Wednesday, 6 July 2011

चाहती हूं सीधी होना



एक आसान से रास्ते पर
चलते हुए,
एक सुलझी हुई मंज़िल तक
पहुंचने की तमन्ना…
एक सीधी पगडन्डी से
गुज़रते हुए,
शाम ढले घर तक
पहुंचने की चाहत…
चाहती हूं कभी-कभी एक 'हीरो’ की
मनचली ’फ़ैन’ होना,
एक पॉप स्टार की दीवानी,
एक पसंदीदा रंग,
एक मनपसंद ’टूरिस्ट स्पॉट’,
एक शख्स की हंसी
में जहान देखना,
उसी की आंखों में
सुबहो शाम देखना…
यूं तो वो सीधी राहें,
मेरे उल्टे-पुल्टे लाइफ़ मैप
पर सूट नहीं करतीं…
वो फ़िल्मी हीरो,
वो गिटार बजाने वाला
मेरे दिल में जगह
बना नहीं सकता,
घर का दरवाज़ा भी
आधी रात से पहले
बुला नहीं सकता…
ना तो कोई एक रंग
मुझे बहला सकता है,
ना तो बस एक ही
शहर टहला सकता है…
सौ रास्तों से गुज़रते हुए
अनजान मंज़िल का ठिकाना,
टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से मीलों
चले जाना…
असहज, अजीब, असमान्य, अनैतिक
ही है मेरा चुनाव,
'आसान' था पर मैंने चुना नहीं…

15 comments:

  1. umashankar singh6 July 2011 at 02:14

    लीक पर नहीं
    अपनी बनाई राह पर
    चलूंगी
    मैं ही
    कभी लड़खड़ाते
    कभी सधे हुए कदमों से
    गिरुंगी मैं ही
    संभलूंगी भी मैं ही
    अपनी ही अंगुली पकड़ कर
    किसी और की जिंदगी
    नहीं जियूंगी
    और मौत भी अपनी ही मरुंगी
    पर इस छोटी सी जिंदगी और मौत के बीच
    जो धरती होगी
    वह मेरी होगी
    खालिस मेरी
    जिंदगानी से भरपूर
    और
    मोहब्बत से लबरेज
    छलकेगा इसका पैमाना
    जहां जहां
    वहां नहीं लगे कोई तीरथ
    कोई मेला
    कोई गम नहीं
    पर अपने पैरों के निशां
    तो होंगे ही न?

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  2. चंचल, नटखट
    पागल, प्यारी
    तू है मेरी
    राजदुलारी...

    बहुत अच्छी कविता लिखी है फ़ौज़िया... इन रास्तों पर तुम बहुत अच्छे से चलोगे...

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  3. किसी कवी ने भी कहा है कि लीक छांडि तीनही चलें, शायर सिंह सपूत। वही काम आप भी कर रही हैं। बधाई।

    ------
    जादुई चिकित्‍सा !
    इश्‍क के जितने थे कीड़े बिलबिला कर आ गये...।

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  4. यही विडम्बना है, जब राह सरल होती है, चाह जटिल होने लगती है।

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  5. एक रास्ता है जिन्दगी जो थम गये तो कुछ नहीं...
    ये कदम किसी मुकाम पर रुक गये तो कुछ नहीं..

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  6. यथार्थ के धरातल पर रहते हुए भी सपने देखना और उनके कभी पूरा हो जाने की कामना लिए हुए जिए जाना.. यही तो दुनिया है इसके सिवा और क्या..???

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  7. मुश्किल रास्ते चुनने वाले ही सफ़ल होते है।

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  8. असहज, अजीब, असमान्य, अनैतिक

    ही है मेरा चुनाव,

    जीवन का रोमांच भी तो इसी में है फौजिया जी !

    उमाशंकर जी ने आपके भावों को ही बड़ी खूबसूरती से विस्तार दे दिया है .....सच कहूँ तो आपके व्यक्तित्व का एसेंस उड़ेल दिया है उन्होंने. आप दोनों को ही साधुवाद.

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  9. न 'आसान' तुम्हारा चुनाव हो सकता है, नही आसान तुम्हे चुन सकता है.... तुम्हें और तुम्हारे जीवन को व्यक्त करती इस कविता ने दिल छू लिया...

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  10. nice!

    lafzon ke daayare na do.. khayaal ko uDaan do :)

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  11. acha likha hai
    kaafi simple hai
    sunday ko chai ke saath likha hoga

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  12. @shabnam khan : bohot lajwaab likha hai aapke cment ne focus kavita se chura liya

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  13. मुस्कुराहटें . . . :) :)

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  14. sunder.....chunao aasaan kaha hota vo to hamesha hi kathin hota hai....shabd jo chune vo kamal.....behad saral hote hua bhi khud me gahanta ka libaas pahne hua......manobhavo ka akalpnye tarah se vistaar hai ye....

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  15. नरंद्र तोमर4 February 2012 at 23:20

    सहज होना अक्‍सर सबसे मुश्किल होता है। बहुत सहज सी लगी आपकी यह पेशकश। बधाई।

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