Sunday, 6 November 2011

इन्सान नहीं हैवान

बकरा ईद उन त्योहारों में से है जिनमें जहालत और ज़लालत की हद पार होती है. बकरों-भेड़ों को ऊंचे दामों पर खरीद के लाना अपने घर में बांधना, प्यार करना, पुचकारना और फिर कुछ रोज़ बाद ईद पर अपने आंगन में ही उसे ज़िबह (बलि) कर देना. पूरा आंगन खून से लाल, गर्दन एक तरफ़ पड़ी छटपटा रही होती है और बकरे को खींच कर ऊंचाई पर टांग दिया जाता है. जब जिस्म का सारा खून बह जाता है तब कसाई आ कर उसे ले जाता है और शाम तक उसके छोटे-छोटे खाने लायक टुकड़े कर के घर पहुंचा देता है. रात को खाने में वो जानवर जिसे दो दिन पहले तक बहुत दुलारा जा रहा था मसाले में भुन कर चटकारे ले लेकर खाया जाता है. इस्लाम में बकरा ईद के बारे में ये मान्यता है कि इन्सान को क़ुर्बानी दिये जाने वाले जानवर से जितना लगाव और जुड़ाव होगा क़ुरबानी उतना ही पुण्य दिलायेगी. ऐसा नहीं है कि क़ुर्बानी का चलन सिर्फ़ इस्लाम में है, भारत के कई हिस्सों में मनोकामना पूरी करने के लिये तांत्रिकों के सामने जानवरों यहां तक कि बच्चों की भी बलि दी जाती रही है. मगर फिर भी दोनों ही मसले पूरी तरह से अलग हैं. बकरा ईद पर जो होता है वो खुले आम सीना चौड़ा कर के बेहिसों की तरह होता है. सबसे बड़ी बात ये है कि ज़्यादातर घरों में ये सब इस कदर बेनियाज़ी से होता है कि घर के बच्चे भी जानते हैं उनका प्यारा पालतू बकरा कल खूंटी से बंधने की जगह प्लेट में आ जायेगा.

ऐसे ही बेशर्मी के त्योहारों में से एक है करवा-चौथ. कोई पति अपनी पत्नी से प्यार करता है, उसकी फ़िक्र करता है तो ये कैसे मुमकिन है कि पत्नी दिनभर कुछ खाये पिये ना और पति महोदय आराम से अपनी उम्र बढ़वाते रहें. इसी लिस्ट में छठ और तीज भी शामिल हैं जहां बेटे और भाई के लिये औरत दिन भर भूखी रहती है. ठंड के मौसम में पानी में नंगे पांव घंटों खड़ी रहती है. समाज के कई त्योहार इन्सान से इन्सानियत का लबादा उतारते रहते हैं.

इश्वर के आगे अपनी श्रद्दा साबित करने के लिये जानवर की क़ुरबानी देना ज़रूरी है. मर्द के आगे अपना प्यार साबित करने के लिये भूखा रहना ज़रूरी है. घूमफिर कर बात आती है खुद को या किसी और को तकलीफ़ देने की. ये तो साइकॉलजी भी मानती है कि जानते बूझते खुद को दर्द देना या फिर किसी को चोट पहुंचा कर खुशी मनाना दिमागी बीमारी है.

इन्सान से बड़ा वहशी जानवर कोई नहीं है, अगर आप इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते तो इन्सान के खुशियों भरे त्योहारों, मान्यताओं या फिर खेलों पर नज़र डाल लीजिये. इन्सान अपने फ़ायदे के लिए वक़्त-वक़्त पर कुदरत के तोहफ़ों को उजाड़ता रहा है. चाहे फ़र्नीचर बनाने के लिये पेड़ काटने हों या फ़ैक्ट्रियों के लिये जंगल के जंगल उजाड़ने हों.

अब हमारे खेल ही देख लीजिये कुश्ती या बॉक्सिंग. एक आदमी दूसरे को तब तक पीटेगा जब तक सामने वाला लहुलुहान ना हो जाये. एक के दांत टूटेंगे तो दूसरे की आंख फूटेगी. एक खिलाड़ी दूसरे को उठा कर ज़ोर से ज़मीन पर पटकेगा और भीड़ में जोश भर जायेगा. उस पर सफ़ाई में ये भी कहा जायेगा कि बॉक्सिंग में कैसे मारना है और कैसे नहीं इसके नियम होते हैं. इसीलिए ये खेल ग़ैर-कानूनी नहीं है बल्कि हैवानियत के मेडल भी मिलते हैं. अमरीका में यू.एफ़.सी (अल्टीमेट फ़ाइटिंग चैम्पियनशिप) की मार-काट को भी खेल ही कहा जाता है. यहां तक कि यू.एफ़.सी को खास कर ये कह कर प्रमोट किया जाता है कि इसमें को नियम नहीं. कई बड़े देशों में महंगे टिकट खरीद मां-बाप अपने बच्चों को लेकर ये वहशीपन देखने जाते हैं. इस खेल में भीड़ बस खून देखना चाहती है, शोर में बस यही सुनायी देता है “बहुत अच्छे, मारो, मारो”. एक खिलाड़ी को जब ज़ोर से मुंह पर मुक्का पड़ेगा और उसका जबड़ा टूट जायेगा तो शोर उठेगा “वाह! क्या बात है…किल हिम किल हिम”. स्पेन की बुलफ़ाइटिंग में हज़ारों लोग सांड और आदमी की भिड़ंत देखने जुटते हैं. सब लोग आदमी के ज़िंदा रहने की कामना करते हैं सांड को पहले एक तलवार से ज़ख्मी किया जाता है और फिर जंग शुरू होती है. खेल के आखिर में कोई एक मरता है, अगर आदमी मर जाये तो भीड़ को बड़ा दुख पहुंचता है. खेल को सफल तब माना जाता है जब सांड के खून से मिट्टी सन जाती है और वो मैदान में दम तोड़्ता है.

वैसे तो हम अक्सर ही अपने वहशी होने का सुबूत देते रहे हैं पर हमारे शौक़, त्योहार और मान्यताएं हमारी इन्सानियत की नौटंकी की पोल खोलती रहती है. स्वामी विवेकानंन्द के अनुसार “मज़बूत बनो क्युंकि बलि हमेशा भेड़ या बकरे की दी जाती है, शेर की नहीं” तो हम शेर तो नहीं बने क्युंकि उसके पास ज़िन्दा रहने का और कोई साधन नहीं है, वो मारेगा तभी जीएगा पर हम शौक़, स्वाद और आस्था का विश्वास दिलाने के लिये मारते हैं, भूखा रखते हैं यहां तक कि सिर्फ़ मज़े के लिये किसी को पीट-पीट कर उसका चेहरा सुजा देते हैं.

अगर आप अब भी मानते हैं कि इन्सान न्रम दिल है. तो पिछले दिनों चाइना में हुई घटना को याद कीजिये जहां दो साल की एक बच्ची को सड़क पर मरता हुआ छोड़ दिया गया था. क़रीब अठारह लोग बच्ची के पास से गुज़रे पर किसी ने भी उसे अस्पताल पहुंचाने की ज़हमत नहीं उठाई. एक-दो लोग आंख मूंद कर चलते बनें तो इत्तेफ़ाक मान सकते हैं पर इतने लोग बिना मदद किये गुज़र जायें तो सवाल खुद पर ही उठने लगता है. हमें ज़िन्दगी नहीं खून पसन्द है, हंसी नहीं चीख लुभाती है, सुकून नहीं खौफ़ सुलाता है. हम इन्सान नहीं हैवान हैं.

Monday, 29 August 2011

एक अनशन राजू का ...

भारतीय सिनेमा में हीरो वो होता है जो दस गुन्डों से अकेले लड़ जाए, जो इन्सानियत की मूरत हो और जो कभी गलत न हो. काला रंग बॉलीवुड के ’हीरो’को छू कर भी नहीं गुज़रता. वहीं अभिनेत्री आदर्श पत्नी या प्रेमिका होती है. वो बस कुरबानियां देती है वो नाचने वाली नहीं होती. अगर होती है तो उसे उस शख़्स से प्यार हो जाता है जो उसके कुंवारेपन को विदा करता है. मसलन उमराव जान या अनारकली. यहां तक कि ’नो एन्ट्री’की बिपाशा बसु जैसे किरदारों को भी किसी मजबूरी से जोड़ कर जस्टीफ़ाय किया जाता है. अगर कोई बार डांसर है तो वो बेशक ही बुरी औरत होगी जो चालाकियां करती है और बेचारी सती-सावित्री हिरोइन को सताती है.

फ़िल्म गाइड इन सभी स्टीरिओ टाइप किस्सों और हिस्सों से परे है. यहां वहीदा अपने पति को छोड़ती है, पैरों में घूंघर बांधती है पर किसी मजबूरी के तहत नहीं बल्कि अपने शौक और अपनी कला के लिए. अपने प्रेमी यानि राजू की मदद और प्रोत्साहन से खूब पैसा कमाने के बाद भी वो उसके चरणों की दासी नहीं बनती. बल्कि उलटा वो उससे ऊबने लगती है. राजू को शराब से झूलता और जूए में झूमता देख वो उसे लौटा लाने की कोशिशें नहीं करती. गाइड का राजू शरत चन्द्र का देवदास नहीं है वो अपनी अकड़ का गुलाम नहीं है ना ही उसे इस बात पर गुरूर है कि वो कभी झुकता नहीं. उसकी कमज़ोरियां उस पर हावी नहीं है. वो बहुत ही आम सा शख़्स है अपनी ज़िन्दगी में मौजूद औरत के लिए धोखाधड़ी कर सकता है,अपने यहां काम करने वाले लोगों पर गुस्से में चिल्ला सकता है यहां तक की मुसीबत में डर कर भाग सकता है. राजू की कमज़ोरियां उतनी ही आम या खास हैं जितनी किसी भी ऐसे मध्यवर्गी आदमी की होंगी जिसके पास अचानक से खूब सारा पैसा आ जाए. तो ऐसा क्या है जो देवसाहब की गाइड हिन्दी सिनेमा की क्लासिक है.

जेल, प्रेम, दुनिया और फिर स्वामी. फ़िल्म ’गाइड’ का राजू अहसासों से होता हुआ, पैसे में तैरता हुआ, ताश के पत्तों में भटकता हुआ, प्रेम की डोर को कभी थामता हुआ कभी काटता हुआ इन्सान के अनगिनत रूपों का मेल है बल्कि इन्सान के अन्दर छुपे कई इन्सानों को समेटता हुआ वो सबके जैसा होते हुए भी सबसे अलग है. रोज़ी उर्फ़ नलिनी शादी के बंधन को तोड़ते हुए, खुद की ज़िन्दगी और इच्छाओं के लिए खड़े होते हुए फिर प्रेम में गिरफ़्त होकर कमज़ोर होने वाली मगर प्रेम पर आंखें बंद कर विश्वास ना करने वाली, प्रेमी के शराब और जूए में डूबने से रोने नहीं झल्लाने वाली आम होते हुए भी बेहद खास औरत है.

सच और झूठ से चरित्र का निर्माण नहीं होता, चरित्र का निर्माण इन्सान के उठाए कदमों से होता है. इस एक बात से ही राजू किताबी और फ़िल्मी पुरुष से ऊपर उठ जाता है. वो एक शादीशुदा औरत से प्रेम करता है, उसके सो चुके ख़्वाबों को जगाता है. उससे दूर हो जाने के डर से धोखाधड़ी करता है. पकड़ा जाता है जेल पहुंचता है फिर लौट कर नहीं आता, चला जाता है एक ऐसी दुनिया में जहां लोग उसे महात्मा मानते हैं.वहां राजू मन्दिर में रहता है, गांव की तरक्क़ी के लिए काम करता है तो भोलेभाले लोग गांव में स्कूल और अस्पताल खुलने को चमत्कार समझ बैठते हैं. सूखा पड़ने पर जब मौत गांव पर अपने पंख फ़ैला देती है तो गांव वालों का अपने महात्मा पर किया अटूट विश्वास हिम्मत बंधाने लगता है. उम्मीद जब विश्वास से जुड़ती है तब आखों के सामने का सच बेमायने हो जाता है, आखें वही देखती हैं जिसकी परछाई ज़हन में तैर रही होती है. कई दफ़ा खुद का सच दूसरे के यकीन के आगे दम तोड़ देता है राजू भी अपने सच को किनारे रख चल पड़ता है उम्मीद और विश्वास के उस रास्ते पर जहां से गुज़रना उसे ढोंगी भी बना सकता था. बिलखती गिड़गिड़ाती आस्था के आगे राजू झुकता है और उस आस्था को ओढ़ बारिश के लिये उपवास रखता है.

सही-गलत, सच-झूठ, विश्वास-अंधविश्वास इन्सान के अन्दर होने वाले लड़ाईयों से शुरू होकर दुनिया में जंग का रूप लेता है. अगर मन में सवाल ही ना रहें तो जवाब के लिए ना भटकना होगा ना तड़पना होगा. हम क्यूं हैं, ज़िन्दगी का मतलब क्या है, सैंकड़ों लोगों में हमारे दर्द कितनी एहमियत रखते हैं, क्यूं दिन रात महनत करके कमाना है, क्यूं फिर उस कमाई को खुद पर ही उड़ाना है. ज़िन्दगी माना क़ीमती है पर जीना है क्या ? क्या यूंही पैदा होने, पढ़ने-लिखने, नौकरी की तलाश करने, टीवी देखने, खरीदारी करने, खूब घी-तेल खाने, जिम में जाकर वज़न घटाने, मीठे के लिए बेसब्र होने और फिर डायबटीज़ से जूझने...दिली ख्वाहिशों के पीछे भागते हुए एक दिन दिल के दौरे से ख़त्म हो जाने के लिये। ये चक्कर पूरी दुनिया को हर सांस को, हर आत्मा को दबोचे हुए है।

इसी चक्कर से मुक्त होते हुए राजू की आवाज़ बहुत तेज़ गूंजती है पर उसका शरीर इतना विशाल हो जाता है कि वो गूंज उसके अंदर ही ऊंची, धीमी,बेहद धीमी और फिर विलीन हो जाती है. राजू को मरने से पहले एक साफ़ रास्ता दिख जाता है जहां वो गर्म ठंडक और सर्द गर्मी महसूस करता हुआ. बारिश ले आता है, ज़मीन उसे समा लेती है जैसे बारिश की बूंदों को सोख लेती है.

Monday, 22 August 2011

’बेइमानी के खिलाफ़ खड़े नहीं हो सकते तो ईमानदार नहीं हैं’

इस देश में मन्दिरों-मस्जिदों के लिए दंगे हुए हैं, टेक्स बढ़ाए जाने पर आवाज़ें उठी हैं, किसी फ़िल्म को बैन करने की मांग को लेकर तोड़-फोड़ हुई है. यहां तक की वैलेन्टाइन डे के विरोध में भी चीखना चिल्लाना हुआ है. लेकिन ’भ्रष्टाचार’ को आज़ादी के 65 साल बाद भी लड़ाई का बड़ा मुद्दा नहीं माना जाता था. आज बिना किसी स्वार्थ के पांच साल के बच्चे से लेकर सत्तर साल के बुज़ुर्ग भी एक साथ, एक मुद्दे के लिए, एक आवाज़ में साथ आए हैं. इसे जोश कहा जा सकता है वक़्ती जुनून भी कहा जा सकता है. लेकिन इसे हलका नहीं माना जा सकता. उन हालात में जब प्रधानमंत्री अपने पास जादुई छड़ी ना होने का अफ़सोस करते रहते हैं और गठबंधन की सरकार होने की मजबूरी पर रोते रहते हैं ऐसे में सिर्फ़ यही कहा जा सकता है कि अगर आप बेइमानी के खिलाफ़ खड़े नहीं हो सकते तो आप इमानदार नहीं हैं.

आज कई लोग जन लोकपाल बिल के साथ खड़े नहीं हैं उनका मानना है कि किसी एक कानून से बदलाव नहीं लाया जा सकता या फिर देश में पहले ही भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये कई कानून हैं ज़रूरत है उनको मज़बूत बनाने की. अन्ना को नौटंकी बताने वाले अलग अलग तबकों से हैं जैसे ओबामा के भारत आने पर सड़कों पर उतरने वाले लोग, नक्सल कार्यवाई के विरोध में ग्रहमंत्री को काले झंडे दिखाने वाले लोग, इंडिया के क्रिकेट मैच हार जाने पर भिन्नाने वाले लोग. कई लोगों का ये भी मानना है कि अन्ना के पीछे विदेशी ताकतें हैं वर्ना कोई समाजिक कार्यकर्ता इतना समर्थन कैसे जुटा सकता है. कई ये भी कहते हैं कि ये आंदोलन ब्राहमणवादी है इसमे दलितों और अल्पसंख्यकों की जगह नहीं है. यहां तक कि ससंद पर भरोसा करने की हिदायत भी दी जा रही है.

पहली बात, किसी भी बड़े बदलाव की शुरूआत एक छोटे से कदम से ही होती है, ऐसा नहीं है कि एक कानून बना, कुछ कागज़ात साइन हुए और समाज बदल जाएगा, देश में हर कोई स्वस्थ और सुखी हो जाएगा. सवाल है पहला कदम बढ़ाने की. राइट टू इन्फ़ॉरमेशन या इलेक्शन कमिशन का अपने पैरों पर खड़ा होना इस बात का सुबूत है. संविधान में बेशक ऐसे कानून हैं जो भ्रष्टाचार की नकेल खींच सकते हैं पर एक छोटा सा छेद भी नाव को डुबाने के लिए काफ़ी होता है. उस छेद को ’लूप होल’ कहते हैं.

दूसरी बात, अमरीका हमारा दुश्मन है या चीन हम पर भारी हो रहा है मानने वाला तबका ये क्यूं भूल जाता है कि घर का भेदी लंका ढाए. जब तक हम खुद अपने बीच से अपनी ही जड़ें खोखली करने वालों को ढूंढ-ढूंढ कर नहीं निकाल लेते तब तक किसी भी दुश्मन से लड़ने में हम नाकाम ही होंगे. हर शख़्स यही मानता है कि भ्रष्टाचार एक दीमक है पर इसके लिए हमें आपसी मतभेद को किनारे रखना होगा, दो अलग अलग सोच रखने वाले भाई अगर अपनी मां को मौत की कगार पर देखें तो पहला हाथ उसे अस्पताल ले जाने के लिए बढ़ना चाहिए नाकि ये तय करने के लिए कि पड़ोसी हमारे आंगन में पैर पसार रहा है.

तीसरी बात, लोगों के बीच जोश भरना सबसे आसान काम भी है और सबसे मुश्किल भी. नौकरी पेशा लोग जब अपने ऑफ़िस के बाद कंधे पर बैग लटकाए केंडलमार्च करते हैं, घर में बैठ कर टीवी पर सास-बहू सीरियल देखने वाली औरतें या फिर छात्र-छात्राएं कॉलेज कैंपस की जगह तिहाड़ जेल के सामने रात बिताते हैं तो इतना तो तय हो जाता है कि ये लड़ाई सबकी है. शहर के आस-पास बसे गांव से लोग जब खुद चल कर अन्ना को देखने आते हैं. बूढ़ी औरतें, मां-बाप अपने बच्चों को साथ लिए जब एक इन्सान में उम्मीद की किरन देखते हैं तो ये भी साफ़ होता है कि भ्रष्टाचार वाकई आम इंसान को चोट देता है. ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं कि जन लोकपाल के लिए हो रहे आंदोलन में शामिल सभी लोग इसकी पेचीदगियों को समझें, इनकी सीधी समझ तो इतना ही बताती है कि जब मैं किसी सरकारी दफ़्तर में जाऊं तो सौ रुपय चपरासी को और हज़ार रुपय अफ़सर को ना देने पड़ें. राजनितिक पार्टियां अगर ’राजनैतिक’ पार्टियां होतीं तो वो ज़रूर समझतीं कि भाषण सुनने के लिए लोगों को पैसा देकर बुलाना ज़रूरी नहीं होता.

चौथी बात, जैसे हर मुसलमान उग्रवादी नहीं होता वैसे ही हर ब्राहमण गोल पेट वाला खाऊ इन्सान नहीं होता. जब हम स्त्रियों, मुसलमानों या दलितों के लिए किसी भी तरह के पुर्वाग्रहों का विरोध करते हैं तो उच्चजाति के लिए दीवार क्यूं नहीं तोड़ सकते. कुर्सी पर बैठने वाला किसी क्षेत्र और जाति का नहीं होता, वो बस अपनी जेबें भरना जानता है यही उसका मज़हब है.

पांचवी बात, किसी भी बड़े आंदोलन में एक नेता ज़रूर होता है. जिसे देख कर आम जन समूह आगे बढ़ सके. अन्ना और उनके सहयोगी इस बात को बखूबी जानते हैं. लोगों के बीच कोई भी फ़ैसला अन्ना के नाम से ही जाना चाहिए वो इस बात की बारीकी को समझते हैं, यहां ’पहले मैं’ की होड़ नहीं है. इतिहास के पन्नों पर नज़र दौड़ाएं तो पता चलेगा कि हर बड़े आन्दोलन के पीछे एक आवाज़ होती है जो उसे दिशा देती है. बिना आवाज़ के समूह का मतलब ही नहीं रह जाता.

ये बात भी सही है कि भ्रष्टाचार को खुद से मिटाने की ज़रूरत है तभी समाज से इसका खात्मा हो सकेगा लेकिन हम ये क्यूं भूल जाते हैं कि यहां आरटीआई के लिए काम करने वालों को गोली मारी जाती है, यहां अपनी ज़मीन के लिए लड़ने वाले किसानों की दिन-दहाड़े पिटाई होती है, यहां मंत्रियों की बड़ी-बड़ी मूर्तियां बनती हैं और आम इन्सान को सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए रिश्वत देनी पड़ती है, पढ़ाई के लिए लोन मांगने पर बैंक मैनेजर को घूस खिलानी पड़ती है, यहां मिड-डे मील अफ़सर खा जाते हैं और सारी इमानदारी सड़कों के गढ्ढों में लुड़क जाती है. ऐसे में आप अकेले इमानदारी की मशाल कब तक जलाए रख सकते हैं. ज़रूरत है एक-जुट होने की नाकि एक दूसरे पर टूटने की.

किसी इन्सान की अच्छाई या बुरायी को कैसे आंका जाता है? उसके काम से, उसके पिछले कर्मों से या उसके सामाजिक जीवन की उप्लब्धियों से. रालेगांव सिद्धि की कामयाबी में अन्ना की लगन को लोग याद नहीं करना चाहते ना करें, 1990 में पद्मश्री और 1992 में पद्मभूषण पाने में भी गड़बड़ी देखते हैं तो भी ठीक है, उनके अनशनों के सबब आज तक 4 से 5 मंत्रियों को मंत्रीपद से हटाया जा चुका है वो भी लोग चाहें तो नकार सकते हैं. सूचना के अधिकार कानून में भी उनके योगदान को भुलाना चाहते हैं तो भुला दें. पर क्या मेग्सेसे पुरुस्कार पाने वाले, आरटीआई के मूवमेंट में अहम भूमिका निभाने वाले और टाटा स्टील में अपनी नौकरी छोड़ कर समाज के लिए काम करने वाले अरविन्द केजरीवाल को भी शक की नज़र से ही देखेंगे. या दिल्ली पुलिस में जान फूंकने वाली, सैंकड़ों पुरस्कार पाने वाली और हमेशा सही और सटीक बात कहने-करने वाली किरन बेदी को भी अगर शक्की निगाहों से देखेंगे तो बस एक ही बात कही जा सकती है. मेरी मां हमेशा कहती है ’जिसका खुद का इमान कमज़ोर होता है वो हर किसी पर शक करता है’.

Friday, 19 August 2011

निम्नवर्गीय लाश की कीमत

केरल हाई कोर्ट ने एयर इंडिया को पिछले साल हुए मेंग्लुरु विमान हादसे में मरने वालों के परिवारवालों को 75 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया है. इस विमान में 152 यात्री मारे गए थे. जबकि केन्द्रीय उड्डयन मंत्री ने दस लाख देने की घोषणा की थी. हिंदुस्तान के इतिहास में दंगे हों या धमाके, हादसे हों या लापरवाहियां कभी भी किसी भी निम्नवर्गीय लाश को इतनी रकम मुआवज़े में नहीं मिली. एनजीओ केस लड़ते रह जाते हैं अदालत में केस चलता रह जाता है और ये रकम मरने वालों के लिए 2 से 5 पहुँचती है, घायलों के लिए 10 हज़ार से 20 हज़ार पहुँचती है. भोपाल गेस त्रासदी मुआवज़े के नाम पर मानसिक शोषण का सबसे बड़ा उदाहरण है. बात साफ़ है, लाश की कीमत होती है. टाई कोर्ट वाली लाश तो 40 -50 से होते हुए 75 भी पहुँच सकते हैं वहीँ सस्ते कपड़ों या मैले कपड़ों वाली लाश की कीमत 5-6 लाख पर आकर दम तोड़ देती है.

तो आखिर लाश की क्या कीमत होती है. जब सांसें चली जाएँ तो शरीर की क्या एहमियत बचती है ? ख़ाक में मिल जाना या आग में जल जाना. लेकिन एक जिंदा शरीर, शोर मचाती साँसे किसी हादसे से लाश में बदल जाएँ तो उस लाश की कीमत तय की जा सकती है. दुनिया में कुछ भी हो सकता जो नियम ज़िन्दगी चलाने के लिए बने थे वो ज़िन्दगी के बाद भी इंसान को नहीं छोड़ते. जैसे ये एक नियम है कि इंसान के मरने के बाद उसे उसके धर्म अनुसार दफनाया या जलाया जाएगा. ये भी एक नियम है कि उसको श्रधांजलि दी जायेगी. ठीक वैसे ही ये भी एक नियम है कि अगर कोई इंसान किसी दुसरे की लापरवाही या गलती से परलोक सिधार जाये तो उसके घरवालों को मुआवजा दिया जाए. इसीलिए सरकार ट्रेन हो या प्लेन, मारे जाने वालों को मुआवजा देने का ऐलान करती है. लोअर कोर्ट, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट आदेश देता है कि हंसती खिलखिलाती ज़िन्दगी से मौत के कुएं में जाने वालों के करीबियों को क्या कीमत दी जाए. पिछले दिनों छपरा-मथुरा एक्सप्रेस हादसे में तकरीबन 50 लोग मारे गए और मारे जाने वालों के रिश्तेदारों को 2 लाख रूपए मुआवजा दिए जाने का ऐलान किया गया. इसके अलावा हालही में हुए मुंबई सीरियल ब्लास्ट में मारे गए 20 लोगों की मौत की कीमत पांच लाख लगी.

ट्रेन हादसे में मारे जाने वाले माध्यम वर्गीय होते हैं, स्लीपर क्लास में सोये लोगों की जेबें भी अक्सर सोती ही रहती हैं. वहीँ जनरल डिब्बे में एक टांग पर खड़े रहने वाले अपनी ज़िन्दगी में इतने धक्के और लातें खा चुके होते हैं कि डिब्बे की बदबू और गन्दगी उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती. वहीँ प्लेन में सफ़र करने वाले एक ख़ास तबके के लोग होते हैं. ये या तो रईस हैं या फिर कम से कम अमीरी की तरफ कदम बढाते उच्च माध्यम वर्गीय हैं. जान की कीमत उनके सफ़र करने के माध्यम पर निर्भर है. अगर किसी की जान इसलिए जाती है क्यूंकि रेल पटरी उखड़ी हुई थी या सरकारी यंत्रों में अचानक गड़बड़ी हो गयी या फिर मानवीय भूल की वजह से हुई. तो सरकार ज़िम्मेदारी लेते हुए मुआवज़े की रकम घोषित करती है. ठीक वैसे ही ख़राब सड़कों या ड्राइवर की गलती की वजह से जान जाए तब भी मौत के मुंह में पैसे भरे जाते हैं. बाज़ारों में होने वाले ब्लास्ट में जब कोई औरत साड़ी खरीदते हुए, कोई आदमी चाट-पकोड़ी खाते हुए, कोई बच्चा बर्फ का गोला खाने की चाह रखते हुए चार टुकड़ों में बिखर जाता है तब सरकार 2 या 5 लाख के मुआवज़े से अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करती है. वहीँ जब उच्च वर्गीय हिन्दुस्तानी प्लेन से सफ़र करते हुए मरते हैं तो मुआवज़ा उनका ‘लाइफ स्टेंडर्ड’ तय करता है.

असल में किसी को कितना मुआवज़ा मिलेगा इसके लिए एक फॉर्मेट तय होता है जैसे मरने वाले की कितनी तनख्वाह थी, कैसा बिज़नस था. मरने वाले की आय या हैसियत के हिसाब से ही उसके परिवार वालों को देने वाली राशि तय की जाती है. लेकिन अगर किसी माँ का हर महीने 5 हज़ार कमाने वाला बेटा मारा गया तो क्या गेरेंटी है कि वो ज़िन्दगी भर 5 हज़ार ही कमाता. या अगर किसी औरत का पति मजदूर है और वो 2 हज़ार महीना ही कमाता था तो ये बात कैसे मान ली जाए कि वो ज़िन्दगी भर मजदूरी ही करता. क्या पता वो एक दिन अपना काम शुरू करता, तरक्की पाता और एक बड़ा नाम बन जाता. ज़िन्दगी उम्मीदों और संभावनाओं से भरी होती है, यहाँ तो कभी भी कोई भी आसमान छू सकता है. पर कई बार सुरक्षा एजेंसियों के सोने की वजह से तो कभी सरकार के अंगड़ाइयां लेने की वजह से ना जाने कितनी ही संभावनाएं भस्म हो जाती हैं. तो क्या उन मौकों की कोई कीमत नहीं जो शायद उस मजदूर को 2 दिन बाद ही मिल सकता था या उस बेटे की संभावनाओं की कोई अहमियत नहीं जो एक हफ्ते बाद ही प्रमोशन पाने वाला था. मरने वाले छात्र के अगले महीने होने वाली आईएएस परीक्षाओं में टॉप करने की संभावना की भी कोई जगह नहीं.

इस देश में क्रिकेट विश्वकप जीत कर लाने पर खिलाड़ियों के ऊपर पैसों और तोहफों की बारिश होने लगती है. कोई राज्य सरकार 50 लाख देती है तो कोई 1 करोड़. किसी को शानदार गाडी भेंट की जाती है तो किसी को महंगा फ्लेट. केंद्र सरकार, राज्य सरकार, नेशनल पार्टियां हों या राज्य पार्टियाँ सभी के बीच जैसे बड़ी से बड़ी रकम इनाम में देने की होड़ लग जाती है. ऐसी कोई भी जल्दबाज़ी या जज़्बा कभी किसी दुर्घटना के बाद मरने वालों के परिवारों या घायलों के प्रति नहीं दिखाया जाता. जब एक पहले से ही बेहद अमीर खिलाड़ी को 1 करोड़ का इनाम देकर हौसला अफजाई की जा सकती है तो एक गरीब आदमी की मौत पर उसके परिवार का भविष्य सुधारने के लिए कोई सरकार आगे क्यूँ नहीं बढ़ती. वैसे ही रेल मंत्रालय किसी बॉक्सर, तीरंदाज़ के सिल्वर या गोल्ड मेडल जीतने पर, या क्रिकेटर के मन ऑफ़ द मैच जीतने पर उसे ज़िन्दगी भर के मुफ्त रेल पास भेंट करता है. जबकि जो लोग वाकई इसे इस्तमाल कर सकते हैं उन्हें सहानुभूती के तौर पर ऐसा कुछ भी उपलब्ध नहीं करवाया जाता.

मुंबई में पोश इलाकों से गुजरने वाली लोकल ट्रेन साफ़ सुथरी और आकर्षक होती हैं वहीँ गरीबों की बस्तियों या माध्यम वर्गियों के हिस्से आती है बदबू करतो मैली कुचैली लोकल ट्रेन. असल में गरीबों के हक को मार के अमीरों के शौक पूरे किये जाते हैं. बिलकुल सच है ‘वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता'.

Tuesday, 16 August 2011

राष्ट्रप्रेम या ‘राज’ प्रेम

जिस्म में सिहरन होना और चेहरे का लाल हो जाना. मैं किसी जोशीली मोहब्बत की बात नहीं कर रही बल्कि मैं बात कर रही हूँ उस देश भक्ति की जो राष्ट्रगान बजते ही हमें अजब सी एहसास से भर देती है. बचपन में राष्ट्रगान सुनते ही सीधे खड़े हो जाना और मजबूती से मुट्ठियाँ बंद करना सिखाया जाता है. इसका असर इतना गहरा होता है कि आज भी धुन कान में पड़ते ही ये जज़्बा घेर लेता है.

मुंबई में सिनेमा घरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य है. कई साल पहले मुंबई के सिनेमा थियेटर फिल्म के खत्म होने के बाद राष्ट्रगान चलाते थे मगर लोग देश भक्ति की भावना से गदगद होकर रुक कर खड़े होने की जगह थियेटर से बाहर जाने में ज्यादा दिलचस्पी लेते थे. ऐसे में राज्य सरकार को इस प्रथा को खत्म करना पड़ा. 2003 में नैशनल यूथ कॉंग्रेस ने मांग की थी कि सिनेमा थियेटरों में फिर से राष्ट्रगान चलाया जाये, कहना ये था कि अगर ज्यादा से ज्यादा लोग राष्ट्रगान सुनेंगे और एक साथ खड़े होकर देशभक्ति का सुबूत देंगे तो ये देश के लिए अच्छा होगा. इस बार लोगों को खड़े रखने का ये तरीका निकाला गया कि राष्ट्रगान को फिल्म के बाद चलाने की बजाय फिल्म से ठीक पहले चलाया जाए.

हो सकता है ‘मर्डर’, ‘जिस्म’, ‘हवस’, या फिर ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’, ‘मस्ती’ या ‘दबंग’ जैसी फिल्मों को देखने से पहले देशभक्ति का सुबूत देना ज़रूरी हो. ये भी हो सकता है कि मज़े से गप्पे मारते हुए लोगों का राष्ट्रगान शुरू होने पर मुह बिगाड़ कर खड़े हो जाना और खत्म होते ही फटाक से अपनी सीट पर फिर जम जाना देश के हित में हो. पर देशभक्ति का ये जज़्बा फ़िल्म देखने से पहले या बाद में ही दिखाना क्यूँ ज़रूरी है. क्या ऐसा ही कोई नियम लोक सभा या राज्य सभा के सत्रों के वक़्त नहीं होना चाहिए ताकि सफ़ेद कुर्तों में चमक रहे नेताओं को गाली गलोज करते वक़्त थोड़ी झिझक हो. या फिर राष्ट्र के हित वाले बिल रोकते हुए और अपने फायदे वाले बिल पास करते वक़्त शायद थोड़ी शर्म आए. इंटरटेनमेंट टैक्स भर कर फिल्म देखने जाने वाले लोगों का इस भावना को समझना ज्यादा ज़रूरी है या सरकारी गाड़ी में घूमने, सरकारी क्वाटरों में रहने, सरकारी संपत्ति को संभालने वालों को देश भक्ति की भावना को समझना ज्यादा ज़रूरी है.

राष्ट्रगान के इर्द गिर्द कई सवाल और बहस डोलते रहे हैं पर इन सवालों को समझते हुए भी भावना सही-गलत के ऊपर चढ़ ही जाती है. कई दफा बचपन की सीख को नकारने का जी चाहता है, कई दफा सोचा कि राष्ट्र गान के लिए खड़े होने से कौन सा फर्क आ जाएगा. ये दिखावा किस लिए और क्यूँ, क्या बस इसलिए कि प्रथा है. फिर बात ये आती है कि अगर प्रथा है तो प्रथाओं की कब सुनी है जो यहाँ ज़रूरी है. तो राष्ट्रगान सुन कर खड़े हो जाना ज़रूरी नहीं इसलिए हो क्यूंकि मन में सम्मान है बल्कि ये इसलिए भी हो सकता है कि आसपास खड़े लोग क्या कहेंगे. अजीब नज़रों से देखेंगे, धिक्कारेंगे कि तुम्हें अपने देश से प्यार नहीं. अगर कोई बुज़ुर्ग खड़े हों तो आपको भी खड़ा होना ही पड़ेगा वरना वो कहेंगे ज़रा भी शर्म नहीं है. 15 अगस्त पर झूमना हर जगह तिरंगे का फहराना जैसे एक दिन का जोश होता है वैसे ही राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रसम्मान भी 52 सेकेंड का ही होता है. उसके बाद लोग चैन की सांस लेते हैं ठीक वैसे ही जैसे अज़ान खत्म होते ही इस्लामिक घरों में टीवी की आवाज़ फिर बढ़ा दी जाती है.

तो अगर हमें अपने देश से इतना ही प्यार है तो हम कैसे बसों की सीटें ब्लेड से मज़ाक मज़ाक में काटते चले जाते हैं. कैसे सड़क किनारे रखे गमलों को अपनी शानदार गाड़ी से ठोकर मार कर गिरा देते हैं, कैसे बेशर्मी से बैग से निकाल कर बिस्किट और चिप्स के पाकेट बीच सड़क पर फ़ेंक देते हैं. इसके बावजूद देश भक्ति का सुबूत देते हुए सीना चौड़ा करके राष्ट्र गान तेज़ तेज़ गाते हैं. ये कुछ कुछ वैसा ही है जैसे कोई पति अकेले में तो अपनी पत्नी को रोज़ पीटता हो पर चार लोगों के सामने उसी बेचारी से खुशमिजाजी से बातें करे.

अभी तक राष्ट्रगान की ये ‘देश भक्त ज़बरदस्ती’ सिर्फ मुंबई में है पर एनसीपी के नेताओं ने वक़्त वक़्त पर ये फैसला पूरे भारत पर लागू करने की बात कही है. हो सकता है ऐसा करना भाईचारे की भावना पैदा करता हो पर यही राष्ट्रगान समय-समय पर भाईचारे को बिगाड़ता भी दिखा है. 1985 में केरल में एक स्कूल ने अपने कुछ छात्रों को स्कूल से इसलिए निकाल दिया था क्यूंकि उन्होंने राष्ट्रगान गाने से मना कर दिया था, वो बच्चे ‘जहोवा विटनेसस’ थे जिन्हें धार्मिक रीति रिवाज के तहत किसी भी देश के राष्ट्रगान को गाने या झंडे को सलाम करने से मनाही है. उस वक़्त कई राजनीतिक पार्टियों ने इसे मुद्दा बना कर राजनीति की थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना कर उन बच्चों को वापस स्कूल में दाखिल करवा दिया था.

बेहतर हो अगर हम अपने बच्चों को राष्ट्रगान रटवाने या सिनेमा घरों में एकता बढ़ाने को मुद्दा बनाने की बजाय एड्स, टीबी, तम्बाकू. यौन शिक्षा, छुआछूत या ईव-टीजिंग जैसे मुद्दों को एहमियत दें.

Thursday, 11 August 2011

आईना उलटा


सपने छुए? वो उड़ गए
ख्वाब चूमे? लो फुर गए,
क़दम बढ़ाए
राहों से खुद ही जुड़ गए...

आंसू बाधें? वो बह गए
अश्क रोके? लो गिर पड़े,
दिल में सांस भरी
देखो हंस पड़ी...

कल से भागे? टकरा गए
झूठी हिम्मत? लड़खड़ा गए,
अक्स-ए-आईना उलटा
बेवजह क्यूं शर्मिन्दा हुए...

Friday, 29 July 2011

इफ़ आई वर अ बॉय / अगर मैं लड़का होती

“अगर मैं एक दिन के लिये भी लड़का बन सकती तो मैं अपनी मर्ज़ी से देर तक घर के बाहर रुक सकती थी. दोस्तों के साथ बियर पीती, जो दिल चाहे वो करती और कोई मुझ पर किसी तरह का सवाल ना दाग़ता. अगर मुझे एक दिन के लिये भी लड़का बनने का मौका मिलता तो मैं जिसके साथ चाहती उसके साथ मस्ती करती और किसी के प्रति जवाबदेह ना होती.”

ये लफ़्ज़ किसी स्त्रीविमर्श वाली किताब के नहीं हैं. ना ही ये किसी ऐसी लेखिका के हैं जिन पर कुछ विवादस्पद लिख कर ज़बर्दस्ती लाइमलाइट में आने के आरोप लगते हों. ये लफ़्ज़ एक गीत के हैं, और कोई हिन्दी गाना नहीं बल्कि मशहूर पॉप गायिका ’बियॉन्से’ के एल्बम का गीत ’इफ़ आई वर अ बॉय’. मतलब ये कि खूब तरक़्की करते मुल्क, खुद को प्रगतिवादी मानते, स्त्री को समान अधिकार और आज़ादी देने की बात करने वाले मुल्कों में कोई गायिका ये गाती है “अगर मैं लड़का होती तो ज़िन्दगी अपने हिसाब से जीती”. स्त्री की आज़ादी को मॉड्र्न कपड़ों से जोड़ने वालों के लिये ये गीत एक सवाल है. ये सवाल कोई नया नहीं वही घिसा-पिटा पुराना सवाल है, आज़ादी असल में क्या है? जो कोई खुद तय करके मेरे हाथ में थमा दे कि लो तुम पढ़ो, लिखो, घूमो, अपनी मर्ज़ी के अनुसार कपड़े पहनो पर हां रात 10 बजे तक घर आ जाना. या फिर ये कि जाओ मैंने तुम्हें आज़ादी दी अपने अनुसार जीने की लेकिन मेरे अलावा किसी और के साथ तुम डांस नहीं करोगी. बात घुमा-फिरा कर वही है, मेरे लिये कोई कुछ तय ही क्युं करेगा ? क्या मैं बालिग नहीं, क्या मैं ज़िन्दगी में गलतियां करके खुद कुछ सीखने का हक नहीं रखती ? क्या ये ज़रूरी है कि मैं किसी से अपने अधिकार मांगती चलूं ? क्या मैं खुद अपने अधिकार अपने पास नहीं रख सकती ?

असल में औरत की आज़ादी मर्द की ग़ुलाम होती है, औरत की आज़ादी की किस्में, सतहें और शर्तें कोई तय करता है. आस-पास मौजूद बेहद प्रगतिशील जोड़ों पर अगर नज़र डालें तो दिखेगा किसकी परत कहां तक है. कोई अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ कपड़े पहन सकती है मगर ससुराल वालों के आगे उसे साड़ी ही पहननी है, तर्क ये कि “मुझे तो कोई परेशानी नहीं पर मेरे माता-पिता को अच्छा नहीं लगेगा कि उनकी बहु वेस्टर्न कपड़े पहने” जॉब करती महिला के पति का घर के कामकाज में हाथ ना बंटाना तो नॉर्मल है. इसके अलावा प्रेम-विवाह (जो अपने आप में प्रगतिवादी होने चाहिये) वहां भी दोयम दर्जे की आज़ादी का कॉन्सेप्ट दिखता है. शादी इन्टर कास्ट हो तो लड़की अपने जीने के तौर तरीके बदले और अगर ये इन्टर रिलिजन शादी है तब तो अपना धर्म, अपना नाम, अपने खान-पान के तरीक़ों को भी बदलना पड़ेगा. जिस नाम को पुकार पुकार कर प्रेम किया उसे एक झटके में बदल डाला जाता है. पहचान ही बदल दी और खुद को आधुनिक प्रेमी कहते हैं. ये सब कुछ बेशक किसी लड़के को नहीं करना पड़ता. कहते हैं प्रेम में खुद को मिटाना पड़ता है, अब ये बात अपनी शख्सियत को मिटा कर प्रेमी की ज़िन्दगी में पांव रखने वाली लड़की से ज़्यादा कौन समझेगा.

खैर, बियॉन्से के इस गीत में कुछ पंक्तियां और जोड़ी जा सकती हैं. अगर मैं लड़का होती तो अपने नाम को शान से सारी ज़िन्दगी अपनी साथ रखती, मुझे किसी रिश्ते को बनाने के लिये पुराने रिश्तों से मुहं ना मोड़ना पड़ता. मेरी तरक़्की को लोग तिरछी निगाहों से ना देखते, मेरी वाह-वाही पर कोई तन्ज़ ना मारता, तोहमत ना लगाता. मैं बारिश में बीच सड़क पर जी भर के भीग सकती, कोई घूर-घूर कर देखता नहीं. अगर मैं लड़का होती तो बेशक गर्मी के मौसम में भी दुपट्टा ना ओढ़े रहती. मौसम के अनुसार छोटे-बड़े कपड़े पहनती. अगर मैं लड़का होती तो शादी के लिये मेरा गोरा रंग होना ज़रूरी ना होता. मैं फ़ेशन करती तो नकचढ़ी और फ़ेशन ना करती तो ’बहनजी’ ना कहलाई जाती.

कुछ ऐसे सवाल भी खड़े होते हैं जिनके पूछने पर लड़कियों को ये सुनना पड़ता है ’अपनी हद में रहो’ या फिर ’हे भगवान, तू फिर शुरु हो गयी’. ये सवाल कुछ यूं हैं, मैं क्यूं अपनी आज़ादी बार-बार किसी और से मांगने जाती हूं. क्यूं सिर्फ़ सज-संवर कर खुद को गहने से लाद कर ही संतुष्ट हो जाती हूं. क्यूं नहीं मुझ में आग जलती क्यूं नहीं मैं घर के सारे परदे जला डालती. एशियाई देश हों, अरब मुल्क या फिर वेस्टर्न कन्ट्रीज़ मेरे अस्तित्व को लेकर हर जगह क्यूं मुझे झगड़ना ही पड़ता है, रिश्तों से निकलना ही पड़ता है. और क्यूं आदमी के लिये मेरी मोहब्बत आज़ादी की आबो-हवा में पहुंचते ही खांसना शुरु कर देती है.

ज़ाहिर सी बात है अगर वो लड़का होतीं तो ना तो ऐसे सवाल करतीं और ना ही गुनगुनाती ‘इफ़ आई वर अ बॉय’.

Sunday, 17 July 2011

तवायफ़ की इज़्ज़त

तवायफ़ की लुटती हुई इज़्ज़त बचाना और तीस मार खान को पकड़ना बेकार है. निर्देशक फ़रहा खान की फ़िल्म तीस मार खान में ये डायलॉग कम से कम १० बार तो बोला ही गया होगा. असल में इज़्ज़त का ठीका जिन लोगों ने ऊठाया है उन्हें तवायफ़ की हैसियत का अन्दाज़ा है. वो मानते हैं सौ लोगों के साथ हमबिस्तर होने से इज़्ज़त को मौत आ जाती है अब जो मर चुका उसे बचाने का क्या मतलब. वैसे इस डायलॉग में तवायफ़ की जगह आजकल रियेलिटी शो में बार-बार सुनायी जाने वाली मशहूर ’बीप’ का इस्तेमाल किया गया है. टीवी पर ये ’बीप’ बातचीत के दौरान गालियां छुपाने में जितनी कारगर साबित होती है ऊतनी ही यहां भी हुई है. मतलब यही कि साफ़-साफ़ समझ आता है नंबर मां का आया या बहन का या फिर गालियों की फ़ेहरिस्त में इजाद होकर कोई नया शब्द जुड़ा. सेंसर भी कमाल है, अपशब्दों पर ’बीप’ लगायेगा और निवस्र्त हिस्सों को ’मोज़ैक’ करेगा, पर दर्शक इतना बेवकूफ़ नहीं वो तो अपनी कल्पना शक्ति से उड़ता है. हर ’बीप’ और ’मोज़ैक’ का मतलब समझता है.

खैर, फ़रहा खान बॉलीवुड की गिनीचुनी महिला निर्देशकों में से एक हैं. उनकी बनायी फ़िल्में हिस्सों में मज़ेदार होती हैं, यानी कोई सीन बेतरह लोट-पोट कर देगा तो कोई खुद के बाल नोचने पर मजबूर करेगा. यही फ़रहा खान एक बार एक अवार्ड फ़ंकशन में फ़िल्ममेकर आशुतोश गोवारेकर से इसलिये भिड़ गयी थीं क्युंकि उन्होंने फ़रहा को स्टेज पर सबके सामने ’शट-अप’ कह दिया था. खुद के लिये ’शट-अप’ लफ़्ज़ इस्तेमाल किये जाने पर बेज़्ज़ती महसूस करने वाली निर्देशक तवायफ़ के अस्तित्व को हंसी में उड़ाती हैं. ज़ाहिर सी बात है वो ठहरीं इज़्ज़तदार औरत जो तीन बच्चों की मां है, साथ ही अपने काम में इतनी माहिर कि 'शीला की जवानी' आइटम नंबर को रिलीज़ से पहले ही हिट करवा दें. तवायफ़ का क्या है वो तो छोटी-छोटी जालियों से झांकने वाली औरत है, जिसका कोई पति नहीं, जिसके बच्चे पढ़ लिख नहीं पाते और जो ख़्वाबों को बिना ’बीप’ वाली गाली लम्बी सी देती है. वो गहरे रंग के चमकीले कपड़े तो पहनती है पर उसके पास रंगबिरंगी उमंगे नहीं होतीं. एक बात फिर भी कॉमन है, उसके पेशे में भी दूसरों के कपड़े उतारे जाते हैं फ़र्क इतना है निर्देशक ये ७०एमएम की स्क्रीन पर करते हैं और तवायफ़ बन्द कमरे में. फ़िल्म के किसी सीन को जब अश्लील बताया जाता है तो इज़्ज़तदार फ़िल्ममेकर उसे ’एस्थेटिक’ कहते हैं. इज़्ज़तदार अभिनेत्री की ’न्युड’ फोटो इज़्ज़तदार मेगज़ीन के पहले पन्ने पर छप कर सेल्स बढ़ाती है. इस तसवीर को इज़्ज़तदार फोटोअग्राफ़र ’आर्ट’ कहता है. सेक्स को जीवन का हिस्सा बताने वाले, 'आर्गुमेन्टेटिव कामासूत्र' किताब को हाथ में थामे लोग तवायफ़ लफ़्ज़ पर तंज़िया मुसकान बिखेरते हैं. तथाकथित प्रगतिवादी मानते हैं कि सेक्स के बिना समाज नहीं है लेकिन सेक्स-वर्कर समाज का हिस्सा नहीं है.

हां तो अक्षय कुमार जिस इज़्ज़त को लुटने से बचाने को बेकार बताते हैं उसका वाकई कोई भरोसा नहीं. ये कभी भी कहीं भी जा सकती है, कुछ की गाली-गलोज से चली जाती है. कुछ की थप्प्ड़ पड़ने से चली जाती है, बहुतों की शादी टूटने से चली जाती है. बच्चों के परीक्षा में फ़ेल होने से माता-पिता की इज़्ज़त चली जाती है तो माता-पिता के अनपढ़ होने से बच्चों की दोस्तों में चली जाती है. बेटी के घर से भागने पर भी इज़्ज़त जाती है और दहेज ना मिलने पर खुद बेटी की ससुराल में चली जाती है. दोस्त को जन्मदिन पर महंगा तोहफ़ा ना दे पाने के कारण अकसर ही जाती है. यहां तक की पड़ोसी अगर अपने यहां हो रही दावत में ना बुलायें तो भी ये इज़्ज़त बेज़्ज़ती में बदल जाती है. आम तौर पर इज़्ज़त जाती है या बेज़्ज़ती होती है पर इज़्ज़त लुटती तभी है जब किसी का ’रेप’ हो जाये. वैसे ’रेप’ का मतलब होता है किसी के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती कर शारीरिक सम्बंध बनाना. ’तीस मार खां’ के निर्माताओं को तवायफ़ की इज़्ज़त बचाना इसलिये बेकार लगता है क्युंकि वो सेक्स के लिये पैसे चार्ज करती है. वो अनछुई नहीं है साथ ही उसका कोई पति भी नहीं है. तो तवायफ़ का ’रेप’ तो हो सकता है पर उसकी इज़्ज़्त नहीं लुट सकती.

कुछ दिन पहले मैत्री पुष्प का एक उपन्यास पढ़ा ’गुनाह-बेगुनाह’ जिसमें एक वैश्या पुलिस थाने में रिमांड के दौरान बताती है कि वो जब १३ साल की थी तो अपने माता-पिता के साथ रहती थी. एक दिन उसकी मां ने उसे अपने पास बुला कर समझाया “बेटी अब तू बड़ी हो गयी है सो घर से बाहर निकलना, लड़कों के साथ खेल-कूद बंद कर. कहीं कोई ऊंच-नीच हो गयी तो तेरे पिता कहीं मुहं दिखाने लायक नहीं रहेंगे, उनकी इज़्ज़त लुट जायेगी.” कुछ रोज़ बाद जब वो घर में अकेली थी तो खुद उसके पिता ने उसका बलात्कार किया. जब उसने अपनी मां को बताया तो घर पर खूब बवाल हुआ. आखिरकार मां उसके पास आयी और बोली “बेटी ये बात किसी को नहीं बताना वरना तेरे पिता कहीं मुहं दिखाने लायक नहीं रहेंगे, उनकी इज़्ज़त चली जायेगी’. शायद इज़्ज़त चली जाने और इज़्ज़त लुट जाने में यही फ़र्क होता है.

Wednesday, 6 July 2011

चाहती हूं सीधी होना



एक आसान से रास्ते पर
चलते हुए,
एक सुलझी हुई मंज़िल तक
पहुंचने की तमन्ना…
एक सीधी पगडन्डी से
गुज़रते हुए,
शाम ढले घर तक
पहुंचने की चाहत…
चाहती हूं कभी-कभी एक 'हीरो’ की
मनचली ’फ़ैन’ होना,
एक पॉप स्टार की दीवानी,
एक पसंदीदा रंग,
एक मनपसंद ’टूरिस्ट स्पॉट’,
एक शख्स की हंसी
में जहान देखना,
उसी की आंखों में
सुबहो शाम देखना…
यूं तो वो सीधी राहें,
मेरे उल्टे-पुल्टे लाइफ़ मैप
पर सूट नहीं करतीं…
वो फ़िल्मी हीरो,
वो गिटार बजाने वाला
मेरे दिल में जगह
बना नहीं सकता,
घर का दरवाज़ा भी
आधी रात से पहले
बुला नहीं सकता…
ना तो कोई एक रंग
मुझे बहला सकता है,
ना तो बस एक ही
शहर टहला सकता है…
सौ रास्तों से गुज़रते हुए
अनजान मंज़िल का ठिकाना,
टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से मीलों
चले जाना…
असहज, अजीब, असमान्य, अनैतिक
ही है मेरा चुनाव,
'आसान' था पर मैंने चुना नहीं…

Tuesday, 10 May 2011

चल कुछ किताबें जोड़ें...

चल कुछ किताबें जोड़ें

कुछ पन्ने उलटायें

कुछ स्याही बिखेरें

कुछ दवात गिरायें...

चल अब...

कि बहुत हुआ

चूल्हा-चकला, बर्तन-कपड़े

चल कि अब खत्म करे

सिलाई-कढ़ाई, हार-झुमके

सिलाइयां पीछे छोड़े,

क़लम उठायें,

ज़ंजीर उतारें, सिंदूर फेंके

नकाब को मिलकर

आग में झोंके...

पायल अड़े तो उसे भी तोड़ें,

ज़ुल्फ़ फंसे तो उसे भी खोलें,

चल कि अब

बारिश में सड़क किनारे बैठें,

एक छत ढूंढ़ें

एक चादर बिछाये...

कुछ किताबें जोड़ें

कुछ पन्ने उलटायें

कुछ स्याही बिखेरें

कुछ दवात गिरायें...