Saturday, 19 March 2011

मिलन...


चलो ज़िन्दगी को

रंगों

सा खिलने दें...



काला भी एक

रंग है,

कि

आओ उसे भी

सफ़ेद से गले

मिलने दें...



ये मिलन

ठीक नहीं ना सही,

अश्कों को

फिर भी

लहू में जी भर के

घुलने दें...




Friday, 18 March 2011

मुक़ाबला

एक और रात

खंजर लिये खड़े सवालात…

कुछ आंसू, थोड़ी सिल्वटें

बिस्तर पर बिखरे

रोज़मर्रा के जज़्बात…


वो इठलाते हुए

हंसती है,

गर्दन घुमा कहती है,

तकिये में मुंह

मत छुपा, देख मैं हूं

तेरी ही ज़ात…


मैं भी कितना

लड़ूं,

तू जीती आखिर हुई

मेरी ही मात…


तो ले खुद को

हाज़िर किया मैंने,

साथ ही

मुटठीभर अधजन्में

खाबों के

लहू से भरी परात…

Sunday, 13 March 2011

हूक-सी उठती है...


रोना नहीं आता
बस
हूक-सी
उठती है...
चीखती नहीं
बस
आह निकलती है...

झिंझोड़ दिया हो
जैसे किसी ने
बांह पकड़कर
कितना
चल सकते हो
मेरी जान अकड़कर...

टूटी इमारतें,
मलबों का ढेर,
निर्मल पानी,
निर्मम पानी,
बेबाक पानी,
बेहिसाब पानी...

बहुत सहने के
बाद,
जैसे भड़की धरती...
दर्द दबाए
दबाए
जैसे तड़पी धरती...

रोना नहीं आता
बस
हूक-सी
उठती है...