Thursday, 28 January 2010

ग्रेट शॉट सानिया...सोहराब कोर्ट से बाहर

तकरीबन 15 दिन पहले सानिया के शादी के बाद टेनिस से संन्यास लेने की खबर आई थी. सुन कर लगा था की इस पर कुछ बवाल तो होगा, न्यूज़ चंनेल्स पर, सेमिनारों में चर्चाएं तो होंगी ही. आखिर देश की एक बेहतरीन महिला खिलाडी संन्यास लेने की बात कह रही है ये वही सानिया मिर्ज़ा है जिसने कई इस्लामिक फतवों के बाद भी अपना खेल जारी रखा था. पर इस मुद्दे पर चर्चायों की उम्मीद करते वक़्त मैं ये भूल गयी थी की सानिया सिर्फ एक टेनिस खिलाडी नहीं है बल्कि महिला है तो अगर शादी के बाद खेल छोड़ने की बात की जाती है तो ये किसी को भी अजीब नहीं लगता.
असल में किसी लड़की का शादी के बाद करियर त्याग देना हिन्दुस्तानी सभ्यता माना जाता रहा है. इस मसले पर जब ब्लॉग पोस्ट किया तो प्रतिक्रियाएं कुछ ऐसी थी "सानिया ने सही फैसला लिया है एक हिन्दुस्तानी लड़की को यही शोभा देता है". यहाँ तक की कई पढ़ी लिखी महिलाओं ने भी 23 साल की उम्र में ही सानिया के खेल छोड़ने को सही बताया, कुछ लोगों ने कहा की अंतर राष्ट्रीय खेलों के हिसाब से सानिया की उम्र ज्यादा हो गयी है और उन्होंने सही समय पर फैसला ले लिया. पर ये लोग ऐसा कहने से पहले ये भूल गए की यु.एस खिलाडी सरीना विलियम्स 29 की उम्र में टेनिस की दुनिया पर छाई हुई थी. मतलब ये की 23 की उम्र खेल के लिहाज़ से ज्यादा नहीं है. लोग दलील देते हैं की सानिया का करियर डूब रहा है. मतलब ये की अगर आप अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे तो अपने खेल पर मेहनत करने की जगह शादी कर के संन्यास ले लो. .
खैर आज खबर सुनी की सानिया की मंगनी टूट गयी है और इसकी वजह रही सानिया के ससुराल वालो का सानिया पर करियर छोड़ने के लिए दबाव डालना. ज़ाहिर सी बात है जब कोई रिश्ता टूटता है तो दुःख तो होता ही है पर क्या ये तकलीफ इतनी बड़ी होती है की ज़िन्दगी ऐसे शख्स के नाम कर दी जाये जो आपके करियर में, आपकी सफलताओं में बाधा बने ? सानिया ने कमाल का शोट मारा और सोहराब को लाइफ के कोर्ट से बाहर निकाल दिया.
एक मज़बूत फैसले को सलाम...सारी नाराज़गी खत्म, सानिया को बहुत बहुत शुभकामनाएं.दुआ है की उन्हें और सभी लड़कियों को राह में पत्थर बनने वाला नहीं बल्कि ऐसा जीवनसाथी मिले जो मंजिल तक और मंजिल के बाद भी साथ दे.

Wednesday, 20 January 2010

खुशबू क्यूँ है दोषी ?

साउथ इंडियन एक्ट्रेस खुशबू से सब खफा हैं यहाँ तक की हमारे मुख्य न्यायधीश भी. खुशबू का गुनाह इतना है की उन्होंने 2005 में एक मेंगज़ीन को दिए अपने एक interview में कहा था की "मैं शादी से पूर्व बनाये यौन संबंधों को बुरा नहीं समझती लेकिन इसके लिए सारी सावधानियां बरतनी चाहियें". उन्होंने ये भी कहा की किसी भी पढ़े लिखे इंसान को ये शोभा नहीं देता की वो विर्जिन पत्नी की ख्वाहिश करे". खुशबू का ये कहना था की बस, जो कभी उनके फेन हुआ करते थे अब दुश्मन बन गए. उनके पुतले जलाए गए, कभी दीवारों पर लगाये जाने वाले पोस्टर्स में आग लगाई गयी यही नहीं उनके घर पर पत्थर भी बरसाए गए. खुशबू पर इस मामले को लेकर 23 केस दर्ज किये गए थे. पर अब खुशबू भी केसेस लड़ते लड़ते थक गयी हैं और अब उन केसेस से निजात पाने के लिए खुशबू मदद की अपील लेकर सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची.
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने खुशबू को झाड लगा दी. हमारे मुख्य न्यायधीश के.जी बालाकृष्णन ने खुशबू के बयान को विवादास्पद बताया और कहा की "ऐसी बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता".

मज़े की बात तो ये है की जब वरुण गाँधी अल्पसंख्यको के खिलाफ भड़काऊ भाषण देते हैं तब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कोई बयान नहीं आता. जब राज ठाकरे महाराष्ट्र में उत्तर भारतियों के खिलाफ क़दम उठाते हैं. मनसे के कार्यकर्ता MLA अबुआज़मी को हिंदी में शपत लेने के लिए विधान सभा में पीटते हैं फिर सीना कर ठोकर स्वीकार भी कारते हैं. जब श्री राम सेना के कार्यकर्त्ता पब में घुसकर लड़कियों से बदसलूकी करते हैं और फिर इसे भारतीय सभ्यता की रक्षा का नाम देते हैं तब सुप्रीम कोर्ट का कोई बयान नहीं आता. हमारे माननिये मुख्य न्यायधीश खामोश रहते हैं पर जब बात लड़कियों की वर्जिनिटी की आती है तो एहसास होता है की "इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता"
वाह भई वाह इसे कहते हैं न्याय.

Friday, 15 January 2010

यूथ आइकॉन से आस टूटी

तो सानिया मिर्ज़ा शादी के बाद टेनिस नहीं खेलेंगी. वाह क्या बात है लड़की इस्लाम के रास्ते पर लौट रही है वैसे भी लड़की को शादी के बाद घर बार, बच्चे और परिवार ही संभालना होता है. आदर्श भारतीय नारी को यही शोभा देता है की वो अपनी ज़िन्दगी अपने परिवार के नाम कर दे. मजाजी खुदा यानी शौहर को किसी बात से इनकार ना करे.
सानिया मिर्ज़ा ने वही किया है जो २ साल पहले ऐश्वर्या राय ने पीपल के पेड़ से सात फेरे ले कर किया था यानि हिन्दुस्तानी महिला को ये मिसाल दी की "लड़किओं चाहे कितना ही आगे क्यूँ ना बढ़ जाओ पर जब बात शादी की आये तो सब छोड़ छाड़ कर पत्नी धर्म में लग जाओ."
माना की सानिया को बहुत सी लड़कियां आदर्श मानती हैं, माना की हिन्दुस्तानी समाज ने कभी सानिया की वजह से अपने अन्दर झाँकने की कोशिश की हो पर कोर्ट में शोर्ट लगा कर विपक्षी खिलाडी को कमज़ोर करने वाली सानिया को शादी के बंधन ने कमज़ोर कर दिया. आज बहुत सी लड़कियां अपने करियर के लिए माता पिता को सानिया का हवाला दे कर मनाती हैं. माँ बाप को उम्मीद है की उनकी बच्चियां भी कुछ कर दिखायेंगी जिस समाज में आज भी लड़कियों के लिए टीचिंग फील्ड को सही सामझा जाता है वहां सानिया के टेनिस शोर्ट्स ने आम इंसान के दिमाग पर भी शोर्ट मारा. जैसे जैसे सानिया टेनिस जगत की ऊँचाइयों चढ़ी वैसे वैसे भारतीय लड़कियों के अरमान भी ऊंचाइया चढ़े. रास्ता मुश्किल है पर लड़कियों को इस डगर पर चलने की हिम्मत सानिया से ही मिली, आज भी जब लड़कियां सानिया की तरफ देखती हैं तो उन्हें उम्मीद दिखाई देती है समाज के बदलने की, धर्म के ठेकेदारों के पिघलने की. सानिया ने किसी फ़ालतू के फतवे की परवाह किये बग़ैर जिस तरह अपना खेल जारी रखा वो काबिले तारीफ़ था. सानिया की हिम्मत ने युवा पीढ़ी को साबित किया की अगर युवा चाहें तो धर्म का ढोल पीटने वालो को झुकना होगा.
सानिया के इस फैसले ने युवा पीढ़ी और ख़ास कर महिला सशक्तिकरण की बात करने वालो के मुह पर चांटा मारा है. साथ ही महिलाओं को मान मर्यादा की चादर में लपेट कर चार दिवारी में रखने वालो के सीने चौड़े कर दिए हैं. जब सानिया को यूथ इकॉन अवार्ड मिला था तो लगा था की हाँ ऐसा ही होना चाहिए हमारा यूथ आइकॉन स्मार्ट, करियर oriented और निडर पर अब फिर सोचना होगा क्या सानिया यूथ आइकॉन के सम्मान की हक़दार हैं. क्या आज के युवाओं का आइकॉन कोई ऐसी महिला हो सकती है जो २३ साल की उम्र में ही अपने करियर से संन्यास लेने की बात कहे.
(किसी को बुरा लगा हो तो बुरा मत मानियेगा चांटा पड़ा है तिलमिलाहट तो होगी ही )

Friday, 8 January 2010

क्या ख़ूबसूरती अभिशाप है ?

ख़ूबसूरती के लिए कसीदे गढ़े जाते हैं. ख़ूबसूरती की तारीफ़ में ज़मीनोंआसमा एक कर दिए जाते हैं. खूबसूरत साथी की तलाश भी हर कोई करता है. एक research से पता चलता है कि छोटे बच्चे खूबसूरत चेहरों को बेहतर response करते हैं. खूबसूरत होना अपने आप में एक गुण माना जाता है. खूबसूरती हर किसी को लुभाती है और अगर आप खूबसूरत हैं तो किस्मत आप पर मेहेरबान है.
पर क्या वाकई खूबसूरती एक वरदान है ? हाल ही में एक टीवी सीरियल देखा उस सीरियल में नायिका बेहद सुन्दर है, बड़ी बड़ी आँखें, गोरा रंग, खूबसूरत नैन नक्श पर वो अपनी सुन्दरता सबसे छुपा कर रखती है. अपने चेहरे पर कालिक लगा कर रखती है. नायिका के घर वाले भी नायिका की सुन्दरता को जग ज़ाहिर नहीं करना चाहते क्यूंकि वो डरते हैं कि अगर उनकी बेटी कि सुन्दरता के बारे में लोगों को पता चलेगा तो ये उनकी इज्ज़त के लिए खतरा है. नायिका की माँ नहीं चाहती कि उसकी बेटी को कोई बुरी नज़र से देखे.

इस कहानी ने ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या एक लड़की का खूबसूरत होना उसके लिए इतना बड़ा अभिशाप है.
कुछ साल पहले एक किताब पढ़ी थी. वैशाली कि नगरवधू. उस उपन्यास में भी पिता अपनी बेटी की सुन्दरता जग से छुपाने के लिए नगर से बहुत दूर के इलाके में रहता था.
एक लड़की के लिए सुन्दरता का क्या महत्व है उसके जीवन में सुन्दरता से क्या क्या बदलाव आ सकते हैं. सुन्दर होने से वैसे तो कई काम आसान हो जाते हैं जैसे शादी के समय लड़की आसानी से पसंद आ जाती है, ससुराल वाले रंग रूप को लेकर ताना नहीं देते पर पति के शक की सुई भी तो सुन्दर बीवी के सर पर रहती है. सुन्दर लड़कियों के चरित्र पर अक्सर ही ऊँगली उठाई जाती है. घर की बेटियों को वैसे भी छुपा कर ढांक कर रखा जाता है पर अगर बेटी सुन्दर है तो बड़े भई और बाप कि आँखों में कांटे की तरह चुभती है.

हमारा समाज औरत के सकारात्मक पहलु को भी नकारात्मक दृष्टि से देखता है जैसे एक आदमी की ताक़त उसकी मजबूती है वैसे ही एक औरत की ताक़त उसकी कोमलता है. प्रकृति ने आदमी और औरत को मुख्तलिफ खूबियाँ दी हैं जिसमे आदमी को बल और औरत को ख़ूबसूरती मिली है. पर कुदरत के इस तोहफे को भी औरत के लिए अभिशाप बना दिया गया है.
औरत का अच्छा दिखना उसकी बुराई बन गया है. अक्सर लोग इस बात पर लड़कियों का मज़ाक उड़ाते हैं की वो बेहतर दिखना कहती हैं, खुद को सजाती सवांरती हैं. इस बात को बिलकुल नज़र अंदाज़ कर दिया जाता है कि जैसे आदमी को बलशाली होने का तोहफा कुदरत से मिला है वैसे ही औरत को भी सुन्दरता का हक कुदरत ने ही दिया है.