Monday, 29 March 2010

काश....

काश के मैं कुछ कर पाती,
सारे दुखों को हर पाती।
दर्द ना होता महसूस कभी,
इतना आगे बढ़ पाती।
हँसना कैसा रोना कैसा,
पत्थर हो ऐसी जड़ पाती।
हार हार के जीत मैं जाती,
खुद से ऐसे लड़ पाती।

Thursday, 25 March 2010

तू औरत है औरत...प्रतिक्रिया ना दे



शादी से पहले यौन सम्बन्ध बनाना अपराध नहीं है. इन मुद्दों को इतना complicated बना कर मजेदार तरीके से परोसना, डिस्कशन करते वक़्त चेहरे पर एक घटिया मुस्कराहट, चीप लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते हुए परसनल प्रहार बेहद आम है. जब भी इस तरह के किसी मुद्दे पर टीवी शो में किसी महिला को बुलाया जाता है तो मर्दों को घटियापन पर उतरते देर नहीं लगती... डीबेट प्रोग्राम्स में पूजा भट्ट पर बातों बातों में कीचड़ उछालना लगभग सभी ने देखा होगा. एक सज्जन ने एक शो में बहस के दौरान स्ट्रगलिंग एक्ट्रेस प्रीती को कहा था 'अगर आप को सड़क चलते कुछ भी पहनने का अधिकार है, तो मुझे भी आपके साथ कुछ भी करने का अधिकार है'
यौन सम्बन्ध अपराध हो ना हो पर ऐसे टुच्चे शब्दों का इस्तेमाल वो मानसिकता दिखाता है जो पूरे समाज पर छाई हुई है.
अगर आपको अपनी so called आबरू प्यारी है तो इनसे लड़ा भी नहीं जा सकता..लफ़्ज़ों से आपके कपडे नोच लेंगे, नज़रों से आप को बेआबरू कर देंगे...मज़े की बात तो ये है की ये वही लोग हैं जो नारी जाती की भलाई और इज्ज़त की दुहाई देते हैं. जबकि खुद मौका मिलते ही अपना नकाब उतार फेंकते हैं, उस परदे के पीछे का चेहरा सड़क चलते लड़कियों की कमर पर हाथ मार कर निकल जाने वालों से हुबहू मिलता है.
शादी के बाद पति की पत्नी पर जोर ज़बरदस्ती को ये कह कर ढंका जाता है की पत्नी अगर शारीरिक ज़रूरतों को पूरा नहीं करेगी तो पति बाहर का रास्ता देखेगा. वहीँ अगर यही बात पत्नी पर लागू की जाए तो वो औरत बदचलन कहलाएगी. अगर दो लोग अपनी मर्ज़ी से करीब आते हैं तो इस पर ख़राब करेक्टर का दोष भी लड़की पर. अभी हाल ही में एक किस्सा बहुत करीब से देखा एक कपल को ऑफिस में 'किस' करते देखा गया. (जो की मैं मानती हूँ की personal रिश्तों को प्रोफेशनल जगहों से दूर रखना चाहिए या कम से कम प्रोफेशनली बिहेव करना ही चाहिए). इन हालात में वही हुआ जो होता आया है. लड़की को terminate कर दिया गया जबकि वो लड़का अब भी ऑफिस में धड़ल्ले से काम करता है हँसता बोलता है.
किसी भी फिसिकल इन्वोल्व्मेंट में लड़की का ही सर झुकता है जबकि उसमें आदमी और औरत दोनों भागीदार होते हैं.
कहते हैं इज्ज़त लुट गयी...अरे काहे की इज्ज़त जो कुछ हुआ उसमें क्या लड़कों का कोई role नहीं होता या तो दोनों की इज्ज़त लुटी या तो किसी की भी नहीं...इज्ज़त का टोकरा औरत ही क्यूँ उठाये.
कभी अपना दुपट्टा सही से ओढ़ लो और कहीं अपना मुंह चुपचाप बंद कर लो...तुम औरत हो प्रतिक्रिया देना तुम्हारा काम नहीं.

Tuesday, 23 March 2010

दिल सा कोई कमीना नहीं

दिल और दिमाग का आपसी ताल मेल ना है ना कभी होगा, क्या चाहिए क्या करना है..कौन सा रास्ता सही है...इसमें हमेशा ही दिल और दिमाग बेहस करते हैं और इस बहस में मरते हैं हम यानी इंसान...
घुटते हैं हम तड़पते हैं हम....वैसे scientificly ये prove हो चुका है की सोचने समझने का काम हमारा brain करता है पर लोगों ने दिमाग और दिल की category बनाई जो अपनी जगह बिलकुल सही है...हम जो कुछ महसूस करते हैं हमारी हंसी हमारा दर्द हमारी उलझने दिल से जुडी होती है और हमारे मज़बूत फैसले, mature decisions दिमाग की देन होते हैं...मतलब जो बेसाख्ता हो वो दिल...और जो चालाक हो वो दिमाग. यानी हमारे अन्दर ही दो शख्स.

दिल ओ दिमाग की जंग में पल पल मरते हैं,
अब तो खुद ही से डरते हैं खुद ही से डरते हैं
ख्वाहिशें अब करते नहीं हम,
जो की थी हसरतें उन्ही से डरते हैं
खुद कलामी कर लिया करते थे हम,
अब तो हाल ये हैं आईने से डरते हैं
ना पूछो मेरी शरारतें मेरी शोखी कहाँ गयी,
सच कहें तो अब हम कहकहों से डरते हैं.

दिल हमेशा ऐसे रास्ते पर चलने को कहता है जो खतरनाक होता है, रिस्की होता है और दिमाग हमेशा सुरक्षित रास्तों की तलाश में रहता है, इसी उधेड़ बुन को दिल और दिमाग की जंग कहा जाता है...मतलब फैसला कोई भी हो बेबस इंसान ही होगा...क्यूंकि दिल सा वाकई कोई कमीना नहीं...

Monday, 8 March 2010

महिला दिवस!!! अच्छा मजाक है

9 साल की बच्ची का निवस्त्र शव एक पुलिस कालोनी की छत पर मिला...महिला दिवस पर ये भेंट है समाज और कानून की तरफ से महिलाओ को.
9 साल की बेबस बच्ची का बलात्कार और फिर बेरहमी से मार डालना. कैसे होते हैं वो जानवर जो शकल से इंसान दिखते हैं? एक बच्ची जो कुछ दिन पहले तक स्कूल जाती थी, पार्क में झूले झूलती थी, अपनी गुड़िया के टूट जाने पर रोती थी. उसकी आँखें टॉम एंड जेर्री पसंद करती थीं या अलादीन. उसे ओरेंज आइसक्रीम पसंद थी या बर्फ का गोला. बड़े होकर वो डॉक्टर बनना चाहती थी या फिर सुपरगर्ल. कौन जाने वो क्या चाहती थी उसकी मासूम आँखों में कितने ख्वाब थे. शायद वो चिल्लाई होगी..."अंकल ये क्या कर रहे हो, अंकल मुझे छोड़ दो"
वो रोई भी बहुत होगी, उसकी फ्रोक झटके से उतार कर फ़ेंक दी गयी होगी. उसके गले से निकलने वाली चीखों को हाथ रख कर दबा दिया गया होगा. फिर जब वो अधमरी पड़ी होगी तो उसे अपने घिनोने हाथों से हमेशा के लिए चंदा मामा के पास भेज दिया गया होगा.
जिस जानवर ने ये किया उसका शायद पता भी ना चले और अगर पता चल भी जायेगा तो वो बच जायेगा. इसके बाद भी अगर आज से 20 साल बाद कोई सजा सुनाई जाएगी (अगर सुनाई गयी)तो वो होगी उम्र क़ैद या फांसी . क्या इतना काफी है ??? जिस घटिया, वेह्शी जानवर ने ये किया उस पर कोई आसमानी बिजली नहीं गिरेगी, कोई चमत्कार उसे तबाह नहीं करेगा.
वो नपुंसक भगवान, खुदा या god अगर है तो बस देखता रहेगा. उससे बेहद नफरत है मुझे.
बेहतर है यही सोच लूं की कोई नहीं है...कोई नहीं है...कोई नहीं है

Wednesday, 3 March 2010

मैं मुसलमान हूँ

मेरा जन्म हिंदुस्तान में हुआ है यहीं पली बड़ी हूँ अपने मुल्क से बेहद प्यार है. जब छोटी थी तो स्कूल में जब भी किसी क्लास में पाकिस्तान के बारे में ज़िक्र होता तो सब मेरी तरफ देखने लगते. मुझे अपने क्लासमेटस पर बेहद गुस्सा आता. उस वक़्त मेरा बच्चा मन यही सोचता जब इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच होता है तब मैं इंडिया के जीतने की दुआएं मांगती हूँ. फिर ऐसा क्यूँ? सब पाकिस्तान का ज़िक्र आते ही मेरी तरफ क्यूँ घूरते हैं.

खैर वो बचपन की बात थी पर अब भी हालात बदले नहीं हैं. मेरे ऑफिस में एक जनाब हैं जिन्हें पाकिस्तान से बेहद नफरत है और वो इस नफरत को भारत के प्रति अपना देशप्रेम मानते हैं. पाकिस्तान से नफरत यानी हिंदुस्तान से देशप्रेम ये फिलोसोफी मुझे आजतक समझ नहीं आई. कहते हैं की दोनों मुल्कों के आम लोगों के दिल में एक दुसरे के लिए प्यार है और हुकूमत अपने फायदे के लिए जंग करती है. मगर असल में दोनों ही मुल्कों के आम लोगों के बीच बेपनाह नफरत है. बंटवारे के वक़्त सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा नहीं बंटा था बल्कि दिल भी बंट गए थे.

मैं नमाज़ नहीं पढ़ती रोज़े नहीं रखती खुद को नास्तिक मानती हूँ पर ऑफिस में एक शिवसेना समर्थक जनाब की बातें सुन कर लग रहा है की मैं खुद को नास्तिक कह कर पल्लू नहीं झाड सकती. नास्तिकता मेरी विचारधारा है पर जन्म से मैं एक मुसलमान हूँ. इस्लामिक परिवेश में पैदा हुई हूँ, माँ बाप बड़ी बहन, खानदान के लोग सब नमाज़ पढ़ते हैं रोज़े भी रखते है पर साथ ही हिंदुस्तान और पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में हिंदुस्तान की जीत पर ख़ुशी मनाते हैं. जब कहीं ब्लास्ट हो तब वो भी उतने ही परेशां या दुखी होते हैं जितना कोई गेंर मुस्लिम. हालही में मेरे एक दोस्त को किसी ने आतंकवादी कहा क्यूंकि कसाब के ऊपर हो रही किसी debate में उन्होंने कहा "कसाब को इतनी जल्दी फांसी नहीं दी जा सकती क्यूंकि पुलिस को कसाब से बहुत कुछ उगलवाना हज़ाहिर सी बात है यही अगर किसी गेंर मुस्लिम ने कहा होता तो उसकी देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं उठता.
ये सब सोच कर आँख में उसी तरह आंसू आ जाते है जिस तरह राष्ट्रगान सुनते हुए जज़्बात में पलकें भीग जाती हैं.