Wednesday, 26 December 2012

जब नियम की किताब एक होगी…



बलात्कार को लेकर तीन बातें सुनने में बहुत आती हैं. पहली, लड़कियों के कम कपड़ों की वजह से बलात्कार या छेड़-छाड़ होती है. ये एक ऐसा बयान है जो इस दर्जे का भी नहीं कि उसपर चर्चा की जा सके, क्योंकि हम बखूबी जानते हैं बलात्कार 6 साल की बच्ची का भी होता है और साठ साल की दादी की सूरत वाली बुज़ुर्ग महिला का भी. दूसरी, बलात्कार शहरों में होते हैं क्युंकि यहां लड़कियां घर से बाहर निकलती हैं, लेकिन हम ये भी जनते हैं कि बलात्कार या उत्पीड़न के अधिकतर मामले घर में मौजूद सदस्यों द्वारा ही अन्जाम दिए जाते हैं. तीसरी बात कम सुनने में आती है, वो है बलात्कार दबे-कुचले इलाकों में ज़्यादा होते हैं क्योंकि वहां मर्द के भीतर कुंठाएं होती हैं, जबकि ‘प्रोग्रेसिव’ समाज में लड़के-लड़कियां एक एक-दूसरे से घुले-मिले रहते हैं सो वहां ऐसा कम होता है. अगर हम न्यूयॉर्क को दिल्ली से ज़्यादा प्रोग्रेसिव और मॉडर्न मानते हैं तो ये जानकार हैरानी हो सकती है साल 2011 में जहां दिल्ली में 568 बलात्कार के केस दर्ज करवाए गए, वहीं न्यूयॉर्क में ये आंकड़ा 2752 को छूता है, लंडन में 3334 और अरसों तक बराबरी और हक के लिए लड़ने वाले नेल्सन मन्डेला के दक्षिण एफ़्रिका की प्रादेशिक राजधानी केपटाउन में साल 2011 में 64514 बलात्कार के केस दर्ज हुए.

नौकरी करने, पैसा कमाने, अपनी पसंद के कपड़े पहनने या शादी करने से अगर बराबरी और इज़्ज़त मिलती तो दुनिया के इन मशहूर शहरों में लड़कियों को कॉलेजों, अस्पतालों या सड़कों पर ज़ोर-ज़बर्दस्ती का सामना नहीं करना पड़ता. अपने पैरों पर खड़े होने का मतलब अगर बैंक-बैलेंस होता तो मशहूर पॉप स्टार रिहाना अपने बॉयफ़्रेंड क्रिस ब्राउन से लगातार पिटने के बाद, कम्प्लेंट करवाने के बाद, सज़ा दिलवाने के बाद फिर उसी के साथ हंसते मुस्कुराते हुए पार्टियों में नज़र नहीं आतीं. ये सूरते-हाल हमें साफ़-साफ़ कहती है तुम केवल एक शरीर हो, तुम अपने पति-प्रेमी से पिटोगी और फिर बाहों में भी भरोगी.”
बलात्कार एक ज़हनियत है, जो औरत को मर्द से कम आंकती है, जो उसे सिर्फ़ भोगने की वस्तू बनाती है. वही ज़हनियत जो कई पुलिस एस.एच.ओ से कहलवाती है बलात्कार में लड़की की मर्ज़ी शामिल होती है. वही ज़हनियत जो पढ़े-लिखे समाज में भी दहेज की परंपरा को बनाए हुए है, ये ज़हनियत घरेलू हिंसा को गांव हो या शहर, भारत हो या विदेश हवा देती रहती है. फ़र्क बस इतना है कि कोई साड़ी के पल्लू से चेहरे के निशान ढंकती है तो कोई काले चश्मे की शह लेती है.

मेरे पिछले ऑफ़िस में एक लड़की थी हर वक्त अपने काम में मगन रहती. उसका ऑफ़िस के एक साथी से प्रेम-संबंध था. एक दिन किसी ने दोनों को ऑफ़िस के एक हिस्से में चुंबन करते देख लिया. ज़ाहिर सी बात है फिर बॉस को तो पता चलना ही था. बॉस ने आनन-फ़ानन में उस लड़की को ऑफ़िस से निकाल दिया. मगर वो लड़का आज दो साल के बाद भी उसी कंपनी में सिर उठाकर काम कर रहा है. स्कूल के दिनों की बात है जब एक लड़की के माता-पिता को इसलिए तलब किया गया था क्योंकि उसे अपने जन्मदिन पर एक दोस्त ने गुलाब के फूल दिए थे. ज़ाहिर सी बात है यहां भी फूल देने वाले लड़के को टीचर ने खुद ही समझा-बुझा दिया था. जिस समाज में प्रेम संबंध से बढ़ी नज़दिकियों के लिए लड़की को दोषी समझा जाता है, बल्कि इसके लिए बिना सुनवाई किए सज़ा भी सुना दी जाती है. वहां उम्मीद करना कि रातोंरात कोई बदलाव आएगा और सदियों से चले आ रहे नियम बदल जाएंगे नादानी होगी. ऑफ़िस परिसर में अपने प्रेमी से नज़दिकियां बढ़ाना अगर गलत है तो उस जुर्म के सहभागी दोनों हुए, कच्ची उम्र में संभलने की सीख अगर फूल लेने वाली को मिलनी चाहिए तो फूल देने वाले को भी मिलनी चाहिए. औरत और मर्द होने के आधार पर समाज के नियम बदल जाना ही बलात्कार की नींव रखता है.

दिल्ली में हर साल मुम्बई के मुकाबले कितने अधिक बलात्कार के केस दर्ज होते हैं, इसपर रीसर्च की जा सकती है. गांव-देहात के छुपे कमरों में कितनी बच्चियां इन हालात के आगे आवाज़ किए बगैर घुटने टेक देती हैं, इसपर बहस सुनी जा सकती है या काश दामिनी बस की जगह द्वारका को जाने वाले मेट्रो ले लेती, सोचकर मन में उठी टीस पर छटपटाया जा सकता है। पर सवाल और जवाब अभी भी वही रहेंगे, इन्सान के लिए लिंग, जाति, धर्म या रंग के आधार पर बने अलग-अलग नियमों ने वक्त-वक्त पर सड़कों पर प्रदर्शन करवाए हैं, बसें जलवाई हैं और लाठियां बरसाई हैं. बदलाव की लहर को स्कूली किताबों से गुज़रते हुए, घरों के ड्रॉइंग रूम में चाय-पानी के वक्त रुकना होगा. मां-बाप जब बेटे और बेटी को अपनी राय रखने का बराबर मौका देंगे. भाई देखेगा कि उसकी बहन सिर्फ़ बात-बात पर डांट खाने के लिए नहीं है. बेटा देखेगा कि उसकी मां का अपना वुजूद है. वो जो नौकरी से आने के बाद सीधा किचन में नहीं घुस जाती, वो जो ऑफ़िस जाने से पहले अकेले खड़े होकर पूरे घर का खाना नहीं बनाती. जब औरत को आधुनिकता का लिबास उढ़ाकर उसके कमाए पैसे और जिस्म पर अधिकार नहीं जमाया जाएगा. 
बलात्कार के ऊपर जाते आंकड़े तब थमेंगे जब समाज में ये सोच विकसित हो सके कि बलात्कार शारिरिक उत्पीड़न से ज़्यादा कुछ भी नहीं. इससे कोई इज़्ज़त-विज़्ज़त नहीं जाती. जब गर्मियों के मौसम में आदमी के शॉर्ट्स पहने को आराम और औरत के शॉर्ट्स पहनने को फ़ैशन का नाम ना दिया जाए. जब आदमी का सेहतमंद होना और औरत का पतला-दुबला होना खूबसूरती का पैमाना ना हो. जब एक ही नियमों की किताब से हम पढ़ना और पढ़ाना सीख जाएं।  

Saturday, 29 September 2012

फ़ैसला



वो गिर जाती अगर दीवार ना थामती. अब क्या करे? डाक्टर के पास जाए? एक बार कन्फ़र्म करे? या चुपचाप जाकर टीवी पर एम.टीवी देखकर ‘चिल’ करे. शायद ये सब अपने आप ही ठीक हो जाए, शायद यूंही सीढ़ीयों से उसका पैर फिसले और सब नॉर्मल हो जाए. उसने उन तीन मिनटों में जाने क्या-क्या सोचा. मन ही मन तय किया, ये आखिरी बार था जब उसने शोभित की बात मानी, आगे से वो बिल्कुल नहीं सुनेगी कि ‘जान, खत्म हो गया है… जाकर लाना होगा… बस एक बार… एक बार से कुछ नहीं होगा’ अब उसे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था, क्युं उसकी बात मानी, जिस्म मेरा तो इसकी ज़िम्मेदारी भी मेरी है, ठीक है वो प्यार करता था लेकिन अगर वाकई करता तो यूं उसे ‘ईमोशनली ब्लेकमेल’ ना करता. उस वक्त वो बस एक मर्द था पर मैं तो औरत ही थी ना, वो सिर्फ़ अपने जिस्म की सुन सकता है पर मैं? मुझे तो समझना चाहिए था ना, आखिर नुकसान मेरा ही होगा…पर उस वक्त कहां होश था. ये तीन मिनट कितने भारी थे वही जानती थी. दुनिया जहान का सही-गलत उन तीन मिनटों में ही दिमाग में उतर रहा था, अभी तक तो जैसे ख्वाब में जी रही थी. फिर जब उसने प्रेग्नेन्सी-टेस्ट में सफ़ेद प्लास्टिक पर दो लाल लाइनों को चमकते देखा उसे लगा वो बाथरूम में चक्कर खा कर गिर जाएगी…जब वो शोभित से अलग हुई थी तब उसे अन्दाज़ा नहीं था कि अगले कुछ हफ़्तों में उसे इतनी बड़ी मुसीबत से दो-चार होना पड़ेगा. शुरु में तो वो समझती रही कि ये ज़हनी तनाव है जिसके सबब इस बार देर हो रही है, फिर जब कुछ हफ़्ते और गुज़रे तो उसका ‘इन्टुशन’ कहने लगा ज़रूर कुछ गड़बड़ है. वैसे भी औरतों का ‘इन्टुशन’ अक्सर सही ही होता है. लेकिन जब यही अन्दाज़ा, हिसाब-किताब ग़लत साबित होता है तो तकलीफ़ होने से ज़्यादा खुद पर गुस्सा आने लगता है कि कैसे सच को पहचानने में गलती कर दी. कई दफ़ा तो बहुत वक़्त तक यकीन ही नहीं होता कि जिसे हम आज तक जानते थे वो तो बिल्कुल ग़लत था, हमारे ‘इन्टुशन’ ने हमारे साथ ग़ज़ब का मज़ाक किया है.

समा ने कभी सोचा भी नहीं था शोभित दूर हो जाएगा, वैसे भी कोई भी प्यार करने वाला रिश्ते के पहले दिन ये तो नहीं सोचता कि ये बस कुछ दिनों का लगाव है, कुछ दिनों का साथ है. सब यही सोचते हैं हम अजर-अमर प्रेम का हिस्सा बनने जा रहे हैं और हमारे जैसा कभी किसी ने महसूस ही नहीं किया, हम एक दूसरे के नाज़-नख़रे उठाते हुए युंही हंसते-खेलते जिएंगे, बुढ़ापे में एक छोटे से शहर में बड़ा सा घर लेकर आंगन में शामें बिताएंगे. ऐसे सभी ख़्याल धूल तब चाटते हैं जब एक छोटी-सी तीखी चीज़ से मुलाक़ात होती है यानि ‘हक़ीक़त’.

शोभित के साथ उसका रिश्ता तीन साल चला. वो समझते कि एक-दूसरे को जानते हैं, इसी से पता चलता है कि इन्सान कितने ख्याली पुलाव पकाता है. कोई शख़्स जब खुद को ही नहीं जान सकता तो किसी और को जानने का दावा कैसे कर जाता है, बस किसी कॉफ़ी-शॉप में कुछ मुलाक़ातें, किसी सिनेमा थिएटर में कुछ हिट-फ़्लॉप फ़िल्में, एक जैसा संगीत पसंद होना, या मनपंसद किताब एक होना, शायद एक जैसा ‘पॉलिटिकल व्यू-पॉइन्ट’ भी मायने रखता है. एक जैसे होने की ख़ुशी आंखों के आगे काला परदा डाल देती है. फिर वो नहीं दिखता जो ज़रूरी है जैसे शोभित ने जब उसपर पहली बार गुस्सा किया था तो बात कितनी छोटी थी, वो शोभित के बात-बात पर रोने को लेकर कितना चिढ़ जाती थी, शोभित ने उसे अपने क़रीब लाने के लिए कई झूठ कहे थे या वो खुद कितनी ‘पोज़ेसिव’ थी. शुरु में ये बातें बेमतलब होती हैं, इन पर हंसा जाता है. मगर जैसे-जैसे वक़्त गुज़रता है एहसास होता है छोटा कुछ नहीं होता, जिसे आज हवा में उड़ाया जा रहा है कल अलग होते वक़्त उसे तीर की तरह इस्तेमाल किया जाएगा. शोभित के जो आंसू उसे पहले कमज़ोर कर देते थे अब पत्थर बना देते थे, उसकी जो टोका-टाकी शोबित को पहले उसकी फ़िक्र का एहसास दिलाती थी अब गले का फंदा लगती है. खैर वो अलग हुए इसकी सीधी-सीधी कोई एक वजह नहीं हो सकती, रिश्ता टूटने की कभी भी कोई एक वजह नहीं होती.

डाक्टर उसे ऐसे देख रहा था जैसे वो सामने वाले बैंक में रॉबरी कर के सीधी इस क्लिनिक में घुस गयी हो और एकलौता वो डाक्टर ही इस राज़ को जानता हो. जब उसने अपना नाम मिसिज़ के जगह मिस के साथ लिखवाया नर्स ने भी उसे कनखियों से देखा था. डाक्टर खुद को सहज दिखाने की कोशिश कर रहा था और समा के लिए इतना ही काफ़ी था, अब उसका यहां गुलदस्ते के साथ स्वागत तो किया नहीं जाता कि ‘मैडम आप दो महीने से प्रेगनेंट हैं और वाह! क्या बात है, आपकी शादी भी नहीं हुई…कमाल कर दिया आपने तो.’ 

मेट्रो में बैठी वो लेडीज़ कोच के आखिर के हिस्से को हमेशा की तरह देख रही थी, यहां से जनरल कोच शुरु होता है. जब कोई कपल, मिया-बीवी हों या ब्वायफ़्रेंड-ग्रलफ़्रेंड मेट्रो में चढ़ते तो इसी हिस्से में खड़े होते, कई लोग एक दूसरे को यहां ऐसे ढूंढ़ते जैसे ये दो कदम की जगह लम्बा सा प्लेटफ़ॉर्म हो. फिर जब यह मालूम हो जाता कि हां ‘वो’ भी यहीं है तो दोनों के ही चहरे पर मुस्कान नज़र आती. इन्सान कहीं भी हो एक जैसा ही रहता है, कहीं ना कहीं सब एक से ही हैं वरना ऐसा क्युं होता कि जब भी मेट्रो में सफ़र करती इस किनारे पर हमेशा एक जैसी ही बेचैनी, एक-सी ही खोज और फिर एक-सी ही तसल्ली दिखती. वो भी ऐसे ही खड़े होते थे, इधर-उधर देखते नीचे नज़रें किये हुए और फिर कभी मौक़ा पा कर एक दूसरे की आंखों में झांक लेते. बस इतना करने से ही उसके पूरे जिस्म में झुरझुरी दौड़ जाती. बस देख लेना…बस देख लेना ही तो बदल जाता है तभी तो कहते हैं फ़लां की नज़रें बदल गयीं. रिश्ते के आखिरी दिनों में वो समा को कितनी नफ़रत से देखता था, लाल आंखों से ऊपर से नीचे तक जैसे कह रहा हो तुम बेहद घटिया हो, तुम देखे जाने लायक भी नहीं, तुमसे घिन्न आती है’. हां, नज़रे ही बदलती हैं, उसने मेडिकल रिपोर्ट को देखते हुए सोचा.

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क्या मुझे रोना नहीं आएगा? वो रात को तकिए पर सर टिकाते हुए थोड़ी ऊंची आवाज़ में खुद से सी बोली. कहीं से, किसी भी सन्नाटे से कोई आवाज़ पलट कर नहीं आई. अकेले सोना कितना भारी होता है, कोई सर पर हाथ रखने वाला नहीं, कोई ऐसा नहीं नींद में जिसकी कमर में हाथ डाला जा सके. उसने करवट बदल कर तकिया ज़ोर से भींच लिया, चादर के अन्दर चेहरा किया और तकिए में मुंह छुपा कर ज़ोर से चीखी, फिर तकिया ज़मीन पर फेंका, फोन में गाने चलाए, बिस्तर पर पैर पटके, उंगलियां बालों में घुसाईं, एक बार फिर दबी आवाज़ में चिल्लाई पर उसे रोना नहीं आया. रोने के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ रही है ये सोच कर उलटा खुद पर हंस पड़ी. अभी तक तय नहीं किया था करना क्या है, शोभित को वो कुछ भी बताना नहीं चाहती थी, वो नहीं चाहती थी कि किसी भी तरह का इमोशनल ड्रामा शुरु हो, अगर वो शोभित को कुछ बताती तो वो लौट आता बेशक, पर ये सही नहीं होता. उनके बीच हालात जिस हद तक बिगड़ चुके थे वो अब ठीक नहीं हो सकते थे बल्कि अब वो कुछ ठीक करना भी नहीं चाहती थी. जीवन होता है तब जीवन-साथी होता है, अगर साथी की वजह से जीवन पर ही खतरा मंडराने लगे तो ऐसे में आगे बढ़ जाना चाहिए. साथी और मिल जाएंगे जीवन नहीं मिलेगा. समा की सांस ना आती थी ना जाती थी बस अटकी रहती थी कि अब क्या कह देगा, अब क्या कर लेगा, कहीं खुद को कुछ ना कर ले, खुद को पीटना, बेल्ट से मारना, सड़क पर चीखना-चिल्लाना, खुद को थप्प्ड़ मारना. सर दीवार में पटकना, गाली-गलोज करना और फिर घंटों तक रोना. समा तंग आ गयी थी फिर भी सोचती शायद सब ठीक हो जाए पर नहीं. कुछ रोज़ सब ठीक रहता और फिर वही कहानी शुरु. तो वो शोभित को कुछ नहीं बताना चाहती थी, उसमें इस बात की हिम्मत तो थी कि सब कुछ अकेले संभाल ले पर फिर से अंधेरे कूंए में जाने की ताक़त नहीं थी. और फिर कौन जाने शोभित कह देता इसके लिए मैं ज़िम्मेदार नहीं. जो कुछ वो समा को कह चुका था, उसके बाद वो कुछ भी कह सकता था. यक़ीन एक बार उठ जाए तो उसके दोबारा विराजमान होने की गुंजाइश नहीं होती. 

सुबह सूजी हुई आखों के साथ ऑफ़िस पहुंची, लिफ़्ट के शीशे में खुद को देखा तो झिझक कर खुद से ही नज़रें चुरा लीं. कोई भी फ़ैसला लेने से पहले उसे अच्छे से सोचना होगा. क्या उसे ये बच्चा चाहिए या नहीं चाहिए. तय करना आसान नहीं था. अकेले रहती है, उम्र अभी 26 साल है, नौकरी करती है, बच्चा पैदा करने के लिए वो कभी उत्तेजित नहीं रही. पर अब जब वो प्रेग्नेंट है तो अबॉरशन के नाम से पूरे जिस्म में कंपन सी दौड़ जाती है. आखिर अपने जिस्म से छेड़छाड़ करना आसान काम नहीं है. इस फ़ैसले से उसकी आने वाली ज़िन्दगी बदल जाएगी. उसके अन्दर की औरत बार-बार जज़्बाती हो जाती और उसके अन्दर की चन्चल लड़की अभी आज़ादी से उड़ना चाहती. अपने वर्क स्टेशन पर उसने कुर्सी से पीठ टिकायी तो देखा साथ बैठने वाली मधू अभी नहीं आयी. उसने अपनी फ़ाइलें निकालीं और बॉस के कैबिन में जाने से पहले एक नज़र दौड़ाने लगी, पर ध्यान मधू की तरफ़ भटक चुका था. मधू उसके साथ इस ऑफ़िस में पिछले एक साल से काम कर रही है, मधू ने 18 साल की उम्र में घर से भाग कर शादी कर ली थी और 19 साल की उम्र में तलाक़ हो गया था. अब ऐसे में ना तो वो अपने मां-बाप के पास लौट सकती थी और ना ही कोई दोस्त ऐसा था जो उसकी मदद करता. मधू के चेहरे पर चोटों के निशान साफ़ दिखते हैं. वो बताती है कि उसका पति जो कभी उसका प्रेमी हुआ करता था कैसे उसे बाल खींचते हुए पीटता था. वजह कोई भी हो सकती थी, जैसे इस लड़के से क्युं बात की और उस आदमी को पलट कर क्युं देखा. या फिर जींस क्युं पहनी जब मां चाहती है तुम साड़ी पहनो. कभी उसका पति सिखाता कि सास से कैसे बात करते हैं तो कभी ये कि ससुर के सामने गर्दन कितनी नीची होनी चाहिये. जबकि वो खुद अक्सर अपनी मां और पिता से बदतमिज़ी करता, आस-पड़ोस के लोगों से झगड़ा करता, किसी को भी पीटने पर फ़ौरन उतारू हो जाता. ऐसे लोग जो खुद नैतिकता के मामले में गोल होते हैं अक्सर अपनी पत्नी और बच्चों पर संस्कार लादने की कोशिश करते हैं, पर क्युंकि उन्हें खुद ही मालूम नहीं होता कि असल में नैतिकता है क्या, वो रटे-रटाए फ़ॉरमुलों का इस्तेमाल करते हैं और अपने परिवार को संस्कार की जगह कड़वाहट सौंपते हैं. मधू हिम्मती थी जो एक साल के अन्दर उस जंजाल से निकल गयी. हर कोई ऐसा कहां कर पाता है. “हाय जानेमन, इतनी गौर से देखोगी तो फ़ाइल में ऐटीट्यूड आ जायेगा” मधू ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा. “ओह! तुम आ गयीं, बस तुम्हारे बारे में सोच रही थी”

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हिन्दी फ़िल्मों ने अबॉरशन को इतना ड्रामैटिक बना दिया है कि ऐसा ख्याल मन में आते ही समा खुद को ’पापिन‘ टाइप महसूस करने लगती. उसे याद आता कैसे ‘क्या कहना’ कि प्रीटी ज़िन्टा अपने पेट पर हाथ रख कर ‘फ़ीटस’ से बातें करती, उसे पुरानी हिन्दी फ़िल्मों की वो वैम्प याद आती जो अबॉरशन करवा कर, अपने शरीफ़ पति को चोट पहुंचाती है, वो महंगी साड़ी पहनती है, शराब पीती है और किटी पार्टियों में ताश खेलती है. समा खुद को उस रूप में इमाजिन करके मुस्कुरा देती. औरत की एक नपी तुली खास छवि बनाने में हिन्दी फ़िल्मों का बहुत बड़ा योगदान रहा है. सिनेमा थियेटर से बाहर निकलते हुए वो फ़िल्मों को मन ही मन गालियां दे रही थी. अब बताओ ये भी कोई बात हुई फ़िल्म के आखिर में ’सिल्क’ ने आत्महत्या कर ली. ‘डर्टी पिक्चर’ की बहुत तारीफ़ सुनी थी, आफ़िस में सुमन्त कह रहा था “ऐसी फ़िल्में बननी चाहिएं” वहीं गौरव का मानना था “हर औरत को सिल्क बन जाना चाहिए”. समा के बॉस और उनकी वाइफ़ सिल्क के किरदार को बज़ारू कह रहे थे. हर किसी की फ़िल्म के बारे में अपनी राय और समझ थी इसीलिए फ़िल्म हिट साबित हो गई थी. समा सोच रही थी, हर औरत को सिल्क क्युं बनना चाहिए, क्या हर औरत को अपना काम निकलवाने के लिए जिस्म का इस्तेमाल करना चाहिए या हर औरत को शादीशुदा मर्द के साथ जि़स्मानी और जज़्बाती हो जाना चाहिए. फिर जब पैसा और कामयाबी साथ छोड़ दे तो खुदकुशी कर लेनी चाहिए. समा ’सिल्क’ नहीं बनना चाहती थी, ना ही वो किसी भी औरत को सिल्क बनते देखना चाहती थी. समा के लिए ’सिल्क’ होना तारीफ़ की बात नहीं थी, उसे ‘सिल्क’ से सहानुभूति थी. उसके लिए ‘सिल्क’ होना गर्व की बात तब होती जब वो मुश्किल हालात से नहीं घबराती, जब वो जिस्म से ऊपर उठकर एक शख्सियत बनते हुए, बुढ़ापे की दहलीज़ पर खड़ी होकर भी दुनिया की वाह्ट लगाती. उसके लिए एक बंगला बिकना मायने नहीं रखता. जब वो एक छोटे से फ़्लैट में भी उसी जोश के साथ ज़िन्दगी जीती. ऑटो में बैठते हुए जब समा को चक्कर महसूस हुए तब जाकर वो असली दुनिया में वापस आई. मेडीकल रिपोर्ट मिले दो दिन हो चुके थे और वो अभी तक किसी नतीजे तक नहीं पहुंची थी. घर जाते हुए उस पर फिर सोच सवार हो गई थी. दर्द का सामना करते हुए, मुश्किलों से निपटते हुए और तकलीफ़ों का मज़ा चखते हुए कई बार एहसास होता है कि ज़िन्दगी कितनी मज़ाकिया है. अपनी प्रेगनेंसी की बात वो किसी को नहीं बता सकती थी और उसने अभी तक तय भी नहीं किया था कि करना क्या है. मगर फिर भी पिछले पंद्रह मिनटों में उसके दुख की वजह सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दी फ़िल्म इन्डस्ट्री थी.

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26 साल की उम्र शुबह से भरी होती है. आप पिछले कुछ सालों में चुने गए रास्तों और रिश्तों को लेकर खुद से सवाल करने लगते हैं. सारी उम्र 20 साल के होने का इंतज़ार किया, बीस से हुए, उस उम्र में आप जोश से भरे रहे. हर सवाल का चुटकियों में जवाब हाज़िर होता है और फिर ठीक पांच साल बाद बेहद सख़्ती से आपको ज़िन्दगी की असली परीक्षा के आगे बिना कागज़-कलम के पटक दिया जाता है. ये परीक्षा वैसी ही होती है जिसमें आप देर से पहुंचे हों, जिसमें बार-बार पैन की इंक खत्म हो रही हो, हर सवाल का सवाब आप जानते हैं लेकिन समझ नहीं पा रहे लिखा कैसे जाए. कुछ सवालों को देखकर लगता है कि अरे! ये तो मैंने पढ़ा था, मगर जवाब याद नहीं आ रहा. नौकरी है लेकिन ये वो तो नहीं जो हम चाहते थे, प्रेमी है मगर ये वैसा तो नहीं जैसा हमने सोचा था, अरे! मैं तो घूमना चाहती थी, ड्राइविंग सीखना चाहती थी, अब तक तो मुझे प्यानो बजाना आ जाना चाहिए था. उफ़! मैं ऐसी ज़िन्दगी तो नहीं चाहती थी, मैं पीछे रह जाऊंगी, मैं नाकाम इन्सान बन कर रह जाऊंगी. मैं किन मुसिबतों में फंसी हूं, कैसे लोगों के बीच अपना वक्त बर्बाद कर रही हूं. मुझे कुछ कड़े फ़ैसले लेने होंगे, कुछ सख्त कदम आगे बढ़ाने होंगे. मैंने कदम बढ़ा लिया है, मेरी ज़िन्दगी रातों रात बदल गई है, मैं प्यानो बजा रही हूं, मैं गाड़ी चलाना सीख रही हूं, मैं मज़बूत फ़ैसले ले रही हूं, मैं सधी हुई, खुद की तय की हुई ज़िन्दगी जी रही हूं. अब मैं मुस्कुरा रही हूं. “समा, क्या सोच-सोच कर मुस्कुरा रही हो” मधू ने पानी रखते हुए पूछा. ‘ओह्ह्ह…धत तेरे की…सोचती रह जाऊंगी और वक़्त हाथ से निकल जाएगा’ समा ने ग्लास लिया और पानी ऐसे खत्म किया जैसे ये पानी ही उसके और उसके कड़े फ़ैसलों के बीच रुकावट बना हुआ था. 

“मधू मैं प्रेगनेंट हूं” समा ने थोड़ी ऊंची आवाज़ में कहा
“क्या?” मधू ने इधर-उधर देखते हुए फुसफुसा कर पूछा
“मुझे पता नहीं क्या ठीक होगा” समा ने अपने सर पर हाथ रखते हुए कहा
“तू पागल हो गई है” मधू को अब तक यकीन ही नहीं आया था
“मैं सच कह रही हूं” समा ने मधू की तरफ़ देखा
“ये कैसे, आई मीन…तेरा तो ब्रेकअप…ओफ़्फ़ो” मधू सोफ़े से खड़ी होकर टहलने लगी थी
समा संडे की छुट्टी पर सुबह-सुबह मधू के घर पहुंच गई थी. चार दिन बीत चुके थे और उसे आज ही कोई फ़ैसला लेना था. मधू के अलावा वो और कहीं जा भी नहीं सकती थी. समा के आस-पास इस मामले में मधू से ज़्यादा तजुरबा और किसी के पास नहीं था. 
“कितने महीने?” मधू ने पूछा
“दो” समा मिमियाई
“शोभित?” सवाल दाग़ा गया
“और कौन?” समा ने चिढ़ कर कहा
“कमीना” मधू बड़बड़ाई
“यार, सिर्फ़ उसकी गलती थोड़े ना है” समा ने बराबर की ज़िम्मेदारी ली
“अच्छा….क्यों? सिर्फ़ उसकी गलती कैसे नहीं है? बेशक उसी की है, सौ प्रतिशत उसी की” मधू फुंकारी
समा हथियार डाल चुकी थी
“साला…बच्चा बाप के नाम पर जाना जाएगा, कहलाएगा इनके खानदान का, होगा इनके घर का चिराग, तलाक ले लो तो बच्चा छीनने के लिए ये मुकदमा करेंगे, इन्हें पालो-पोसो बड़ा करो फिर भी एडमिशन करवाते वक्त सबसे पहले बाप का नाम पूछा जाएगा, जब बच्चा होने के बाद पहला हक़ इनका है तो बच्चा ना हो इसकी ज़िम्मेदारी भी इनकी है” मधू लगभग चिल्ला रही थी
समा ने धीरे से कहा “लेकिन शरीर तो हमारा है, नुकसान तो हमारा होगा”
“वो तो है ही, मर्द मौकापरस्त होते हैं और कुदरत इनका साथ देती है. सीधी सी बात है जिसका हक उसकी ज़िम्मेदारी. यार, गोलियां खा-खा कर मेरे चेहरे और जिस्म पर बेशुमार दाने हो गए थे, फिर पति महाशय कहते हैं कॉपर-टी लगवा लो, वो भी किया. पता है समा, मुझे कितनी ज़्यादा ब्लीडिंग होती थी? इन्फ़ेक्शन हो गया था, डॉक्टर को दिखाया तो पता चला ठीक से लगी नहीं थी, ठीक करवायी, फिर कुछ हफ़्तों बाद वही हाल” मधू धीरे-धीरे कह रही थी
“लेकिन वो तो सेफ़ होती है ना” समा ने पूछा
“हां होती है लेकिन शरीर से तो छेड़छाड़ ही है ना, सही-गलत हो सकता है, डॉक्टर पर भी डिपेंड करता है, यार…मैं ये कहना चाहती हूं कि इतना झंझट ही क्यों जब आदमी के पास इससे कहीं ज़्यादा आसान उपाय मौजूद है? बली की बकरी हम बने ही क्यों जब इसकी कोई खास ज़रूरत नहीं है. मधू फिर गुस्से में आ गई थी.
“तू सही कह रही है. अगर मर्द अपनी प्रेमिका या बीवी के जिस्म से ऐसी छेड़छाड़ ना होने देना चाहे तभी तो ज़िम्मेदारी लेगा. गलती हम लड़कियों की भी है, हम अपने लिये खड़ी नहीं होतीं, बस प्रेमी का दिल खुश करने में लगी रहती हैं. खुद को उनकी जायदाद समझ लेती हैं. हमें खुद से प्यार करना सीखना होगा. खुद को सबसे ज़्यादा एहमियत देनी होगी. अपने लिये लड़ना होगा, रोज़ रात दासी बन कर पति के सामने हाज़िर नहीं होना, बल्कि अपने भले के लिये विरोध करना सीखना होगा” समा अपनी जगह से उठकर खिड़की के पास आ गई थी. सामने वाली बालकनी में एक नई-नवेली दुल्हन अपने बाल सुखा रही थी. उसके हाथों की महंदी बिल्कुल लाल थी. उसकी आंखों में वो शर्म थी जो उसे बचपन से घुट्टी बना-बना कर पिलाई गई थी. 

“मधू, मुझे ये बच्चा नहीं चाहिए” समा ने खिड़की की तरफ़ से मुंह मोड़ लिया था
“अच्छे से सोच ले” मधू समा की तरफ़ गौर से देखते हुए बोली
“मैंने सोच लिया है, ये मेरा शरीर है. अगर बच्चा होता है तो उसे मुझे पालना होगा. अभी मेरे दिल में बच्चा पालने की कोई ख्वाहिश नहीं है. अगले कुछ सालों में भी मैं ऐसा कुछ नहीं चाहती.” समा आराम से कह रही थी
“तुम्हे पता है, धर्म इसे हत्या मानता है” मधू अब मुस्कुरा रही थी, जैसे कह रही हो देखो अपने साथ क्या खेल खेला गया है
“धर्म तो मुझ जैसी अविवाहित स्त्री को कोड़े मार-मार कर मौत के हवाले कर देने का आदेश भी देता है. वही धर्म मर्द को ऐसी कोई सज़ा नहीं सुनाता. जबकि औरत और मर्द एकसाथ हम बिस्तर होते हैं. लेकिन सज़ा सिर्फ़ औरत को. सब खेल है मधू, सदियों पुराना बुना गया जाल जो तुम्हें और मुझे फंसाता है.” समा बैग कंधे पर लटका चुकी थी.
“तो ये एक ज़िन्दगी खत्म करना नहीं है” मधू समा की आंखों में देख रही थी, जैसे भरोसा चाहती हो.
“ये एक नई ज़िन्दगी की शुरुआत है जिसमें मैं अहद लेती हूं कि अब मुझसे ना कोई खेलेगा, ना मैं खुद को किसी के लिए मुश्किलों में डालूंगी” समा ने मधू का बैग उठाकर उसके कंधे पर लटकाया और आगे बढ़कर दरवाज़ा खोल दिया.
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Wednesday, 8 August 2012

क्यूं घुटती हैं फ़िज़ाएं


ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपी ‘नेशनल स्टडी ऑफ़ डेथ (इंडिया)’ 2010 के अनुसार एक पढ़े लिखे मर्द में आत्महत्या करने की गुंजाइश 46 प्रतिशत होती है. वहीं एक पढ़ी-लिखी महिला के लिये ये गुंजाइश बढ़ कर 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. भारत में एक बच्ची के लिए घर से बाहर निकल कर स्कूल तक जाने का रास्ता कई सवालों और तानों को चीरकर निकलता है. कॉलेज तक पहुंचते-पहुंचते ज़्यादातर घरवालों की आज़ाद ख्याली पस्त हो जाती है. वो बच्ची से युवती बनी अपनी बेटी के सीने पर दुपट्टा डालकर उसे सिलाई-कढ़ाई में जीने की कला सिखाने लगते हैं. जो युवती सुई-धागों को पारकर युनिवर्सिटी के मैदान तक पहुंचती है वो प्रगतिशील मानी जाती है. 2009-2010 की कैटलिस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक जहां ग्रामीण इलाकों में पैसे कमाने वाली महिलाएं 26 प्रतिशत हैं वहीं शहरों में ये तादाद 14 प्रतिशत पर ठहर जाती है. यानि उच्च शिक्षा के बावजूद मुट्ठीभर महिलाएं ही आत्मनिर्भरता की तरफ़ कदम बढ़ा पाती हैं. बाकि बची महिलाओं की प्रगतिशीलता चूल्हे के धुंए के साथ उड़ जाती है.

मर्दों की इस दुनिया में औरत की हैसियत बदबू करती फ़िज़ा की लाश जैसी है. जिसके करीब जाने के लिए नाक को कपड़े से ढंकना पड़ता है. औरत का अस्तित्व गीतिका के ख्वाबों जैसा है जिसकी उड़ान कोई और तय करता है. रंग-बिरंगी, शोख़ और बेबाक ज़िंदगी जीने के बावजूद क्यूं एक औरत को अकेलापन चुनना पड़ता है. ऊंचे ओहदे तक पहुंचने के बावजूद ऐसा क्या है जो एक औरत ज़िंदगी की गोद में बेबस महसूस करने लगती है. मौत ही आखिरी रास्ता क्यों बचता है. विवेका बाबाजी, नफ़ीसा जोसेफ़ या कुलजीत रंधावा फ़ैशन जगत के झिलमिलाते सितारे थे, पैसा, शोहरत और आलिशान पोशाकों ने एक वक्त पर ज़िन्दगी को चमकदार बनाया हुआ था. रैंप पर चलते हुए इनकी चाल में वो शान होती जो हार को रास्ता बदने पर मज़बूर कर दे. लेकिन रैंप की वो अकड़ ज़िंदगी में क्यूं नहीं उतर सकी. करियर की ढलान के साथ ये खुद भी क्यूं ढल गईं.

एक आम राय है कि चकाचौंध आखिर अंधा ही करती है. लेकिन फ़िज़ा तो एक वकील थी. और गीतिका ऐयर-होस्टेस. ना तो मोटी-मोटी किताबों को पढ़कर काले कोट तक पहुंचना आसान है और ना ही ऊंची-ऊंची सैंडल पहनकर दिन भर खड़े रह कर मुस्कुराते हुए चाय परोसना आसान है. जहां एक को करते हुए सिर दुखता है, वहीं दूसरे से कमर. इन आत्महत्याओं से कवयित्री मधुमिता शुक्ला और गायिका भंवरी देवी की हत्या की डोर भी जुड़ती हुई दिखती है.

मर्दों का बनाया समाज औरत की आज़ादी की सीमा निर्धारित करता है. वो स्त्रीवाद के नाम पर औरत को उसके घर से बाहर तो निकाल लेता है लेकिन अपने घर में जगह नहीं देता. एक स्त्री को बचपन से ही निर्भरता की ट्रेनिंग दी जाती है. उसे चलना नहीं, घिसटना सिखाया जाता है. किताबों के बीच भी उसे चावल की किस्में सिखाई जाती हैं. होम-वर्क के साथ ही उसे भाई की किताबों पर कवर चढ़ाना याद करवाया जाता है. सुबह अपनी यूनिफ़ॉर्म के साथ वो भाई की स्कूल की शर्ट और पिता की टाई भी इस्त्री करती है. ट्यूशन जाने से पहले उसे किचन के बर्तन और भाई का कमरा साफ़ करना होता है. खेल में भाई उसे मार सकता है लेकिन उसे हंसते हुए बात को टालना होगा क्युंकि उसे सिखाया गया है कि भाई तुमसे प्यार करता है. हालांकि वो खुद प्यार में दो-चार मुक्के अपने भाई को नहीं रसीद कर सकती. क्युंकि उसके बाद प्यारा भाई उसका भुरता बना देगा. पति परमेश्वर है तो कॉलेज में बना दोस्त भी उसी कैटेगरी का ट्रीट्मेंट चाहता है. बचपन से पिलाई गई घुट्टी कितना असर करती है अब दिखेगा. दोस्त की ऐंठ वैसी ही जैसी पिता की मां पर देखती है. इससे क्यों बात की, उसकी तरफ़ क्यों देखा. बचपन में भाई का होमवर्क करती थी. अब परमेश्वर-दोस्त के असाइमेंट बनाने लगी. उसने देखा बचपन की सीख बिल्कुल सटीक है. रिश्ते निभाने के लिए उसे किनारे खड़े होना होगा. केंद्र में हमेशा कोई पुरुष होना ही चाहिए. कभी भाई, कभी पिता, कभी परमेश्वर-दोस्त, कभी पति. वहीं एक मर्द को ये समाज बचपन से ही शोषक बनना सिखाता है. हम अपने बेटों को ‘गोपाल कांडा’ बना रहे हैं. जिसके लिए औरत अपने घर से सिर्फ़ मर्दों का दिल बहलाने के लिए निकलती है.

एक स्त्री का अकेलापन पुरुष के अकेलेपन से बेहद अलग होता है. स्त्री को एक साथी चाहिए ताकि वो उस साथी की परवाह कर सके. किसी का ख्याल रख सके. उस किसी के सिर पर हाथ रखकर उसकी बंद होती आंखें देख सके. अब चाहे वो कितने भी ऊंचे ओहदे पर हो या उसके अकाउंट में कितना भी पैसा हो. वो इन सब के बल पर अपना ख्याल रखवाने के लिए नौकर तो रख सकती है लेकिन ऐसा साथी नहीं ढ़ूंढ़ सकती जिसके लिए खुद उसके मन में परवाह हो. समाज में पुरुष हमेशा संपूर्ण और निश्छल रहता है. फ़िज़ा उर्फ़ अनुराधा चांद मोहम्मद उर्फ़ चन्द्रमोहन से ये जानते हुए शादी करती है कि उसने अपनी पहली पत्नी को नहीं छोड़ा. वहीं चंद्रमोहन की पहली पत्नी भी फ़िज़ा और उसकी शादी की बात जानते हुए उसे फिर से अपना लेती है. हिसार के बिश्नोई मंदिर में पूजा-पाठ कर के चांद मोहम्मद को फिर से चंद्र मोहन बना लिया जाता है. 2007 में कोर्ट, गर्भवती मधुमिता शुक्ला की हत्या करवाने के मामले में उसके प्रेमी अमरमणी त्रिपाठी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है. और 2007 के उत्तर प्रदेश असेंबली इलेक्शन में वही अमरमणी त्रिपाठी महाराजगंज डिस्ट्रिक्ट से सीट जीतता है.

औरत के लिए वापसी का कोई दरवाज़ा नहीं है. उसकी गलतियों पर ना तो उसे समाज माफ़ करता है और ना ही खुद उसके अपने घर वाले. एक बार चौखट लांगने के बाद वो लौट नहीं सकती. शायद यही वजह है कि दुनिया जीतने के बाद भी वो खुद को हारा हुआ ही महसूस करती है. ज़िन्दगी की नींव हमारे सही-गलत फ़ैसलों पर रखी जाती है. लेकिन औरत को गलत फ़ैसले करने के बाद फिर से एक नई शुरुआत करने का हक नहीं है. जब सामने का रास्ता अंधकारमय हो और पीछे का किवाड़ अंदर से बंद हो तो फ़िज़ाएं घुटने लगती हैं.

Monday, 23 July 2012

अगर हेल्मेट ना पहना होता तो मैं ज़िन्दा ना बचती.



रोमांच वो शब्द है जिसे कहते वक्त आंखों में रौशनी भर जाती है. आमतौर पर पहाड़ों को लांगते हुए, पानी की तहों में सैर करते हुए या हवाओं से रोमांस करते हुए रोमांच को जिया जाता है. कुछ इसी तरह से मैंने भी अपने कुछ दोस्तों के साथ इस शब्द को चखने की ठानी. पिछले दिनों मैं घूमने के लिए लद्दाख जा रही थी. दिल्ली से लद्दाख के इस सफ़र को ना तो बस से तय करना था, ना ही ट्रेन की पटरियों से गुज़रना था. ग्यारह सौ किलोमीटर की दूरी बाइक से नापनी थी. हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से इलाक़े स्वारघाट के पास हमारी बाइक के ब्रेक फ़ेल हुए. एक बेलगाम मगर चालाक बैल की तरह बाइक पहाड़ियों के बीच बने टेढ़े-मेढ़े गोल-मोल रास्ते पर नाचते हुए हमें खाई में पटक कर खुद किनारे बने फ़ेन्स से टकरा कर वहीं गिर गई.  

बाइक चलाने वाला मेरा दोस्त सुरक्षित था लेकिन मुझे काफ़ी चोटें आई. मेरा चेहरा सूज गया, सर सुन हो गया और माथे से लेकर परों तक जिस्म छिल गया. मगर मैं ज़िन्दा थी. इसकी वजह था वो ‘हेल्मेट’ जिसे मैं बचपन में ’हेम्लेट’ कहती और घर पर सब हंस देते. ज़िन्दगी बहुत खूबसूरत है ये वाक्य हज़ारों बार कहा और सुना है पर मौत कितनी बेपरवाह है इस सच से पहली दफ़ा रूबरू हुई. देखने वालों ने बताया कि मैं पेड़ों और पत्थरों से टकराई जिससे मेरा ‘हेम्लेट’ खुल गया, और फिर लगभग घसिटते हुए तीन-चार सौ फ़ूट गहरी खाई में गिरी. मज़े कि बात है कि मुझे उस वक्त जिस्म को महसूस हुआ कोई भी दर्द याद नहीं. अगर मैं मर भी जाती तो मुझे पता ना चलता कि मैं मर गई हूं. कुछ लोगों ने उठा कर ट्रॉली में डाला (हां, डाला…ना कि लिटाया. क्युंकि उस वक्त मैं बस एक सामान थी जिसे मरम्मत की ज़रूरत थी). डॉक्टरी इलाज के बाद अब मैं ठीक हूं. अगर सिर पर लगने वाली पहली या दूसरी चोट के वक्त मेरे सर पर वो सुरक्षा कवच जिसे लोग हेल्मेट और मैं ‘हेम्लेट’ कहती थी ना होता, तो बेशक आज या तो मैं ज़िन्दा ना होती या फिर ज़हनी तवाज़ुन खो चुकी होती.

भारत के लगभग सभी शहरों में दो पहिया वाहनों के पीछे बैठी महिलाओं को हेल्मेट ना पहनने के लिए जुर्माना नहीं देना पड़ता. दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में महिलाओं को ये छूट सिख समुदाये की बदौलत मिली है. असल में सिख महिलाओं को धार्मिक रूप से सिर पर टोपी पहनना मना है. दिल्ली सरकार ने सिख समुदाये की भावनाओं को आहत होने से बचाने के लिए महिलाओं को ये छूट दी है. अब ज़ाहिर सी बात है दो पहिया वाहन पर पीछे सवारी करने वाली औरत से कभी कोई ट्रैफ़िक हवलदार उसका धर्म तो नहीं पूछता. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक साल 2010 में सड़क पर मरने वाले लोगों की तादाद 133,938 थी. हर साल देश भर में हेल्मेट ना पहनने की वजह से हज़ारों लोग घायल होते हैं. जिनमें स्कूटर या बाइक के पीछे बैठने वालों की संख्या अच्छी-खासी होती है.

इस मसले पर हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को तकरीबन दो महीने पहले ऑर्डर दिया था, जिसकी मियाद 25 जून को खत्म हो चुकी है. इसके बावजूद दिल्ली सरकार ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया. बल्कि शीला दीक्षित सरकार और ट्रांस्पोर्ट मिनिस्टर अरविंदर सिंघ ने ‘दिल्ली मोटर वेहिकल्स रूल्स 1993’ के रूल 115(2) का हवाला देकर मामला रफ़ा-दफ़ा करना चाहा. जिसके तहत महिलाओं के लिए हेल्मेट पहना अनिवार्य नहीं है. अब एक बार फिर हाई कॉर्ट ने दिल्ली सरकार को नोटिस भेजा है. ज़ाहिर सी बात है सरकार को महिलाओं की सुरक्षा से ज़्यादा अपने वोट बैंक की फ़िक्र है. जहां तक बात धर्म की है तो इसका लचीला होना बेहद ज़रूरी है. सिख धर्म में बाल कटवाना सख्त मना है लेकिन जब किसी सिख व्यक्ति के सिर का ऑपरेशन होना होता है तो उसके बाल काटे जाते हैं. जिस्म के दूसरे हिस्सों के बाल भी मेडिकल ज़रूरत के हिसाब से काटें-छांटें जाते हैं. ऐसे में महिलाओं के हेल्मेट पहनने का विरोध बेमानी लगता है.

हाई कॉर्ट नोटिस दे सकती है, सरकार कानून बना सकती है. लेकिन अपने सिरों  पर हेल्मेट लगाने और कार की सीट-बेल्ट बांधने का काम हमें खुद करना होगा. हो सकता है हम एक-आध बार जुर्माना देकर ट्रैफ़िक पुलिस से बच जाएं. पर जब मौत दस्तक देती है तो जुर्माने में दो-चार सौ रुपये नहीं बल्कि हाथ-पैर या जान भी देनी पड़ जाती है. मेरी सांसों को ‘हेम्लेट’ ने बचाया किसी सरकार ने नहीं. बेहतर होगा हम कानून में बदलाव का इंतज़ार छोड़ें और खुद में बदलाव लाएं. अगर हम खुद अपनी ज़िंदगी की परवाह नहीं करते तो यकीन मानिये सरकार को आपसे कुछ खास लेना-देना नहीं है.

Friday, 25 May 2012

गली-गली चोर है



मेरी मां की एक सहेली है. किसी भी मध्यवर्गीय हिन्दुस्तानी औरत की तरह मेरी मां की उस सहेली को भी धार्मिक कर्मकांड बहुत सुहाते हैं. उनकी बैचैन ज़िन्दगी बच्चों के दिन-रात परेशान करने, एक-एक पैसे का हिसाब रखने और पति के हर वक्त के गुस्से के बीच गुज़र रही है. ऐसे में उनके पास शांति के दो ही रास्ते हैं. एक तो औरत को साज़िशों का पिटारा बताने वाले टीवी सीरियल या फिर पूजा-पाठ को सुख का रास्ता बताने वाले मौलाना. अपने पति के दिमाग को ठंडा रखने और अपने बच्चों के परीक्षाओं में अच्छे नम्बर लाने की उम्मीद में वो मौलानाओं को झाड़-फूंक के लिए पैसे देती रहती हैं. अक्सर ही उन्हें अपने बेटे के गले में कोई नया ताबीज़ पहनाते हुए या चादर के नीचे मौलाना की दी हुई चीनी बिछाते हुए देखा जा सकता है. पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ कि उनके धार्मिक विश्वास को बहुत बड़ा झटका लगा.

तकरीबन पंद्रह दिन पहले की बात है, उनके पति ने घर पर एक मौलाना को बुलाया. शाहीन बाग़ (दिल्ली) में रहने वाले ये मौलाना इनके घर अक्सर आते रहते थे. उस दिन घर पर सिर्फ़ पति-पत्नी थे. दोपहर का वक्त था और बच्चे कहीं बाहर गए हुए थे. मौलाना ने घर में घुसते ही ऊंची आवाज़ में कहा “तुम्हारी पत्नी के ऊपर बुरा साया है, इसके अन्दर गंदगी घुस गई है जिसे बाहर निकालना होगा.” पत्नी घबरा गई और पति की तरफ़ देखने लगी. ऐसे में उस मौलाना ने पति की तरफ़ इशारा करके कहा कि तुम किचन में जाओ और थोड़ा सा आटा गूंध कर लाओ. मैं तुम्हारी पत्नी को ठीक करूंगा. उसके बाद उस मौलाना ने पत्नी को सामने एक कुर्सी पर बिठा लिया और उसके चहरे, गले और फिर सीने पर हाथ चलाने लगा. पत्नी अपने ऊपर बुरे साए की बात सुन कर पहले ही घबराई हुई थी और फिर मौलाना के इस तरह की हरकत से बिल्कुल रुंहासी हो गई. मौलाना की हिम्मत खुल गई और वो कुछ और करने के लिए आगे बढ़ने लगा, ऐसे में वो झट से खड़ी हुईं और उसे पीछे हटने के लिए कहा. तब तक उनके पति कमरे में आ चुके थे और हालात कुछ-कुछ समझ गये थे. मौलाना के जाने के बाद पति ने पत्नी से सवाल-जवाब शुरु किए जैसे उसके तुम्हारे साथ क्या किया, कहां-कहां छुआ और ये कि अगर उसने तुम्हें सीने पर हाथ लगाया है तो मैं तुम्हें तलाक़ दे दूंगा. पत्नी ने डर से अपने पति को एक लफ़्ज़ भी नहीं कहा और इतनी बड़ी बात चुपचाप सह गई. मेरी मां को ये सब बताते हुए वो बुरी तरह रो रही थीं और कह रही थीं कि मैं अब नरक में जाउंगी, मैं अपवित्र हो गई हूं.

मां को अपनी सहेली के आंसुओं में लाचारी दिखी, लेकिन मुझे उन आसुंओ में दो सवाल चमकते नज़र आए. ये कैसी व्यवस्था है जो पीड़ित को दोषी बना देती है. हमारा समाज बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामलों से इस तरह पेश आता है जिसमें अपराधी गर्व का पात्र बनता है. एक आदमी को ये गर्व से कहते सुना जा सकता है कि मैंने तो अपनी जवानी के दिनों में बहुत सी लड़कियां छेड़ीं. आज होने वाले हर अपराध को यह कह कर पल्ला झाड़ा जा सकता है कि कलयुग में पाप का वास रहेगा. लेकिन ये कोई आज की कहानी नहीं है. हमारे पुराणों में अहल्या बस्ती है. जिसके शरीर को इन्द्र ने छल से हासिल किया. इन्द्र को स्वर्ग का देवता माना जाता है, अगर स्वर्ग का शासक ऐसा है तो बेशक स्वर्ग किसी स्त्री के लिए सुरक्षित नहीं होगा. खैर, उस समय गौतम महर्षि ने अहल्या को शाप देकर पत्थर का बना दिया था. अर्थात उन्होंने अहल्या को त्याग दिया था. सतयुग और कलयुग में फ़र्क कहां है. आज भी जिस्म पर बात आए तो औरत की गलती मान कर उसे तलाक दे दिया जाता है और उस समय भी औरत को इन्सान नहीं खाने की चीज़ समझा जाता था जिसे अगर जूठा कर दिया जाए तो खा नहीं सकते.

इस घटना ने एक और सवाल उठाया है और वो ये है कि हम टीवी पर आने वाले निर्मल बाबा पर शोर मचाते हैं लेकिन गली-गली में बैठे ऐसे हज़ारों ठगों को नज़र अन्दाज़ क्यूं कर देते हैं. हमारे विवेक पर मिट्टी डालने का काम कोई एक खास बहरूपिया नहीं कर रहा बल्कि छोटे-बड़े स्तर पर आज हर मौहल्ले में ऐसे ढोंगियों ने लूट मचाई हुई है. अगर आज शाहीन बाग़ के उस मौलाना के खिलाफ़ कोई आवाज़ उठाए तो धर्म पर हमले का हावाला देकर, कई गुट खतरनाक हालात पैदा कर सकते हैं. किसी भी अच्छे या बुरे काम की शुरुआत एक छोटे क़दम से ही होती है. अगर हम एक अच्छे काम को उसके शुरुआती दौर में ना सराहें तो मुमकिन है कि वो जल्दी सांस तोड़ दे. उसी तरह अगर हम गलत क़दमों को शुरु में ही ना रोकें तो वो बढ़ते चले जाएंगे, हम पर चढ़ते चले जाएंगे. सौ-दो सौ रुपए लेकर घर में सुख-शांति का दावा करने वाले और सौ- दो सौ करोड़ का चैनल चलाने वाले, ’ऑनलाइन’ पैसा मंगाने वाले बाबाओं में ज़्यादा फ़र्क नहीं है. बस इतना कि एक गली में गुंडा-गर्दी करने वाला मवाली है और एक ए.सी में बैठकर ड्र्ग डीलींग करता डॉन.

सबसे बड़ी व्यथा ये है कि औरत कमज़ोर है इसलिए किसी गैर के छूने से तलाक़ के लायक हो जाती है. लेकिन ऐसे कपटी बाबाओं और मौलानाओं के पीछे खड़ी भीड़ के डर से हम उनपर उंगली उठाने से भी डरते हैं.

Thursday, 24 May 2012

मॉर्डन भारत का पिछड़ापन




भारतीय समाज में बलात्कार या शारिरिक उत्पीड़न के मामलों में औरत को दोषी करार देने का रवैया बहुत पुराना है. ये वही देश है जहां अहल्या को इन्द्र की वासना के कारण पत्थर बनने का शाप दिया गया. इसी समाज में बलात्कार पीड़ित फांसी की रस्सी गले में डाल कर, बेगुनाह होते हुए भी गुनहगार बन जाता है. यही वो मुल्क है जहां नाबालिग बच्ची का शोषण होने की खबर आने पर उसकी पढ़ाई-लिखाई बंद करवा दी जाती है. इसी महान देश के भरे बाज़ारों में शरीफ़ मर्द एक औरत को वैश्या कह उसके कपड़े नोचते हैं. और इसी मुल्क में माल्या परिवार के होनहार, पढ़े-लिखे, ऊंचे तबके वाले सिद्धार्थ अपनी आईपीएल टीम के एक खिलाड़ी का पक्ष लेते हुए एक स्त्री को ‘कैरक्टर सर्टीफिकेट’ देते हुए फ़ेल करते हैं.

ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ‘ल्यूक पॉमर्शबैक’ आईपीएल में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के लिए खेलते हैं, पिछले दिनों एक अमरीकी महिला ने उनके खिलाफ़ पुलिस में शारीरिक उत्पीड़न का मामला दर्ज करवाया. उस महिला के अनुसार ल्यूक पॉमर्शबैक मैच के बाद होटल के उनके कमरे तक आए जहां उन्होंने छेड़छाड़ की और साथ ही कमरे में मौजूद उनके मंगेतर के साथ मारपीट भी की. वैसे तो सही-गलत का फ़ैसला कानून करेगा लेकिन जैसा कि हमारे समाज में होता आया है, किसी भी बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामले में कानूनी लड़ाई से पहले ही स्त्री को दोषी करार दे दिया जाता है. सिद्धार्थ माल्या की पढ़ाई भले ही विदेशी हो, उनकी भाषा भले ही विलायती हो मगर उनके भीतर एक हिन्दुस्तानी मर्द बैठा है. उनके पिता के दुनियाभर में खरीदे हुए बहुत से बंगले ज़रूर हैं लेकिन उनके अन्दर सिर्फ़ एक ही समाज है, ये समाज वही है जो स्त्री को ‘अच्छी पत्नी’ बनने की सलाह देता है.

सिद्धार्थ माल्या ने इस घटना के बाद एक ट्वीट किया था जिसके तहत वो अमरीकी महिला अपने मंगेतर के साथ होते हुए भी उनपर डोरे डाल रही थी, उस महिला ने सिद्धार्थ से उनका ‘ब्लैकबेरी मैसेंजर पिन’ मांगा था और उसका बर्ताव एक होने वाली पत्नी जैसा नहीं था. हमारे समाज में ये माप-दंड तय हैं कि एक पत्नी का बर्ताव कैसा होना चाहिए, उसे कितने कदम चलना चाहिये, किसी पराए मर्द से कितनी बात करनी चाहिए या कितना और कैसे हंसना चाहिये. तथाकथित मॉडर्न हिंदुस्तानी समाज में ऐसी सोच का पनपना दिखाता है कि ऑक्सफ़ॉर्ड, हॉवर्ड या फिर डॉलर में पैसे लेने वाली फ़र्ज़ी विदेशी यूनिवर्सिटियों से डिग्री ले लेने से किसी की ज़हनियत नहीं खुल जाती. ना ही ‘अरमानी’ और ‘वरसाचे’ के कपड़े पहनने से कोई अपना मूल स्वभाव छुपा सकता है. स्त्री का संघर्ष अभी चल रहा है, हर तबका अपने तरीके से उसे टांग पकड़ कर नीचे खींचेगा. ये मान लेना भूल होगी कि अमीर और तथाकथित ’एलीट’ समाज में स्त्री का कोई अस्तित्व है. अगर आपके पड़ोस वाले घर की लड़की बालकनी में ज़्यादा वक्त बिताती है तो वो मौहल्ले की ‘रंभा’ बन जाती है, वहीं अगर कोई रईस तबके की लड़की अपने मंगेतर के साथ होते हुए भी किसी ‘पराए’ मर्द से ‘ब्लैकबैरी मैसेंजर पिन’ मांगती है तो वो ’वाइफ़ मटीरिअल’ नहीं कहलाती. ये दोनों ही मामले अलग-अलग समाज के ज़रूर हैं पर इनके पीछे आधार एक ही है. स्त्री का एक लगा-बंधा, पुरुषों द्वारा तय किया कैरक्टर होता है. बीवी हो तो शर्मीली हो, बहन हो तो कहना सुनती हो, मां हो तो त्याग की देवी हो. प्रेमिका अपनी है तो बाइक पर चढ़ना, पार्क में बैठना सही, दोस्त की है तो चालू कहलाएगी. अगर मान लिया जाए कि वो अमरीकी लड़की सिद्धार्थ के साथ ’फ़्लर्ट’ कर रही थी तो क्या इसका ये मतलब हुआ कि वो एक अच्छी बीवी बनने लायक नहीं है. लेकिन सिद्धार्थ जिस विदेशी माहौल में पले-बढ़े हैं वहां तो ‘फ़्लर्ट’ करने, ‘ब्लाइंड डेट’ पर जाने या फिर किसी लड़की के आगे बढ़ कर फोन नंबर मांगने तक को बुरा नहीं समझा जाता. तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि ये उदारवादी सोच खोखली है. सिद्धार्थ के इस बयान के हिसाब से तो हर साल ‘किंगफ़िशर कैलेंडर’ में छपने वाली कोई भी लड़की शादी के लायक नहीं है.

आधुनिकता का लिहाफ़ ओढ़ने वाले एलीट समाज के भीतर छुपी दकियानूस बू वक्त-वक्त पर पिछड़े समाज तक पहुंचती रहती है. ऐसे में पिछड़ेपन के समर्थक सीना चौड़ा कर के यही कहते हैं “ऐश्वर्या राय हॉलीवुड चली गयी, फिर भी मंगलिक थी तो पेड़ के फेरे लिए ना, कुछ भी कर लो रहोगी तो लड़की ही.”  असल में हम एक बेहद ‘कनफ़्यूज़ड’ दौर से गुज़र रहे हैं, औरत की आज़ादी का राग अलापते हुए उसे लोहे की ज़ंजीरों से निकाल कर, चांदी की हथकड़ियां पहना रहे हैं. जहां अब तक संघर्ष परदे और घूंघट से था, वहीं अब मिनी स्कर्ट और बिकीनी से भी निपटना है. कमर चौबिस इन्च से ज़्यादा नहीं, गले पर ‘कॉलर बोन’ और चार इन्च की पेंसिल हील की ज़बर्दस्ती ने इसी आधुनिक समाज की स्त्री को कई लाइलाज जोड़ों की बीमारी और पीठ दर्द सौंपा है. स्त्री-विमर्श का ढोल पीटने वालों को अब सिर्फ़ चारदिवारी पर सवाल नहीं उठाने बल्कि ‘स्लट वॉक’ का समर्थन करने वालों से भी पूछना है कि क्या हंसी-ठहाके लगाते हुए टोरॉंटो की नकल कर लेना काफ़ी है. क्या कैनेडा की स्त्री की आज़ादी की लड़ाई और एक भारतीय स्त्री के स्वावलंबी होने के संघर्ष का रास्ता एक ही होगा.

हम दोहरी मार झेल रहे हैं. हमें एक सड़े-गले समाज में रहते हुए खुली हवा में सांस लेने का नाटक करना है. इन हालात में खुद को आज़ाद ख्याल साबित करने के लिए छोटे कपड़े पहनने की मजबूरी वैसी ही है, जैसे पवित्रता साबित करने के लिए साड़ी पहनना. ऐसे आधुनिक समाज से स्त्री का कोई भला नहीं होने वाला जहां शॉर्ट-टॉप तो पहना जा सकता है लेकिन लॉंग मगंलसूत्र के साथ.


Thursday, 22 March 2012

सरकारी स्कूल महान नहीं हैं…

‘नक्सली’ किसी स्कूल से नहीं गरीबी और अत्याचार से पैदा होते हैं. बेशक सरकारी स्कूल नक्सली पैदा नहीं करते मगर इतना काफ़ी नहीं है. हमें समझना होगा कि ‘क्या गलत नहीं होता इसे लेकर गर्व महसूस करना है या क्या बेहतर हो सकता है उसके लिये ज़ोर लगाना है’. अगर श्री श्री रविशंकर ने सरकारी स्कूलों के बारे में गलत बयान दिया तो इसका मतलब ये नहीं है कि हिन्दुस्तान के सारे सरकारी स्कूल महान हो गये. संस्कार ना तो सरकारी स्कूल में पढ़ने से आते हैं और ना ही प्राइवेट स्कूल में परोसे जाते हैं. संस्कार मिलते हैं घर से, किताबों से और अच्छी सोहबत से.

एक प्राइवेट स्कूल में भी गाली-गलोज, मार-पिटायी खूब होती है. हां, ये फ़र्क ज़रूर है कि गालियां अंग्रेज़ी में दी जाती हैं और लड़ाई-झगड़े सिर्फ़ बच्चों तक सीमित होते हैं. टीचरों में इतनी हिम्मत नहीं होती कि वो बच्चों को हाथ भी लगा दें. अगर किसी टीचर ने ऐसा कर दिया तो खुद स्कूल प्रिंसिपल उस टीचर को सबक याद करवाती दिख जाती है. वहीं ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में बच्चों पर हाथ उठाया जाता है जिसे किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता. हो सकता है सरकारी स्कूलों से आई.ए.एस और आई.पी.एस निकलते हों. ऊंचे ओहदों पर बैठे ज़्यादातर लोग सरकारी स्कूलों से ही पढ़े हों पर इसका ये मतलब नहीं कि जो गलत है उसे भी सही मान लिया जाये. अक्सर ही सामने आता है कि गांव-देहात में सरकारी स्कूलों के अध्यापक खुद ही ठीक से ए,बी,सी,डी नहीं जानते और बच्चों को गलत अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं. गणित, हिन्दी और समाज-शास्त्र पढ़ाने के लिये एक ही टीचर होते हैं, और विज्ञान के नाम पर सिर्फ़ सवाल-जवाब रटाए जाते हैं. सवाल उस व्यवस्था पर उठता है जो चौदह साल तक के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देने का दावा तो करती है पर असल में कई जगहों पर तो ब्लैक बोर्ड तक नहीं होता, कुर्सी-टेबल और किताबें तो दूर की बात है. कहते हैं आधी जानकारी होना, जानकारी ना होने से ज़्यादा खतरनाक होता है. हमारे ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में यही आधी जानकारी दी जाती है.

प्राइवेट स्कूल भी दूध के धुले नहीं हैं, कई महंगे प्राइवेट स्कूलों में अच्छी शिक्षा के नाम पर बच्चों को हिन्दी पढ़ाना बन्द कर दिया गया है. कई स्कूलों में हिन्दी में बात करने पर ‘फ़ाइन’ लगता है. यहां तक कि ऐसे भी प्राइवेट स्कूल हैं जो बच्चे का दाखिला लेने से पहले एक खास तरह का फ़ॉर्म भरवाते हैं, जिनमें कुछ ऐसे सवाल होते हैं कि आप हफ़्ते में कितनी बार मैक-डॉनल्ड्स जाते हैं, किस ब्रैंड के कपड़े पहनते हैं या आपके कितने रिश्तेदार बाहरी मुल्कों में रहते हैं. बेशक श्री श्री रविशंकर से जीने की कला वही लोग सीख पाते हैं जो ऐसे किसी फ़ॉर्म को कॉलर उंचा करके भर पाते हैं. ऐसे में चांद जैसी गोल आंखों और आधे चांद जैसी मुस्कान वाले रविशंकर को अपना टार्गेट देखते हुए ही बात करनी है. किसी को रिझाने का सबसे अच्छा तरीका है, उसे उंचा कहा जाये और दूसरों को गलत साबित किया जाये. रविशंकर अपनी भीड़ को खुश करने की कोशिश में निजीकरण के फ़ायदे ही गिनवायेंगे. भले ही इसके लिये गलत बयानी ही क्युं ना करनी पड़े. मगर इसका ये मतलब कतई नहीं है कि हम सरकारी स्कूलों के काले चिट्ठे भूल जायें और पूरी तरह से उन्हें आदर्श स्कूलों का दर्जा दे दें. क्लास के वक्त बच्चों का बाहर ग्राउंड में खेलना, टीचर का वक्त पर क्लास में ना आना, या स्कूल ही नहीं आना, बोर्ड परीक्षा में चीटिंग होना, टीचरों का जाति-धर्म देख कर भेदभाव करना, ये सबकुछ हमारे सरकारी स्कूलों में होता है. रविशंकर कुछ भी कहें पर हमें इस सच से मुंह नहीं मोड़ना चाहिये. कपिल सिब्बल का कहना कि मैं सरकारी स्कूल से पढ़ा हूं पर मैं नक्सलवादी नहीं हूंकाफ़ी नहीं है.

गांव-देहात और छोटे शहरों में तो कई सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहां तबेले खुले हुए हैं, जिन्हें सिर्फ़ कमेटी हॉल की तरह शादियों के लिये इस्तेमाल किया जाता है. इन स्कूलों के टीचरों को वक्त पर तन्ख्वाह तो मिलती है, पर इलाके के बच्चे ‘क’ और ‘ख’ का फ़र्क नहीं समझते. अगर बात सिर्फ़ दिल्ली और महानगर के सरकारी स्कूल की हो तब भी इतनी लापरवाही सामनी आती है जिसमें टीचरों का बच्चों को झिड़क कर बात करना, छड़ी से मारना, कोहनी पर फुट्टे से मारना, उंगली के जोड़ों पर पेन्सिल से चोट करना, वक्त पर स्लेबस पूरा ना करना और सज़ा के तौर पर घंटों धूप में चक्कर लगवाना शामिल है.

बच्चे कांच की तरह होते हैं इन्हें बहुत ज़्यादा परवाह की ज़रूरत होती है. बिल्कुल संभाल कर रखना, बिल्कुल संभाल कर उठाना. अगर एक बार गलती से भी चटक पड़ गयी तो फिर वो कांच का हिस्सा बन जायेगी. सिर्फ़ ये सोच कर संतुष्टी कर लेना कि हम नक्सली पैदा नहीं करते काफ़ी नहीं है. एक दुतकारा हुआ, झिड़का हुआ बचपन उम्रभर की टीस देता है. एक बच्चे का मानसिक विकास और निडर होकर हंसना-खेलना, गलतियां करना उतना ही ज़रूरी है जितना वक्त पर खाना-पीना और सोना. अफ़सोस हम अपनी आने वाली पीढ़ी के खान-पान की एहमियत तो समझते हैं पर सबसे अहम उसके बचपन की कद्र नहीं कर पाते.

Sunday, 12 February 2012

हमारा देश पॉर्न ऑब्सेसिव है

कर्नाटक के भाजपा मंत्रियों ने सोचा भी नहीं होगा कि उनका पॉर्न देखना, उन्हें और उनकी पार्टी को इतना भारी पड़ जायेगा. पॉर्न देखने से आप एक गैर ज़िम्मेदार नेता नहीं बन जाते, पर हां विधान सभा के लिये लाखों वोटों से चुने गये मंत्री जी जब काम-धाम छोड़कर मोबाइल फोन के वीडिओ देखते हैं तो आफ़त तो होगी ही. वो सीट जिसके लिये उन्होंने इतने पापड़ बेले, दुनिया भर के सही-गलत काम किये, उस सीट पर बैठने के बाद अगर वो उसे टाइमपास बना दें तो भी मुसीबत तो होगी ही. पर सवाल ये है कि क्या सिर्फ़ पॉर्न देखना ही संसद या विधान सभा की मर्यादा को भंग करता है. ऐसा क्युं है कि आज तक कभी किसी मंत्री को संसद या विधान सभा में सोने के लिये जवाबदेह नहीं होना पड़ा, कभी कोई एक्शन इस बात पर क्युं नहीं लिया गया कि मंत्री सदन में हंगामा करते हैं, या फिर ये बात गैर ज़रूरी क्युं है कि मंत्री सदन की कार्यवाई में हिस्सा नहीं लेते. कई मंत्री तो ऐसे हैं जो सत्रों को प्ले ग्राउंड समझते हैं और जब मूड हो तभी आते हैं. इन मुद्दों को कभी इतनी अहमियत क्युं नहीं मिलती.

वो कांग्रेस जो आज लक्ष्मण सावड़ी, सीसी पाटील और कृष्णा पालेमार के पॉर्न देखने पर इतना हल्ला कर रही है, उनकी जान जिस तोते में है उसने पिछले आठ साल में सदन में सिर्फ़ एक बार भाषण दिया है. क्या ये मुद्दा नहीं होना चाहिये कि आप जिस कुर्सी पर बैठे हैं उसकी ज़िम्मेदारी नहीं निभा रहे. राहुल गांधी जिस अमेठी से चुन कर आते हैं उसके बारे में वहां के लोगों के बारे में उन्होंने विकास के किसी मुद्दे पर आज तक सदन में चर्चा नहीं की. जब शीला दीक्षित की सदन में आंख लग जाती है या चिदंबरम झपकी लेते हैं क्या ये बहस का मुद्दा नहीं है. हमें नींद तब आती है जब हमारा किसी बात में दिल ना लगे या जब उसमें हमारी दिलचस्पी पैदा ना हो. जैसे स्कूल में अक्सर बच्चे अपनी पसंद के विषय की क्लास में शौक से टीचर को सुनते हैं पर नापसंद विषय की क्लास में उबासी लेने लगते हैं. क्या हमारे मंत्री स्कूली बच्चे हैं जिन्हें ज़बरदस्ती कुछ सुनना पड़ता है.

हमारा देश कितना पॉर्न ऑब्सेसिव है ये तो इस बात से ही बताया जा सकता है कि रियेलिटी शो ‘बिग बॉस’ में हिस्सा लेने वाली पॉर्न स्टार सनी लियोन के शो में आते ही शो की टीआरपी बहुत तेज़ी से बढ़ी थी. अपने घरों में बहनों को खिड़की तक भी ना जाने देने वाले और घूंघट को औरत की मर्यादा मानने वाले सनी लियोन को ’स्वीट और क्यूट’ कहते पाये गये. हमारे मापदंड दोहरे हैं और हम खुद दोगले हैं. अगर बात सेक्स की हो तो हम हाय-हाय मचाते हैं पर ज़रूरी मुद्दों पर उबासी लेते हुए सो जाते हैं. पिछले दिनों भंवरी देवी कांड से एक बात तो साफ़ तौर पर पता चलती है कि भारतीय मानसिकता बिना कपड़ों वाली औरत को वैसे तो खूब गाली देती है लेकिन अकेले में उसके वीडियो डाउनलोड करके जम कर देखती है. और फिर न्यूज़ चैनलों का भंवरी देवी के वीडियो को बार-बार इस फ़्लैश के साथ चलाना कि ‘हम दिखायेंगे आपको पूरी सेक्स-सीडी’ बताता है मिडिया को भंवरी की मौत में नहीं जिस्म में दिल्चस्पी थी. किसी छोटे-बड़े शहर में जब किसी औरत के सड़क के बीचोंबीच कपड़े नोचे जाते हैं और कुर्सी पर बैठे नेता कोई कार्यवाही नहीं करते क्या तब सदन और कुर्सी की मर्यादा को चोट नहीं पहुंचती.

असल में औरत का जिस्म शोर-गुल, वाह-वाही, चीखना-चिल्लाना तो बटोर सकता है. उसके जिस्म की बनावट नज़रों को अपनी तरफ़ खींच तो सकती है. पर उसके जिस्म की चोटें किसी को नहीं दिखतीं, उसकी नंगी पीठ के घाव खाये नीले निशानों में मिडिया और दर्शकों को काम वासना दिख जाती है. सदन में बैठ कर औरत का कपड़े उतारने वाला वीडियो देखना ज़्यादा आपत्तिजनक है या औरत के बारे में ये कहना की रेप से बचने के लिये औरतें उत्तेजक कपड़े ना पहनें. भाजपा के इन तीन मंत्रियो में से एक सीसी पाटील वही हैं जिनके हाथों में राज्य का महिला और बाल विकास मंत्रालय था और इसके बाद उनका ऐसा बयान क्या उनके अपने काम के प्रति गैर ज़िम्मेदाराना रवैया नहीं दिखाता.

ये वही देश है जिसकी राजनीति इतनी गिर गयी है कि यहां विधान सभा में एक पार्टी के नेता दूसरे पर कुर्सियां-टेबल यहां तक कि चप्पलें भी बरसाते हैं. यहां विपक्ष बात-बात पर सत्र स्थगित करने की धमकी है, जिस देश में लाखों लोग भूखे सो जाते हैं और हज़ारों बीमार इलाज ना मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं. वहां सदन की कार्यवाई में सत्र के एक दिन का खर्च तकरीबन दो करोड़ होता है. ऐसे में राजनीतिक दांव-पेंच और अपनी-अपनी अकड़ के लिये सत्र की कार्यवाई भंग करना क्या अपराध नहीं होना चाहिये.

इस देश में नैतिकता और मर्यादा सिर्फ़ सेक्स और पॉर्न से जुड़े हैं. नेताओं का झूठ बोलना, घोटाले करना, गाली-गलौज करना तो माफ़ कर दिया जाता है पर अगर बात सेक्स-वीडियो देखने की हो तो मामला रफ़ा-दफ़ा नहीं किया जा सकता. ये कुछ ऐसा ही है कि अगर कोई बच्चा घर से बाहर किसी से झगड़ कर उसका बैट से सर फोड़ कर आये तो मां-बाप आसानी से माफ़ कर दें पर अगर उसके कमरे से कोई अश्लील किताब मिल जाये तो घर सर पर उठा लें. ऐसे में अगर अस्मिता जैसे शब्दों का दायरा सिर्फ़ सदनों तक सीमित करने की बजाय उसे वास्तविक ज़िंदगी में भी लाया जाए तो बात बने वरना हम पॉर्न देखने वाले मंत्रियों को बर्खास्त करेंगे और बलात्कार करने वालों को विधान सभा और ससंद में सीट देते रहेंगे.

Thursday, 26 January 2012

हम धर्मनिरपेक्ष नहीं…

तो आखिरकार ना सलमान रुश्दी हिन्दुस्तान आ सके और ना ही उन्हें वीडिओ कॉन्फ़रेन्स के दौरान देखा-सुना जा सका. जीत मिली तलवार हाथ में लिये और जायमाज़ कंधे पर टांगे हुए जाहिलों को. सफ़ेद कुर्ता पहने और लाल बत्ती की गाड़ी में बठे मतलब-परस्तों को, और सिरदर्द गया खाकी वाले टेबल तोड़ते कामचोरों का. तो फिर नुकसान किसका हुआ, जब भी कोई लड़ाई, जंग या बहस होती है. तो कोई ना कोई तो हारता है, किसी ना किसी का तो नुकसान होता ही है. हां, तो घाटे में गये फिर हर बार की तरह हम, हम लोग.

सलमान रुश्दी का हिन्दुस्तान ना आना हमारी हार है. उस देश की, उस जनता की जो खुद को उदार कहती है. उस शासन पर लानत है जो एक लेखक को कुछ घंटों के लिए भी सुरक्षा नहीं दिला सकता. राजस्थान पुलिस यह कह कर अपना पल्ला झाड़ती रही कि रुश्दी की जान को खतरा है, उनके नाम की सुपारी दी गयी है. पुलिस इस लिये है कि दंबगों को काबू में करके तयशुदा कार्यक्रम चलता रहने में मदद करे या इसलिये कि गुंडों की धमकी के बारे में जानकारी देकर आपको डर कर घर बैठने के लिए कहे. जो सोचते हैं, फ़र्क नहीं पड़ता कोई रुश्दी आये या ना आये. या समझते हैं, क्या हुआ जो ‘इन्टरनेट’ के खुले मंच पर धर्म का बैनर हाथ में लिए, जनसमूह की आवाज़ को दबाने की चाल चली जा रही है. वो ये नहीं जानते, साथ खड़े शख्स का कटता गला देख कर चुप रहोगे तो तुम भी मरोगे.

अगर हिन्दुस्तान धर्मनिरपेक्ष देश है तो फिर जब यहां धार्मिक व्यक्ति को पूजा-पाठ करने, मंदिर-मस्जिद जाने, अज़ान देने, घंटी बजाने, ताज़िया या मुर्तियां निकाल कर सड़क जाम करने की अज़ादी है. तो एक नास्तिक व्यक्ति को अपने विचार रखने की आज़ादी क्युं नहीं होनी चाहिए. अगर कोई मज़हब नहीं मानता और फिर भी हर रोज़ मन्दिर की घंटियों की आवाज़ उसके कान में जाती है या सुबह-सुबह ना चाहते हुए भी उसे अज़ान सुननी पड़ती है. तब वो नहीं चिल्लाता कि मेरी भावनाएं आहत हो रही हैं, तो फिर मज़हब वाले ही क्युं इतनी छुई-मुई हैं. इस सहनशील देश में अगर किसी ने आपके धार्मिक ग्रंथ के बारे में कुछ कह दिया तो आपने दंगों की धमकी दे डाली, किसी ने आपके पूजनीय देवता की पैंटिंग बना दी तो आपने तलवारें निकाल लीं. किसी ने कहा ये मज़हब बेरहम है आपने इस मजाल पर उसकी गरदन काट ली. जैसे ही किसी ने चूं तक की आपने उसके खिलाफ़ फ़तवा जारी कर दिया. और फिर फ़तवा जारी करने के बाद भी चैन नहीं. जब आप सलमान रुश्दी के खिलाफ़ फ़तवा जारी कर ही चुके हैं तो आपका उनसे कोई मतलब तो रहा नहीं वो कहीं भी आये जायें, कुछ भी कहें, कुछ भी करें. अब वो आप के मज़हब के तो रहे नहीं जो उनके कुछ ‘गलत’ कह देने से आपकी नाक कट जाएगी. फिर भी देवबंद जैसी दकियानूसी सोच वाली संस्था इस मुल्क में बड़ी शान से अपनी मनमानी करती है. अगर कोई मज़हब को नहीं मानता तो क्या उसे इस मुल्क में अपनी मर्ज़ी से जीने का, सोचने का, रहने का अधिकार नहीं है. किसी धार्मिक ग्रंथ के खिलाफ़ बोलने से या किसी मुर्ति या पैग़म्बर की कपड़ों या बिना कपड़ों की तस्वीर बना देने से हज़ारों मुक़दमे दर्ज हो जाते हैं. यहां तक कि धार्मिक संवेदनाओं को ठेस पहुंची कह कर हमारे कोर्ट फ़ैसले भी सुना देते है.

दुनिया भर में कभी किसी काफ़िर ने ऐसा कोई मुक़दमा नहीं किया कि फ़लां ग्रंथ पर प्रतिबंध लगाओ उसमें लिखा है काफ़िरों को आग में जलाया जायेगा. ना ही कभी ऐसा हुआ, किसी नास्तिक ने एफ़.आई.आर की हो कि होली में मुझ पर रंग डाला गया या दिवाली, क्रिस्मस या ईद की पार्टी के नाम पर मुझसे ऑफ़िस, कॉलेज या स्कूल में ’कम्पलसरी डोनेशन’ वसूला गया. अगर एक धार्मिक व्यक्ति अपने दिल की बात कह सकता है तो एक नास्तिक का भी शब्दों पर उतना ही अधिकार है. हमारा मुल्क किताबों पर रोक लगाने में तो महारथी हो ही चुका है. लेखकों, आर्टिस्टों को बेइज़्ज़त करने में भी हमने विदेशों में खूब नाम कमाया है, अब हममें इतनी भी सहनशीलता नहीं बची कि किसी लेखक को कम से कम सुन सकें. उस सरकार का क्या अर्थ जो अपने ‘पी.आई.ओ होल्डर’ लेखक को सुरक्षा के साथ एक आयोजन का हिस्सा न बनने दे सके. ऐसी सरकार या पुलिस पर हमें भरोसा क्युं होना चाहिए जो देवबंद नामी संस्था से डर जाए. ये सरकार कटपुतली है जो सही-गलत का फ़ैसला नहीं कर सकती. यह एक विशेष धार्मिक संस्था को इतनी शय देती है कि वो संस्था किसी के कानूनी अधिकार को छीन ले. और फिर यही सरकार धर्मनिरपेक्षता को अपनी ‘यू.एस.पी’ भी कहती है.

मुम्बई पुलिस के सूत्रों की खबर से ये बात सामने आयी है कि राजस्थान पुलिस ने सलमान रुश्दी को झूठ कह कर आने से रोका. हालांकि राज्य सरकार अपने इस दावे पर कि रुश्दी की जान को खतरा था अभी भी अड़ी हुई है. अगर ये बात सही है तब भी केंद्र सरकार, राज्य सरकार और पुलिस रुश्दी को सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते. क्रिकेटरों और फ़िल्मी सितारों को आये दिन जान से मारने की धमकी मिलती रहती है. ऐसे में इन सिलेब्रिटीज़ को ’ज़ेड’ सुरक्षा उपलब्द कराने में ग़ज़ब की तेज़ी दिखाई जाती है. उन्हें स्टेडियम में जाने या शूटिंग करने से रोका नहीं जाता है.

ये वो मुल्क है जो खुद को कलात्मक समझता है, पर अपने कैनवास के हीरो हुसैन को इज़्ज़त ना दे सका. ये वो मुल्क है जो कहता है हमारा ह्रदय विशाल है लेकिन पड़ोसी मुल्क की शरणार्थी लेखिका को रहने के लिये थोड़ी ज़मीन ना दे सका. ये वही मुल्क है जहां गुरुदावारे के तहखानों में कटारें, मन्दिर के आहाते में लठबाज़ और मस्जिद के कुतबों में नफ़रत की बू मिलती है. क्या हमें इसी हिन्दुस्तान पर गर्व है. क्या हम आने वाली पुश्तों को यही मुल्क सौंपना चाहते हैं.