सुनूंगी. फ़र्क होगा कि अब मुझे उस पर पहले से ज़्यादा तरस आयेगा.

ज़रीन मेरे बचपन का साथ है, जो आज हर रोज़ सुबह आईने में संवरती है और देर रात बिस्तर में बिखरती है. अक्सर ये कह कर खुद को बहलाने की कोशिश करती हूं कि उसकी ‘अरेंज्ड मैरिज’ है. पर मेरी इस कोशिश पर वंदना की फोन कॉल पानी फेर देती है. वंदना को तो ज़रीन का साया छू कर भी नहीं गुज़रता. वो कोई सहने, मरने, खटने वाली लड़की नहीं है. ऑफ़िस में कोई उसके सामने ज़बान खोलने से पहले दस दफ़ा सोचता था. वंदना की ‘लव मैरिज’ का लव पहली रात ही उड़न-छू हो गया. कहती है “उमेश वैसे तो बहुत प्यार करता है, बस ‘उस वक्त’ ही उसे कुछ हो जाता है. पर कोई बात नहीं, वैसे भी खींच-तान नोच-खसोट मर्दों पर जंचती है.” 

दिन की रोशनी में ज़रीन और वंदना बेहद मुख्तलिफ़ हैं. सच तो ये है कि आतिफ़ का मौहल्ले वाला जिमखाना, उमेश के शीशे वाली बिल्डिंग के कॉन्फ़रेंस हॉल से कोसों दूर है. पर अन्धेरा सारे भेद मिटा देता है.

Friday, January 11, 2013

शादी क्यूं करूं?




मैं शादी क्यूं करूं? क्या इसलिये कि सब कर रहे हैं? अगर ऐसा है तो सब धोखेबाज़ियां, जालसाज़ियां भी कर रहे हैं. तो आज से ही शुरु कर देती हूं. बड़ी खाला पिछले दिनों घर आई तो कह रही थीं “दुनिया की ज़रूरत है शादी.” मैंने कहा “दुनिया की ज़रूरत तो पट्रोल भी है, अब क्या कूंआ खोदने लगूं.” खाला चिढ़कर बड़बड़ाने लगीं “अरे, भई…कोई साथी तो होना चाहिये ना, पूरी पच्चीस की हो गयी हो” मैंने इतराते हुए खाला के कंधे में हाथ डाला “साथी की फ़िक्र क्युं करती हैं, बिटिया आपकी इतनी बुरी भी नहीं“ ये खाला के सब्र की इन्तेहा थी “सारा दिमाग पढ़ाई ने खराब किया है, अब तक मैं मैदान में उतर चुकी थी “लो, मानो जब आदम-हौआ ज़मीन पर आए तो अल्लाह ने साथ में काज़ी भी भेजा था.” 

मां बताती है, बचपन में मैं अपने टिफ़िन बॉक्स में चाय ले जाने की ज़िद करती थी. जब टीवी पर कूकिंग ऑयल का विज्ञापन आता भाग कर किचन में जाती और प्लेट लेकर आ जाती कि टीवी में से पूड़ियां और पकौड़े निकालेंगे. वो बचपना था. अट्ठारह साल की उम्र में दुनिया जीत लेने वाला एहसास टीन-ऐज का जोश था. यानि अब तक सब नॉर्मल ही था. किसी को बताउंगी तो वो इन बातों से इत्तेफ़ाक रखेगा कि सबके साथ ऐसा ही होता है. फिर आज मेरा हर कदम, मेरी हर बात सबको खटकती क्युं है? बचपन में ज़्यादातर बच्चियां शादी के ज़िक्र पर शर्माकर बुदबुदाती हैं “मुझे शादी नहीं करनी.” उस वक्त सब हंस देते हैं. लेकिन जब यही बात पच्चीस साल की कोई लड़की कहती है तो उसे फुंकार समझा जाता है.

“तुम शादी कब करोगी?” ये सवाल हर बार एक अलग शक़्ल लिये मेरी चौखट पर घंटी बजाता है. जब दादी सर पर हाथ रखकर “बिटिया” कह कर पूछती हैं तो मैं दरवाज़ा खोलती हूं और कहती हूं, “दादी अभी तो बच्ची हूं, देखिये ना मेरा कद  सिर्फ़ पांच फ़ुट ही है” दादी मुस्कुराती हैं और बताती हैं “ बहनी, हम तेरह साल की थीं जब बिदा हो गयी थीं, हम तब चार फ़ुट की रहीं. तुम्हरे दादा पंद्रह साल के रहे, ओ वक़्त हमसे लम्बे थे, पांच फुट के रहे. फिर धीरे-धीरे हम छ: फुट की हो गयीं और वो छोटे ही रह गये” दादी के इस मज़ेदार किस्से के साथ बात का रुख घूम जाता. अपने से छोटी किसी लड़की की शादी में जाना भी एक चैलेंज है. पिछले महिने ज़रीन की छोटी बहन ज़ैनब का निकाह था. स्टेज पर जब उससे मिलने गयी तो कहने लगी “बाजी, अब आप भी निकाह पढ़वा ही लो.” मैं उसके चेहरे से भी बड़ी नत्थ को देखती रही जो बार-बार उसके गोटे वाले दुपट्टे की झालर में फंस रही थी. उसके पर्स से मैचिंग, कस्टम- मेड जूती ने मेरा ज़ायका इतना बिगाड़ दिया कि कबाब का लुत्फ़ भी नहीं उठा सकी. 

हर जगह बगावत का झंडा बुलंद करने से अच्छा होता है, बस बालकनी से झांक कर सवाल को रफ़ा-दफ़ा कर दो, जैसे किसी सहकर्मी के पूछने पर कह दो, अच्छा रिश्ता मिलेगा तो ज़रूर कर लूंगी. बैंगलोर से जब बड़ी बहन फोन करती है तो बिना लाग लपेट वाला जवाब देती हूं “पहले इतने पैसे हो जायें कि अपना घर खरीद सकूं, तब शादी पर गौर फ़रमाया जायेगा.” वो परेशान होकर कहती है “बहना, उसमें तो सदियां लग जायेंगी, क्या बुढ़ापे में शादी करेगी.”  मैं पलटकर पूछती हूं “शादी का जवानी से क्या लेना देना” तो वो कुछ ना कहना ही बेहतर समझती है.
हद तो आज हुई जब मेरे रेडियो प्रोग्राम के दौरान लिस्नर का मैसेज आया “ईश्वर से प्राथना करूंगी कि आपकी शादी जल्दी हो जाये” मानो मुझे कोई जानलेवा बीमारी हुई हो जिसे ठीक करने के लिये दुआ की ज़रूरत हो. चार शादी याफ़्ता सलमान रुश्दी ने कहा था, लड़कियां शादी इसलिए करती हैं क्युंकि उन्हें शादी का जोड़ा पहनने का शौक होता है. सोच रही हूं करीना ने तो कोई खास जोड़ा नहीं पहना था...हां, लेकिन उसके पास अपना घर खरीदने जितने पैसे ज़रूर होंगे.

Tuesday, January 1, 2013

क्युंकि तुम मेरी जैसी थीं…


तुम्हें अभी नहीं मरना था. मैं तुम्हारा नाम नहीं जानती. फ़र्क भी नहीं पड़ता क्युंकि नाम ना जानते हुए भी मैं सुनती हूं कि तुम मेरे जैसी थीं. ऐसा नहीं है कि तुम मेरे अकेले का दूसरा रूप थीं. पर असल में तुम उन लड़कियों का दूसरा रूप थीं जो आज सड़कों पर हैं. जिनकी माएं आज नारे लगा रही हैं. तुम पर लोगों ने इल्ज़ाम लगाए कि तुमने रात के वक्त घर से बाहर कदम निकाल कर गलती की. ये भी कहा कि तुम जैसी ना जाने कितनी लड़कियों के साथ बलात्कार होते हैं बल्कि तुम्हारे दर्द को दूसरी स्त्रियों के दर्द के साथ नापा-तौला भी गया. छत्तीसगढ़ में क्या-क्या होता है. सोनी सूरी पर कितने सितम हुए, उसके मुकाबले तुम पर हुए प्रहार कितने छोटे थे. गुजरात के दंगों में औरतों के साथ कितना अन्याय हुआ.

मेरी मां ये सभी कुछ न्यूज़ या बातचीत में सुनती है, पर वो तुमसे जुड़ी क्युंकि उसे तुममें मैं नज़र आती थी. मैंने वो सारी गलतियां की हैं जो तुमने कीं, फ़िल्म देखने बाहर जाना, देर रात तक घूमना, लड़के दोस्तों के साथ बसों में चक्कर लगाना. मां जानती है मैं ये हिमाकतें जारी रखूंगी. इसीलिए कहती है उसने कहां सोचा होगा ऐसा हादसा हो जाएगा, बच्ची हंसी-खुशी फ़िल्म देखकर निकली होगी जबतक तुम सफ़दरजंग में थीं मां कहती रही वो अस्पताल सही नहीं है, ये नहीं कि किसी प्राइवेट अस्पताल में रखते जब पता चला कि सिंगापुर चली गईं तो कहने लगी सरकार बड़ी चालाक है, सोच रही है बच्ची वहीं मर-खप जाएगी तो दिल्ली में बवाल कम होगा…लोग क्या बेवकूफ़ हैं...सब समझते हैं

दिल्ली की लड़कियां अभीजीत मुखर्जी के हिसाब से सजधज कर विरोध कर रही हैं. ‘डेंटिड-पेंटिड’ औरतों की क्या हैसीयत. वो तो डिस्को भी जा रही हैं, उन्हें कुछ कहने का अधिकार क्युं होना चाहिए, वो तो जैसा कि विश्व-प्रख्यात है ‘डम्ब ब्लॉन्ड’ हैं. फ़लां औरत के साथ बलात्कार इसलिए जायज़ है क्युंकि वो मॉडर्न है, उसका क्या कैरेक्टर. फ़लां के साथ इस लिए सही है क्युंकि वो दलित है, उसकी क्या हैसीयत, वो तो पवित्र हो गई जो उंच्च-जाति के लड़कों ने उसे नोच खाया. चालीस साल की महिला का बलात्कार यूं हुआ क्युंकि फ़िल्मों में आइटम गाने होते हैं और दो साल की बच्ची को इसलिए चीरकर कर गटर में फेंक दिया गया क्युंकि लड़कों की शादी नहीं हो रही तो कुंठित हो गए हैं. हर बलात्कार के पीछे एक सफ़ाई. कहां से आती है ये सोच, किसके मन में पनपते हैं ये ख्यालात. हमारे ही भाई हैं जो सड़क पर निकलते ही किसी लड़की को टक्कर मारे बिना सड़क पार नहीं कर पाते. हमारे ही पिता या चाचा हैं जो पचास की उम्र में स्कूल जाने वाली बच्चियों की मोज़ों वाली टांगे देखते हैं. किसी और दुनिया से नहीं आए ये लार टपकाने वाले आदमी. इसी समाज के हैं, मज़े की बात तो ये है कि हम इन्हें समाज के इज़्ज़तदार लोगों का दर्जा देते हैं. ये इज़्ज़तदार हैं क्युंकि इनकी बेटी घर से नहीं भागी. इनकी बहनों की शादी बीस की उम्र में कर दी गई. इनकी बीवियां ज़बान नहीं चलातीं और खिड़कियों में नज़र नहीं आतीं. इनकी इज़्ज़त इनके घर की औरतें संभालती हैं, उसके तले दबती चली जाती हैं. मां नहीं चाहती कि मैं अकेले ऐसा कोई बोझ उठाऊं जो उन्होंने खुद उठाया. इज़्ज़तदार घर की लड़कियों की तरह मुझे किसी कोने में लटका कर नहीं रखा गया. दिल्ली में रहने वाली लड़कियां हर रोज़ किस आज़ाब को सह कर घर लौटती हैं मां जानती है. उन्हीं माओं की तरह जो सड़कों पर हैं।

तुम्हारी मौत का सुनकर मां सुन्न हो गई, वैसे लगता है कि मां जानती थी यही होगा. शाम से कह रही थी, रुक-रुक कर कह रही थी लगता है…अब नहीं बचेगी…नन्ही सी जान को दिल का दौरा भी पड़ गया मैं समझती हूं मां की इस कदर तकलीफ़ की वजह क्या है, मां तुममें मुझे देखती है. मां को लगता है तुम बच जाती तो मेरा एक रूप ज़िन्दा होता. वो तुम्हें सांस लेते देखना चाहती थी क्युंकि वो मुझे मरता हुआ नहीं देख सकती. जब पता चला तुम्हारी रूह वेंटिलेटर के साथ से ज़्यादा देर खुश नहीं रही और आखिरकार शरीर को छोड़ चल दी. मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मां को बताऊं पर वो इतनी दफ़ा तुम्हारी खैरियत पूछ चुकी थी कि बताना पड़ा. अम्मी…वो मर गई मैंने कहा तो मां चुप हो गई, थोड़ी देर बाद बोली उसे नहीं मरना था, ठीक हो जाती…इन सब से ऊपर उठकर आगे बढ़ती, पढ़ती-लिखती, धीरे-धीरे सारी तकलीफ़ें भूल जाती…मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी, डाक्टर बनती फिर मां चुप हो गई और धीरे-धीरे कहती रही उसे नहीं मरना था..उसे नहीं मरना था.” मां का सदमा उस बेनाम लड़की से होते हुए मुझ तक आता है, मैं जी रही हूं, मां मुझसे जुड़ा सब कुछ ज़िन्दा चाहती है वो नहीं जानती असम का हाल, ना समझती है कश्मीरी पंडितों को, उसे तुम ज़िन्दा चाहिए क्युंकि तुम मेरी जैसी थीं. लापरवाह…बेपरवाह…  

Wednesday, December 26, 2012

जब नियम की किताब एक होगी…



बलात्कार को लेकर तीन बातें सुनने में बहुत आती हैं. पहली, लड़कियों के कम कपड़ों की वजह से बलात्कार या छेड़-छाड़ होती है. ये एक ऐसा बयान है जो इस दर्जे का भी नहीं कि उसपर चर्चा की जा सके, क्योंकि हम बखूबी जानते हैं बलात्कार 6 साल की बच्ची का भी होता है और साठ साल की दादी की सूरत वाली बुज़ुर्ग महिला का भी. दूसरी, बलात्कार शहरों में होते हैं क्युंकि यहां लड़कियां घर से बाहर निकलती हैं, लेकिन हम ये भी जनते हैं कि बलात्कार या उत्पीड़न के अधिकतर मामले घर में मौजूद सदस्यों द्वारा ही अन्जाम दिए जाते हैं. तीसरी बात कम सुनने में आती है, वो है बलात्कार दबे-कुचले इलाकों में ज़्यादा होते हैं क्योंकि वहां मर्द के भीतर कुंठाएं होती हैं, जबकि ‘प्रोग्रेसिव’ समाज में लड़के-लड़कियां एक एक-दूसरे से घुले-मिले रहते हैं सो वहां ऐसा कम होता है. अगर हम न्यूयॉर्क को दिल्ली से ज़्यादा प्रोग्रेसिव और मॉडर्न मानते हैं तो ये जानकार हैरानी हो सकती है साल 2011 में जहां दिल्ली में 568 बलात्कार के केस दर्ज करवाए गए, वहीं न्यूयॉर्क में ये आंकड़ा 2752 को छूता है, लंडन में 3334 और अरसों तक बराबरी और हक के लिए लड़ने वाले नेल्सन मन्डेला के दक्षिण एफ़्रिका की प्रादेशिक राजधानी केपटाउन में साल 2011 में 64514 बलात्कार के केस दर्ज हुए.

नौकरी करने, पैसा कमाने, अपनी पसंद के कपड़े पहनने या शादी करने से अगर बराबरी और इज़्ज़त मिलती तो दुनिया के इन मशहूर शहरों में लड़कियों को कॉलेजों, अस्पतालों या सड़कों पर ज़ोर-ज़बर्दस्ती का सामना नहीं करना पड़ता. अपने पैरों पर खड़े होने का मतलब अगर बैंक-बैलेंस होता तो मशहूर पॉप स्टार रिहाना अपने बॉयफ़्रेंड क्रिस ब्राउन से लगातार पिटने के बाद, कम्प्लेंट करवाने के बाद, सज़ा दिलवाने के बाद फिर उसी के साथ हंसते मुस्कुराते हुए पार्टियों में नज़र नहीं आतीं. ये सूरते-हाल हमें साफ़-साफ़ कहती है तुम केवल एक शरीर हो, तुम अपने पति-प्रेमी से पिटोगी और फिर बाहों में भी भरोगी.”
बलात्कार एक ज़हनियत है, जो औरत को मर्द से कम आंकती है, जो उसे सिर्फ़ भोगने की वस्तू बनाती है. वही ज़हनियत जो कई पुलिस एस.एच.ओ से कहलवाती है बलात्कार में लड़की की मर्ज़ी शामिल होती है. वही ज़हनियत जो पढ़े-लिखे समाज में भी दहेज की परंपरा को बनाए हुए है, ये ज़हनियत घरेलू हिंसा को गांव हो या शहर, भारत हो या विदेश हवा देती रहती है. फ़र्क बस इतना है कि कोई साड़ी के पल्लू से चेहरे के निशान ढंकती है तो कोई काले चश्मे की शह लेती है.

मेरे पिछले ऑफ़िस में एक लड़की थी हर वक्त अपने काम में मगन रहती. उसका ऑफ़िस के एक साथी से प्रेम-संबंध था. एक दिन किसी ने दोनों को ऑफ़िस के एक हिस्से में चुंबन करते देख लिया. ज़ाहिर सी बात है फिर बॉस को तो पता चलना ही था. बॉस ने आनन-फ़ानन में उस लड़की को ऑफ़िस से निकाल दिया. मगर वो लड़का आज दो साल के बाद भी उसी कंपनी में सिर उठाकर काम कर रहा है. स्कूल के दिनों की बात है जब एक लड़की के माता-पिता को इसलिए तलब किया गया था क्योंकि उसे अपने जन्मदिन पर एक दोस्त ने गुलाब के फूल दिए थे. ज़ाहिर सी बात है यहां भी फूल देने वाले लड़के को टीचर ने खुद ही समझा-बुझा दिया था. जिस समाज में प्रेम संबंध से बढ़ी नज़दिकियों के लिए लड़की को दोषी समझा जाता है, बल्कि इसके लिए बिना सुनवाई किए सज़ा भी सुना दी जाती है. वहां उम्मीद करना कि रातोंरात कोई बदलाव आएगा और सदियों से चले आ रहे नियम बदल जाएंगे नादानी होगी. ऑफ़िस परिसर में अपने प्रेमी से नज़दिकियां बढ़ाना अगर गलत है तो उस जुर्म के सहभागी दोनों हुए, कच्ची उम्र में संभलने की सीख अगर फूल लेने वाली को मिलनी चाहिए तो फूल देने वाले को भी मिलनी चाहिए. औरत और मर्द होने के आधार पर समाज के नियम बदल जाना ही बलात्कार की नींव रखता है.

दिल्ली में हर साल मुम्बई के मुकाबले कितने अधिक बलात्कार के केस दर्ज होते हैं, इसपर रीसर्च की जा सकती है. गांव-देहात के छुपे कमरों में कितनी बच्चियां इन हालात के आगे आवाज़ किए बगैर घुटने टेक देती हैं, इसपर बहस सुनी जा सकती है या काश दामिनी बस की जगह द्वारका को जाने वाले मेट्रो ले लेती, सोचकर मन में उठी टीस पर छटपटाया जा सकता है। पर सवाल और जवाब अभी भी वही रहेंगे, इन्सान के लिए लिंग, जाति, धर्म या रंग के आधार पर बने अलग-अलग नियमों ने वक्त-वक्त पर सड़कों पर प्रदर्शन करवाए हैं, बसें जलवाई हैं और लाठियां बरसाई हैं. बदलाव की लहर को स्कूली किताबों से गुज़रते हुए, घरों के ड्रॉइंग रूम में चाय-पानी के वक्त रुकना होगा. मां-बाप जब बेटे और बेटी को अपनी राय रखने का बराबर मौका देंगे. भाई देखेगा कि उसकी बहन सिर्फ़ बात-बात पर डांट खाने के लिए नहीं है. बेटा देखेगा कि उसकी मां का अपना वुजूद है. वो जो नौकरी से आने के बाद सीधा किचन में नहीं घुस जाती, वो जो ऑफ़िस जाने से पहले अकेले खड़े होकर पूरे घर का खाना नहीं बनाती. जब औरत को आधुनिकता का लिबास उढ़ाकर उसके कमाए पैसे और जिस्म पर अधिकार नहीं जमाया जाएगा. 
बलात्कार के ऊपर जाते आंकड़े तब थमेंगे जब समाज में ये सोच विकसित हो सके कि बलात्कार शारिरिक उत्पीड़न से ज़्यादा कुछ भी नहीं. इससे कोई इज़्ज़त-विज़्ज़त नहीं जाती. जब गर्मियों के मौसम में आदमी के शॉर्ट्स पहने को आराम और औरत के शॉर्ट्स पहनने को फ़ैशन का नाम ना दिया जाए. जब आदमी का सेहतमंद होना और औरत का पतला-दुबला होना खूबसूरती का पैमाना ना हो. जब एक ही नियमों की किताब से हम पढ़ना और पढ़ाना सीख जाएं।  

Saturday, September 29, 2012

फ़ैसला



वो गिर जाती अगर दीवार ना थामती. अब क्या करे? डाक्टर के पास जाए? एक बार कन्फ़र्म करे? या चुपचाप जाकर टीवी पर एम.टीवी देखकर ‘चिल’ करे. शायद ये सब अपने आप ही ठीक हो जाए, शायद यूंही सीढ़ीयों से उसका पैर फिसले और सब नॉर्मल हो जाए. उसने उन तीन मिनटों में जाने क्या-क्या सोचा. मन ही मन तय किया, ये आखिरी बार था जब उसने शोभित की बात मानी, आगे से वो बिल्कुल नहीं सुनेगी कि ‘जान, खत्म हो गया है… जाकर लाना होगा… बस एक बार… एक बार से कुछ नहीं होगा’ अब उसे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था, क्युं उसकी बात मानी, जिस्म मेरा तो इसकी ज़िम्मेदारी भी मेरी है, ठीक है वो प्यार करता था लेकिन अगर वाकई करता तो यूं उसे ‘ईमोशनली ब्लेकमेल’ ना करता. उस वक्त वो बस एक मर्द था पर मैं तो औरत ही थी ना, वो सिर्फ़ अपने जिस्म की सुन सकता है पर मैं? मुझे तो समझना चाहिए था ना, आखिर नुकसान मेरा ही होगा…पर उस वक्त कहां होश था. ये तीन मिनट कितने भारी थे वही जानती थी. दुनिया जहान का सही-गलत उन तीन मिनटों में ही दिमाग में उतर रहा था, अभी तक तो जैसे ख्वाब में जी रही थी. फिर जब उसने प्रेग्नेन्सी-टेस्ट में सफ़ेद प्लास्टिक पर दो लाल लाइनों को चमकते देखा उसे लगा वो बाथरूम में चक्कर खा कर गिर जाएगी…जब वो शोभित से अलग हुई थी तब उसे अन्दाज़ा नहीं था कि अगले कुछ हफ़्तों में उसे इतनी बड़ी मुसीबत से दो-चार होना पड़ेगा. शुरु में तो वो समझती रही कि ये ज़हनी तनाव है जिसके सबब इस बार देर हो रही है, फिर जब कुछ हफ़्ते और गुज़रे तो उसका ‘इन्टुशन’ कहने लगा ज़रूर कुछ गड़बड़ है. वैसे भी औरतों का ‘इन्टुशन’ अक्सर सही ही होता है. लेकिन जब यही अन्दाज़ा, हिसाब-किताब ग़लत साबित होता है तो तकलीफ़ होने से ज़्यादा खुद पर गुस्सा आने लगता है कि कैसे सच को पहचानने में गलती कर दी. कई दफ़ा तो बहुत वक़्त तक यकीन ही नहीं होता कि जिसे हम आज तक जानते थे वो तो बिल्कुल ग़लत था, हमारे ‘इन्टुशन’ ने हमारे साथ ग़ज़ब का मज़ाक किया है.

समा ने कभी सोचा भी नहीं था शोभित दूर हो जाएगा, वैसे भी कोई भी प्यार करने वाला रिश्ते के पहले दिन ये तो नहीं सोचता कि ये बस कुछ दिनों का लगाव है, कुछ दिनों का साथ है. सब यही सोचते हैं हम अजर-अमर प्रेम का हिस्सा बनने जा रहे हैं और हमारे जैसा कभी किसी ने महसूस ही नहीं किया, हम एक दूसरे के नाज़-नख़रे उठाते हुए युंही हंसते-खेलते जिएंगे, बुढ़ापे में एक छोटे से शहर में बड़ा सा घर लेकर आंगन में शामें बिताएंगे. ऐसे सभी ख़्याल धूल तब चाटते हैं जब एक छोटी-सी तीखी चीज़ से मुलाक़ात होती है यानि ‘हक़ीक़त’.

शोभित के साथ उसका रिश्ता तीन साल चला. वो समझते कि एक-दूसरे को जानते हैं, इसी से पता चलता है कि इन्सान कितने ख्याली पुलाव पकाता है. कोई शख़्स जब खुद को ही नहीं जान सकता तो किसी और को जानने का दावा कैसे कर जाता है, बस किसी कॉफ़ी-शॉप में कुछ मुलाक़ातें, किसी सिनेमा थिएटर में कुछ हिट-फ़्लॉप फ़िल्में, एक जैसा संगीत पसंद होना, या मनपंसद किताब एक होना, शायद एक जैसा ‘पॉलिटिकल व्यू-पॉइन्ट’ भी मायने रखता है. एक जैसे होने की ख़ुशी आंखों के आगे काला परदा डाल देती है. फिर वो नहीं दिखता जो ज़रूरी है जैसे शोभित ने जब उसपर पहली बार गुस्सा किया था तो बात कितनी छोटी थी, वो शोभित के बात-बात पर रोने को लेकर कितना चिढ़ जाती थी, शोभित ने उसे अपने क़रीब लाने के लिए कई झूठ कहे थे या वो खुद कितनी ‘पोज़ेसिव’ थी. शुरु में ये बातें बेमतलब होती हैं, इन पर हंसा जाता है. मगर जैसे-जैसे वक़्त गुज़रता है एहसास होता है छोटा कुछ नहीं होता, जिसे आज हवा में उड़ाया जा रहा है कल अलग होते वक़्त उसे तीर की तरह इस्तेमाल किया जाएगा. शोभित के जो आंसू उसे पहले कमज़ोर कर देते थे अब पत्थर बना देते थे, उसकी जो टोका-टाकी शोबित को पहले उसकी फ़िक्र का एहसास दिलाती थी अब गले का फंदा लगती है. खैर वो अलग हुए इसकी सीधी-सीधी कोई एक वजह नहीं हो सकती, रिश्ता टूटने की कभी भी कोई एक वजह नहीं होती.

डाक्टर उसे ऐसे देख रहा था जैसे वो सामने वाले बैंक में रॉबरी कर के सीधी इस क्लिनिक में घुस गयी हो और एकलौता वो डाक्टर ही इस राज़ को जानता हो. जब उसने अपना नाम मिसिज़ के जगह मिस के साथ लिखवाया नर्स ने भी उसे कनखियों से देखा था. डाक्टर खुद को सहज दिखाने की कोशिश कर रहा था और समा के लिए इतना ही काफ़ी था, अब उसका यहां गुलदस्ते के साथ स्वागत तो किया नहीं जाता कि ‘मैडम आप दो महीने से प्रेगनेंट हैं और वाह! क्या बात है, आपकी शादी भी नहीं हुई…कमाल कर दिया आपने तो.’ 

मेट्रो में बैठी वो लेडीज़ कोच के आखिर के हिस्से को हमेशा की तरह देख रही थी, यहां से जनरल कोच शुरु होता है. जब कोई कपल, मिया-बीवी हों या ब्वायफ़्रेंड-ग्रलफ़्रेंड मेट्रो में चढ़ते तो इसी हिस्से में खड़े होते, कई लोग एक दूसरे को यहां ऐसे ढूंढ़ते जैसे ये दो कदम की जगह लम्बा सा प्लेटफ़ॉर्म हो. फिर जब यह मालूम हो जाता कि हां ‘वो’ भी यहीं है तो दोनों के ही चहरे पर मुस्कान नज़र आती. इन्सान कहीं भी हो एक जैसा ही रहता है, कहीं ना कहीं सब एक से ही हैं वरना ऐसा क्युं होता कि जब भी मेट्रो में सफ़र करती इस किनारे पर हमेशा एक जैसी ही बेचैनी, एक-सी ही खोज और फिर एक-सी ही तसल्ली दिखती. वो भी ऐसे ही खड़े होते थे, इधर-उधर देखते नीचे नज़रें किये हुए और फिर कभी मौक़ा पा कर एक दूसरे की आंखों में झांक लेते. बस इतना करने से ही उसके पूरे जिस्म में झुरझुरी दौड़ जाती. बस देख लेना…बस देख लेना ही तो बदल जाता है तभी तो कहते हैं फ़लां की नज़रें बदल गयीं. रिश्ते के आखिरी दिनों में वो समा को कितनी नफ़रत से देखता था, लाल आंखों से ऊपर से नीचे तक जैसे कह रहा हो तुम बेहद घटिया हो, तुम देखे जाने लायक भी नहीं, तुमसे घिन्न आती है’. हां, नज़रे ही बदलती हैं, उसने मेडिकल रिपोर्ट को देखते हुए सोचा.

******

क्या मुझे रोना नहीं आएगा? वो रात को तकिए पर सर टिकाते हुए थोड़ी ऊंची आवाज़ में खुद से सी बोली. कहीं से, किसी भी सन्नाटे से कोई आवाज़ पलट कर नहीं आई. अकेले सोना कितना भारी होता है, कोई सर पर हाथ रखने वाला नहीं, कोई ऐसा नहीं नींद में जिसकी कमर में हाथ डाला जा सके. उसने करवट बदल कर तकिया ज़ोर से भींच लिया, चादर के अन्दर चेहरा किया और तकिए में मुंह छुपा कर ज़ोर से चीखी, फिर तकिया ज़मीन पर फेंका, फोन में गाने चलाए, बिस्तर पर पैर पटके, उंगलियां बालों में घुसाईं, एक बार फिर दबी आवाज़ में चिल्लाई पर उसे रोना नहीं आया. रोने के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ रही है ये सोच कर उलटा खुद पर हंस पड़ी. अभी तक तय नहीं किया था करना क्या है, शोभित को वो कुछ भी बताना नहीं चाहती थी, वो नहीं चाहती थी कि किसी भी तरह का इमोशनल ड्रामा शुरु हो, अगर वो शोभित को कुछ बताती तो वो लौट आता बेशक, पर ये सही नहीं होता. उनके बीच हालात जिस हद तक बिगड़ चुके थे वो अब ठीक नहीं हो सकते थे बल्कि अब वो कुछ ठीक करना भी नहीं चाहती थी. जीवन होता है तब जीवन-साथी होता है, अगर साथी की वजह से जीवन पर ही खतरा मंडराने लगे तो ऐसे में आगे बढ़ जाना चाहिए. साथी और मिल जाएंगे जीवन नहीं मिलेगा. समा की सांस ना आती थी ना जाती थी बस अटकी रहती थी कि अब क्या कह देगा, अब क्या कर लेगा, कहीं खुद को कुछ ना कर ले, खुद को पीटना, बेल्ट से मारना, सड़क पर चीखना-चिल्लाना, खुद को थप्प्ड़ मारना. सर दीवार में पटकना, गाली-गलोज करना और फिर घंटों तक रोना. समा तंग आ गयी थी फिर भी सोचती शायद सब ठीक हो जाए पर नहीं. कुछ रोज़ सब ठीक रहता और फिर वही कहानी शुरु. तो वो शोभित को कुछ नहीं बताना चाहती थी, उसमें इस बात की हिम्मत तो थी कि सब कुछ अकेले संभाल ले पर फिर से अंधेरे कूंए में जाने की ताक़त नहीं थी. और फिर कौन जाने शोभित कह देता इसके लिए मैं ज़िम्मेदार नहीं. जो कुछ वो समा को कह चुका था, उसके बाद वो कुछ भी कह सकता था. यक़ीन एक बार उठ जाए तो उसके दोबारा विराजमान होने की गुंजाइश नहीं होती. 

सुबह सूजी हुई आखों के साथ ऑफ़िस पहुंची, लिफ़्ट के शीशे में खुद को देखा तो झिझक कर खुद से ही नज़रें चुरा लीं. कोई भी फ़ैसला लेने से पहले उसे अच्छे से सोचना होगा. क्या उसे ये बच्चा चाहिए या नहीं चाहिए. तय करना आसान नहीं था. अकेले रहती है, उम्र अभी 26 साल है, नौकरी करती है, बच्चा पैदा करने के लिए वो कभी उत्तेजित नहीं रही. पर अब जब वो प्रेग्नेंट है तो अबॉरशन के नाम से पूरे जिस्म में कंपन सी दौड़ जाती है. आखिर अपने जिस्म से छेड़छाड़ करना आसान काम नहीं है. इस फ़ैसले से उसकी आने वाली ज़िन्दगी बदल जाएगी. उसके अन्दर की औरत बार-बार जज़्बाती हो जाती और उसके अन्दर की चन्चल लड़की अभी आज़ादी से उड़ना चाहती. अपने वर्क स्टेशन पर उसने कुर्सी से पीठ टिकायी तो देखा साथ बैठने वाली मधू अभी नहीं आयी. उसने अपनी फ़ाइलें निकालीं और बॉस के कैबिन में जाने से पहले एक नज़र दौड़ाने लगी, पर ध्यान मधू की तरफ़ भटक चुका था. मधू उसके साथ इस ऑफ़िस में पिछले एक साल से काम कर रही है, मधू ने 18 साल की उम्र में घर से भाग कर शादी कर ली थी और 19 साल की उम्र में तलाक़ हो गया था. अब ऐसे में ना तो वो अपने मां-बाप के पास लौट सकती थी और ना ही कोई दोस्त ऐसा था जो उसकी मदद करता. मधू के चेहरे पर चोटों के निशान साफ़ दिखते हैं. वो बताती है कि उसका पति जो कभी उसका प्रेमी हुआ करता था कैसे उसे बाल खींचते हुए पीटता था. वजह कोई भी हो सकती थी, जैसे इस लड़के से क्युं बात की और उस आदमी को पलट कर क्युं देखा. या फिर जींस क्युं पहनी जब मां चाहती है तुम साड़ी पहनो. कभी उसका पति सिखाता कि सास से कैसे बात करते हैं तो कभी ये कि ससुर के सामने गर्दन कितनी नीची होनी चाहिये. जबकि वो खुद अक्सर अपनी मां और पिता से बदतमिज़ी करता, आस-पड़ोस के लोगों से झगड़ा करता, किसी को भी पीटने पर फ़ौरन उतारू हो जाता. ऐसे लोग जो खुद नैतिकता के मामले में गोल होते हैं अक्सर अपनी पत्नी और बच्चों पर संस्कार लादने की कोशिश करते हैं, पर क्युंकि उन्हें खुद ही मालूम नहीं होता कि असल में नैतिकता है क्या, वो रटे-रटाए फ़ॉरमुलों का इस्तेमाल करते हैं और अपने परिवार को संस्कार की जगह कड़वाहट सौंपते हैं. मधू हिम्मती थी जो एक साल के अन्दर उस जंजाल से निकल गयी. हर कोई ऐसा कहां कर पाता है. “हाय जानेमन, इतनी गौर से देखोगी तो फ़ाइल में ऐटीट्यूड आ जायेगा” मधू ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा. “ओह! तुम आ गयीं, बस तुम्हारे बारे में सोच रही थी”

******

हिन्दी फ़िल्मों ने अबॉरशन को इतना ड्रामैटिक बना दिया है कि ऐसा ख्याल मन में आते ही समा खुद को ’पापिन‘ टाइप महसूस करने लगती. उसे याद आता कैसे ‘क्या कहना’ कि प्रीटी ज़िन्टा अपने पेट पर हाथ रख कर ‘फ़ीटस’ से बातें करती, उसे पुरानी हिन्दी फ़िल्मों की वो वैम्प याद आती जो अबॉरशन करवा कर, अपने शरीफ़ पति को चोट पहुंचाती है, वो महंगी साड़ी पहनती है, शराब पीती है और किटी पार्टियों में ताश खेलती है. समा खुद को उस रूप में इमाजिन करके मुस्कुरा देती. औरत की एक नपी तुली खास छवि बनाने में हिन्दी फ़िल्मों का बहुत बड़ा योगदान रहा है. सिनेमा थियेटर से बाहर निकलते हुए वो फ़िल्मों को मन ही मन गालियां दे रही थी. अब बताओ ये भी कोई बात हुई फ़िल्म के आखिर में ’सिल्क’ ने आत्महत्या कर ली. ‘डर्टी पिक्चर’ की बहुत तारीफ़ सुनी थी, आफ़िस में सुमन्त कह रहा था “ऐसी फ़िल्में बननी चाहिएं” वहीं गौरव का मानना था “हर औरत को सिल्क बन जाना चाहिए”. समा के बॉस और उनकी वाइफ़ सिल्क के किरदार को बज़ारू कह रहे थे. हर किसी की फ़िल्म के बारे में अपनी राय और समझ थी इसीलिए फ़िल्म हिट साबित हो गई थी. समा सोच रही थी, हर औरत को सिल्क क्युं बनना चाहिए, क्या हर औरत को अपना काम निकलवाने के लिए जिस्म का इस्तेमाल करना चाहिए या हर औरत को शादीशुदा मर्द के साथ जि़स्मानी और जज़्बाती हो जाना चाहिए. फिर जब पैसा और कामयाबी साथ छोड़ दे तो खुदकुशी कर लेनी चाहिए. समा ’सिल्क’ नहीं बनना चाहती थी, ना ही वो किसी भी औरत को सिल्क बनते देखना चाहती थी. समा के लिए ’सिल्क’ होना तारीफ़ की बात नहीं थी, उसे ‘सिल्क’ से सहानुभूति थी. उसके लिए ‘सिल्क’ होना गर्व की बात तब होती जब वो मुश्किल हालात से नहीं घबराती, जब वो जिस्म से ऊपर उठकर एक शख्सियत बनते हुए, बुढ़ापे की दहलीज़ पर खड़ी होकर भी दुनिया की वाह्ट लगाती. उसके लिए एक बंगला बिकना मायने नहीं रखता. जब वो एक छोटे से फ़्लैट में भी उसी जोश के साथ ज़िन्दगी जीती. ऑटो में बैठते हुए जब समा को चक्कर महसूस हुए तब जाकर वो असली दुनिया में वापस आई. मेडीकल रिपोर्ट मिले दो दिन हो चुके थे और वो अभी तक किसी नतीजे तक नहीं पहुंची थी. घर जाते हुए उस पर फिर सोच सवार हो गई थी. दर्द का सामना करते हुए, मुश्किलों से निपटते हुए और तकलीफ़ों का मज़ा चखते हुए कई बार एहसास होता है कि ज़िन्दगी कितनी मज़ाकिया है. अपनी प्रेगनेंसी की बात वो किसी को नहीं बता सकती थी और उसने अभी तक तय भी नहीं किया था कि करना क्या है. मगर फिर भी पिछले पंद्रह मिनटों में उसके दुख की वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दी फ़िल्म इन्डस्ट्री थी.

******

26 साल की उम्र शुबह से भरी होती है. आप पिछले कुछ सालों में चुने गए रास्तों और रिश्तों को लेकर खुद से सवाल करने लगते हैं. सारी उम्र 20 साल के होने का इंतज़ार किया, बीस से हुए, उस उम्र में आप जोश से भरे रहे. हर सवाल का चुटकियों में जवाब हाज़िर होता है और फिर ठीक पांच साल बाद बेहद सख़्ती से आपको ज़िन्दगी की असली परीक्षा के आगे बिना कागज़-कलम के पटक दिया जाता है. ये परीक्षा वैसी ही होती है जिसमें आप देर से पहुंचे हों, जिसमें बार-बार पैन की इंक खत्म हो रही हो, हर सवाल का सवाब आप जानते हैं लेकिन समझ नहीं पा रहे लिखा कैसे जाए. कुछ सवालों को देखकर लगता है कि अरे! ये तो मैंने पढ़ा था, मगर जवाब याद नहीं आ रहा. नौकरी है लेकिन ये वो तो नहीं जो हम चाहते थे, प्रेमी है मगर ये वैसा तो नहीं जैसा हमने सोचा था, अरे! मैं तो घूमना चाहती थी, ड्राइविंग सीखना चाहती थी, अब तक तो मुझे प्यानो बजाना आ जाना चाहिए था. उफ़! मैं ऐसी ज़िन्दगी तो नहीं चाहती थी, मैं पीछे रह जाऊंगी, मैं नाकाम इन्सान बन कर रह जाऊंगी. मैं किन मुसिबतों में फंसी हूं, कैसे लोगों के बीच अपना वक्त बर्बाद कर रही हूं. मुझे कुछ कड़े फ़ैसले लेने होंगे, कुछ सख्त कदम आगे बढ़ाने होंगे. मैंने कदम बढ़ा लिया है, मेरी ज़िन्दगी रातों रात बदल गई है, मैं प्यानो बजा रही हूं, मैं गाड़ी चलाना सीख रही हूं, मैं मज़बूत फ़ैसले ले रही हूं, मैं सधी हुई, खुद की तय की हुई ज़िन्दगी जी रही हूं. अब मैं मुस्कुरा रही हूं. “समा, क्या सोच-सोच कर मुस्कुरा रही हो” मधू ने पानी रखते हुए पूछा. ‘ओह्ह्ह…धत तेरे की…सोचती रह जाऊंगी और वक़्त हाथ से निकल जाएगा’ समा ने ग्लास लिया और पानी ऐसे खत्म किया जैसे ये पानी ही उसके और उसके कड़े फ़ैसलों के बीच रुकावट बना हुआ था. 

“मधू मैं प्रेगनेंट हूं” समा ने थोड़ी ऊंची आवाज़ में कहा
“क्या?” मधू ने इधर-उधर देखते हुए फुसफुसा कर पूछा
“मुझे पता नहीं क्या ठीक होगा” समा ने अपने सर पर हाथ रखते हुए कहा
“तू पागल हो गई है” मधू को अब तक यकीन ही नहीं आया था
“मैं सच कह रही हूं” समा ने मधू की तरफ़ देखा
“ये कैसे, आई मीन…तेरा तो ब्रेकअप…ओफ़्फ़ो” मधू सोफ़े से खड़ी होकर टहलने लगी थी
समा संडे की छुट्टी पर सुबह-सुबह मधू के घर पहुंच गई थी. चार दिन बीत चुके थे और उसे आज ही कोई फ़ैसला लेना था. मधू के अलावा वो और कहीं जा भी नहीं सकती थी. समा के आस-पास इस मामले में मधू से ज़्यादा तजुरबा और किसी के पास नहीं था. 
“कितने महीने?” मधू ने पूछा
“दो” समा मिमियाई
“शोभित?” सवाल दाग़ा गया
“और कौन?” समा ने चिढ़ कर कहा
“कमीना” मधू बड़बड़ाई
“यार, सिर्फ़ उसकी गलती थोड़े ना है” समा ने बराबर की ज़िम्मेदारी ली
“अच्छा….क्यों? सिर्फ़ उसकी गलती कैसे नहीं है? बेशक उसी की है, सौ प्रतिशत उसी की” मधू फुंकारी
समा हथियार डाल चुकी थी
“साला…बच्चा बाप के नाम पर जाना जाएगा, कहलाएगा इनके खानदान का, होगा इनके घर का चिराग, तलाक ले लो तो बच्चा छीनने के लिए ये मुकदमा करेंगे, इन्हें पालो-पोसो बड़ा करो फिर भी एडमिशन करवाते वक्त सबसे पहले बाप का नाम पूछा जाएगा, जब बच्चा होने के बाद पहला हक़ इनका है तो बच्चा ना हो इसकी ज़िम्मेदारी भी इनकी है” मधू लगभग चिल्ला रही थी
समा ने धीरे से कहा “लेकिन शरीर तो हमारा है, नुकसान तो हमारा होगा”
“वो तो है ही, मर्द मौकापरस्त होते हैं और कुदरत इनका साथ देती है. सीधी सी बात है जिसका हक उसकी ज़िम्मेदारी. यार, गोलियां खा-खा कर मेरे चेहरे और जिस्म पर बेशुमार दाने हो गए थे, फिर पति महाशय कहते हैं कॉपर-टी लगवा लो, वो भी किया. पता है समा, मुझे कितनी ज़्यादा ब्लीडिंग होती थी? इन्फ़ेक्शन हो गया था, डॉक्टर को दिखाया तो पता चला ठीक से लगी नहीं थी, ठीक करवायी, फिर कुछ हफ़्तों बाद वही हाल” मधू धीरे-धीरे कह रही थी
“लेकिन वो तो सेफ़ होती है ना” समा ने पूछा
“हां होती है लेकिन शरीर से तो छेड़छाड़ ही है ना, सही-गलत हो सकता है, डॉक्टर पर भी डिपेंड करता है, यार…मैं ये कहना चाहती हूं कि इतना झंझट ही क्यों जब आदमी के पास इससे कहीं ज़्यादा आसान उपाय मौजूद है? बली की बकरी हम बने ही क्यों जब इसकी कोई खास ज़रूरत नहीं है. मधू फिर गुस्से में आ गई थी.
“तू सही कह रही है. अगर मर्द अपनी प्रेमिका या बीवी के जिस्म से ऐसी छेड़छाड़ ना होने देना चाहे तभी तो ज़िम्मेदारी लेगा. गलती हम लड़कियों की भी है, हम अपने लिये खड़ी नहीं होतीं, बस प्रेमी का दिल खुश करने में लगी रहती हैं. खुद को उनकी जायदाद समझ लेती हैं. हमें खुद से प्यार करना सीखना होगा. खुद को सबसे ज़्यादा एहमियत देनी होगी. अपने लिये लड़ना होगा, रोज़ रात दासी बन कर पति के सामने हाज़िर नहीं होना, बल्कि अपने भले के लिये विरोध करना सीखना होगा” समा अपनी जगह से उठकर खिड़की के पास आ गई थी. सामने वाली बालकनी में एक नई-नवेली दुल्हन अपने बाल सुखा रही थी. उसके हाथों की महंदी बिल्कुल लाल थी. उसकी आंखों में वो शर्म थी जो उसे बचपन से घुट्टी बना-बना कर पिलाई गई थी. 

“मधू, मुझे ये बच्चा नहीं चाहिए” समा ने खिड़की की तरफ़ से मुंह मोड़ लिया था
“अच्छे से सोच ले” मधू समा की तरफ़ गौर से देखते हुए बोली
“मैंने सोच लिया है, ये मेरा शरीर है. अगर बच्चा होता है तो उसे मुझे पालना होगा. अभी मेरे दिल में बच्चा पालने की कोई ख्वाहिश नहीं है. अगले कुछ सालों में भी मैं ऐसा कुछ नहीं चाहती.” समा आराम से कह रही थी
“तुम्हे पता है, धर्म इसे हत्या मानता है” मधू अब मुस्कुरा रही थी, जैसे कह रही हो देखो अपने साथ क्या खेल खेला गया है
“धर्म तो मुझ जैसी अविवाहित स्त्री को कोड़े मार-मार कर मौत के हवाले कर देने का आदेश भी देता है. वही धर्म मर्द को ऐसी कोई सज़ा नहीं सुनाता. जबकि औरत और मर्द एकसाथ हम बिस्तर होते हैं. लेकिन सज़ा सिर्फ़ औरत को. सब खेल है मधू, सदियों पुराना बुना गया जाल जो तुम्हें और मुझे फंसाता है.” समा बैग कंधे पर लटका चुकी थी.
“तो ये एक ज़िन्दगी खत्म करना नहीं है” मधू समा की आंखों में देख रही थी, जैसे भरोसा चाहती हो.
“ये एक नई ज़िन्दगी की शुरुआत है जिसमें मैं अहद लेती हूं कि अब मुझसे ना कोई खेलेगा, ना मैं खुद को किसी के लिए मुश्किलों में डालूंगी” समा ने मधू का बैग उठाकर उसके कंधे पर लटकाया और आगे बढ़कर दरवाज़ा खोल दिया.
******

Wednesday, August 8, 2012

क्यूं घुटती हैं फ़िज़ाएं


ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपी ‘नेशनल स्टडी ऑफ़ डेथ (इंडिया)’ 2010 के अनुसार एक पढ़े लिखे मर्द में आत्महत्या करने की गुंजाइश 46 प्रतिशत होती है. वहीं एक पढ़ी-लिखी महिला के लिये ये गुंजाइश बढ़ कर 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. भारत में एक बच्ची के लिए घर से बाहर निकल कर स्कूल तक जाने का रास्ता कई सवालों और तानों को चीरकर निकलता है. कॉलेज तक पहुंचते-पहुंचते ज़्यादातर घरवालों की आज़ाद ख्याली पस्त हो जाती है. वो बच्ची से युवती बनी अपनी बेटी के सीने पर दुपट्टा डालकर उसे सिलाई-कढ़ाई में जीने की कला सिखाने लगते हैं. जो युवती सुई-धागों को पारकर युनिवर्सिटी के मैदान तक पहुंचती है वो प्रगतिशील मानी जाती है. 2009-2010 की कैटलिस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक जहां ग्रामीण इलाकों में पैसे कमाने वाली महिलाएं 26 प्रतिशत हैं वहीं शहरों में ये तादाद 14 प्रतिशत पर ठहर जाती है. यानि उच्च शिक्षा के बावजूद मुट्ठीभर महिलाएं ही आत्मनिर्भरता की तरफ़ कदम बढ़ा पाती हैं. बाकि बची महिलाओं की प्रगतिशीलता चूल्हे के धुंए के साथ उड़ जाती है.

मर्दों की इस दुनिया में औरत की हैसियत बदबू करती फ़िज़ा की लाश जैसी है. जिसके करीब जाने के लिए नाक को कपड़े से ढंकना पड़ता है. औरत का अस्तित्व गीतिका के ख्वाबों जैसा है जिसकी उड़ान कोई और तय करता है. रंग-बिरंगी, शोख़ और बेबाक ज़िंदगी जीने के बावजूद क्यूं एक औरत को अकेलापन चुनना पड़ता है. ऊंचे ओहदे तक पहुंचने के बावजूद ऐसा क्या है जो एक औरत ज़िंदगी की गोद में बेबस महसूस करने लगती है. मौत ही आखिरी रास्ता क्यों बचता है. विवेका बाबाजी, नफ़ीसा जोसेफ़ या कुलजीत रंधावा फ़ैशन जगत के झिलमिलाते सितारे थे, पैसा, शोहरत और आलिशान पोशाकों ने एक वक्त पर ज़िन्दगी को चमकदार बनाया हुआ था. रैंप पर चलते हुए इनकी चाल में वो शान होती जो हार को रास्ता बदने पर मज़बूर कर दे. लेकिन रैंप की वो अकड़ ज़िंदगी में क्यूं नहीं उतर सकी. करियर की ढलान के साथ ये खुद भी क्यूं ढल गईं.

एक आम राय है कि चकाचौंध आखिर अंधा ही करती है. लेकिन फ़िज़ा तो एक वकील थी. और गीतिका ऐयर-होस्टेस. ना तो मोटी-मोटी किताबों को पढ़कर काले कोट तक पहुंचना आसान है और ना ही ऊंची-ऊंची सैंडल पहनकर दिन भर खड़े रह कर मुस्कुराते हुए चाय परोसना आसान है. जहां एक को करते हुए सिर दुखता है, वहीं दूसरे से कमर. इन आत्महत्याओं से कवयित्री मधुमिता शुक्ला और गायिका भंवरी देवी की हत्या की डोर भी जुड़ती हुई दिखती है.

मर्दों का बनाया समाज औरत की आज़ादी की सीमा निर्धारित करता है. वो स्त्रीवाद के नाम पर औरत को उसके घर से बाहर तो निकाल लेता है लेकिन अपने घर में जगह नहीं देता. एक स्त्री को बचपन से ही निर्भरता की ट्रेनिंग दी जाती है. उसे चलना नहीं, घिसटना सिखाया जाता है. किताबों के बीच भी उसे चावल की किस्में सिखाई जाती हैं. होम-वर्क के साथ ही उसे भाई की किताबों पर कवर चढ़ाना याद करवाया जाता है. सुबह अपनी यूनिफ़ॉर्म के साथ वो भाई की स्कूल की शर्ट और पिता की टाई भी इस्त्री करती है. ट्यूशन जाने से पहले उसे किचन के बर्तन और भाई का कमरा साफ़ करना होता है. खेल में भाई उसे मार सकता है लेकिन उसे हंसते हुए बात को टालना होगा क्युंकि उसे सिखाया गया है कि भाई तुमसे प्यार करता है. हालांकि वो खुद प्यार में दो-चार मुक्के अपने भाई को नहीं रसीद कर सकती. क्युंकि उसके बाद प्यारा भाई उसका भुरता बना देगा. पति परमेश्वर है तो कॉलेज में बना दोस्त भी उसी कैटेगरी का ट्रीट्मेंट चाहता है. बचपन से पिलाई गई घुट्टी कितना असर करती है अब दिखेगा. दोस्त की ऐंठ वैसी ही जैसी पिता की मां पर देखती है. इससे क्यों बात की, उसकी तरफ़ क्यों देखा. बचपन में भाई का होमवर्क करती थी. अब परमेश्वर-दोस्त के असाइमेंट बनाने लगी. उसने देखा बचपन की सीख बिल्कुल सटीक है. रिश्ते निभाने के लिए उसे किनारे खड़े होना होगा. केंद्र में हमेशा कोई पुरुष होना ही चाहिए. कभी भाई, कभी पिता, कभी परमेश्वर-दोस्त, कभी पति. वहीं एक मर्द को ये समाज बचपन से ही शोषक बनना सिखाता है. हम अपने बेटों को ‘गोपाल कांडा’ बना रहे हैं. जिसके लिए औरत अपने घर से सिर्फ़ मर्दों का दिल बहलाने के लिए निकलती है.

एक स्त्री का अकेलापन पुरुष के अकेलेपन से बेहद अलग होता है. स्त्री को एक साथी चाहिए ताकि वो उस साथी की परवाह कर सके. किसी का ख्याल रख सके. उस किसी के सिर पर हाथ रखकर उसकी बंद होती आंखें देख सके. अब चाहे वो कितने भी ऊंचे ओहदे पर हो या उसके अकाउंट में कितना भी पैसा हो. वो इन सब के बल पर अपना ख्याल रखवाने के लिए नौकर तो रख सकती है लेकिन ऐसा साथी नहीं ढ़ूंढ़ सकती जिसके लिए खुद उसके मन में परवाह हो. समाज में पुरुष हमेशा संपूर्ण और निश्छल रहता है. फ़िज़ा उर्फ़ अनुराधा चांद मोहम्मद उर्फ़ चन्द्रमोहन से ये जानते हुए शादी करती है कि उसने अपनी पहली पत्नी को नहीं छोड़ा. वहीं चंद्रमोहन की पहली पत्नी भी फ़िज़ा और उसकी शादी की बात जानते हुए उसे फिर से अपना लेती है. हिसार के बिश्नोई मंदिर में पूजा-पाठ कर के चांद मोहम्मद को फिर से चंद्र मोहन बना लिया जाता है. 2007 में कोर्ट, गर्भवती मधुमिता शुक्ला की हत्या करवाने के मामले में उसके प्रेमी अमरमणी त्रिपाठी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है. और 2007 के उत्तर प्रदेश असेंबली इलेक्शन में वही अमरमणी त्रिपाठी महाराजगंज डिस्ट्रिक्ट से सीट जीतता है.

औरत के लिए वापसी का कोई दरवाज़ा नहीं है. उसकी गलतियों पर ना तो उसे समाज माफ़ करता है और ना ही खुद उसके अपने घर वाले. एक बार चौखट लांगने के बाद वो लौट नहीं सकती. शायद यही वजह है कि दुनिया जीतने के बाद भी वो खुद को हारा हुआ ही महसूस करती है. ज़िन्दगी की नींव हमारे सही-गलत फ़ैसलों पर रखी जाती है. लेकिन औरत को गलत फ़ैसले करने के बाद फिर से एक नई शुरुआत करने का हक नहीं है. जब सामने का रास्ता अंधकारमय हो और पीछे का किवाड़ अंदर से बंद हो तो फ़िज़ाएं घुटने लगती हैं.

Monday, July 23, 2012

अगर हेल्मेट ना पहना होता तो मैं ज़िन्दा ना बचती.



रोमांच वो शब्द है जिसे कहते वक्त आंखों में रौशनी भर जाती है. आमतौर पर पहाड़ों को लांगते हुए, पानी की तहों में सैर करते हुए या हवाओं से रोमांस करते हुए रोमांच को जिया जाता है. कुछ इसी तरह से मैंने भी अपने कुछ दोस्तों के साथ इस शब्द को चखने की ठानी. पिछले दिनों मैं घूमने के लिए लद्दाख जा रही थी. दिल्ली से लद्दाख के इस सफ़र को ना तो बस से तय करना था, ना ही ट्रेन की पटरियों से गुज़रना था. ग्यारह सौ किलोमीटर की दूरी बाइक से नापनी थी. हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से इलाक़े स्वारघाट के पास हमारी बाइक के ब्रेक फ़ेल हुए. एक बेलगाम मगर चालाक बैल की तरह बाइक पहाड़ियों के बीच बने टेढ़े-मेढ़े गोल-मोल रास्ते पर नाचते हुए हमें खाई में पटक कर खुद किनारे बने फ़ेन्स से टकरा कर वहीं गिर गई.  

बाइक चलाने वाला मेरा दोस्त सुरक्षित था लेकिन मुझे काफ़ी चोटें आई. मेरा चेहरा सूज गया, सर सुन हो गया और माथे से लेकर परों तक जिस्म छिल गया. मगर मैं ज़िन्दा थी. इसकी वजह था वो ‘हेल्मेट’ जिसे मैं बचपन में ’हेम्लेट’ कहती और घर पर सब हंस देते. ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है ये वाक्य हज़ारों बार कहा और सुना है पर मौत कितनी बेपरवाह है इस सच से पहली दफ़ा रूबरू हुई. देखने वालों ने बताया कि मैं पेड़ों और पत्थरों से टकराई जिससे मेरा ‘हेम्लेट’ खुल गया, और फिर लगभग घसिटते हुए तीन-चार सौ फ़ूट गहरी खाई में गिरी. मज़े कि बात है कि मुझे उस वक्त जिस्म को महसूस हुआ कोई भी दर्द याद नहीं. अगर मैं मर भी जाती तो मुझे पता ना चलता कि मैं मर गई हूं. कुछ लोगों ने उठा कर ट्रॉली में डाला (हां, डाला…ना कि लिटाया. क्युंकि उस वक्त मैं बस एक सामान थी जिसे मरम्मत की ज़रूरत थी). डॉक्टरी इलाज के बाद अब मैं ठीक हूं. अगर सिर पर लगने वाली पहली या दूसरी चोट के वक्त मेरे सर पर वो सुरक्षा कवच जिसे लोग हेल्मेट और मैं ‘हेम्लेट’ कहती थी ना होता, तो बेशक आज या तो मैं ज़िन्दा ना होती या फिर ज़हनी तवाज़ुन खो चुकी होती.

भारत के लगभग सभी शहरों में दो पहिया वाहनों के पीछे बैठी महिलाओं को हेल्मेट ना पहनने के लिए जुर्माना नहीं देना पड़ता. दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में महिलाओं को ये छूट सिख समुदाये की बदौलत मिली है. असल में सिख महिलाओं को धार्मिक रूप से सिर पर टोपी पहनना मना है. दिल्ली सरकार ने सिख समुदाये की भावनाओं को आहत होने से बचाने के लिए महिलाओं को ये छूट दी है. अब ज़ाहिर सी बात है दो पहिया वाहन पर पीछे सवारी करने वाली औरत से कभी कोई ट्रैफ़िक हवलदार उसका धर्म तो नहीं पूछता. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक साल 2010 में सड़क पर मरने वाले लोगों की तादाद 133,938 थी. हर साल देश भर में हेल्मेट ना पहनने की वजह से हज़ारों लोग घायल होते हैं. जिनमें स्कूटर या बाइक के पीछे बैठने वालों की संख्या अच्छी-खासी होती है.

इस मसले पर हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को तकरीबन दो महीने पहले ऑर्डर दिया था, जिसकी मियाद 25 जून को खत्म हो चुकी है. इसके बावजूद दिल्ली सरकार ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया. बल्कि शीला दीक्षित सरकार और ट्रांस्पोर्ट मिनिस्टर अरविंदर सिंघ ने ‘दिल्ली मोटर वेहिकल्स रूल्स 1993’ के रूल 115(2) का हवाला देकर मामला रफ़ा-दफ़ा करना चाहा. जिसके तहत महिलाओं के लिए हेल्मेट पहना अनिवार्य नहीं है. अब एक बार फिर हाई कॉर्ट ने दिल्ली सरकार को नोटिस भेजा है. ज़ाहिर सी बात है सरकार को महिलाओं की सुरक्षा से ज़्यादा अपने वोट बैंक की फ़िक्र है. जहां तक बात धर्म की है तो इसका लचीला होना बेहद ज़रूरी है. सिख धर्म में बाल कटवाना सख्त मना है लेकिन जब किसी सिख व्यक्ति के सिर का ऑपरेशन होना होता है तो उसके बाल काटे जाते हैं. जिस्म के दूसरे हिस्सों के बाल भी मेडिकल ज़रूरत के हिसाब से काटें-छांटें जाते हैं. ऐसे में महिलाओं के हेल्मेट पहनने का विरोध बेमानी लगता है.

हाई कॉर्ट नोटिस दे सकती है, सरकार कानून बना सकती है. लेकिन अपने सिरों  पर हेल्मेट लगाने और कार की सीट-बेल्ट बांधने का काम हमें खुद करना होगा. हो सकता है हम एक-आध बार जुर्माना देकर ट्रैफ़िक पुलिस से बच जाएं. पर जब मौत दस्तक देती है तो जुर्माने में दो-चार सौ रुपये नहीं बल्कि हाथ-पैर या जान भी देनी पड़ जाती है. मेरी सांसों को ‘हेम्लेट’ ने बचाया किसी सरकार ने नहीं. बेहतर होगा हम कानून में बदलाव का इंतज़ार छोड़ें और खुद में बदलाव लाएं. अगर हम खुद अपनी ज़िंदगी की परवाह नहीं करते तो यकीन मानिये सरकार को आपसे कुछ खास लेना-देना नहीं है.