Sunday, 6 November 2011

इन्सान नहीं हैवान

बकरा ईद उन त्योहारों में से है जिनमें जहालत और ज़लालत की हद पार होती है. बकरों-भेड़ों को ऊंचे दामों पर खरीद के लाना अपने घर में बांधना, प्यार करना, पुचकारना और फिर कुछ रोज़ बाद ईद पर अपने आंगन में ही उसे ज़िबह (बलि) कर देना. पूरा आंगन खून से लाल, गर्दन एक तरफ़ पड़ी छटपटा रही होती है और बकरे को खींच कर ऊंचाई पर टांग दिया जाता है. जब जिस्म का सारा खून बह जाता है तब कसाई आ कर उसे ले जाता है और शाम तक उसके छोटे-छोटे खाने लायक टुकड़े कर के घर पहुंचा देता है. रात को खाने में वो जानवर जिसे दो दिन पहले तक बहुत दुलारा जा रहा था मसाले में भुन कर चटकारे ले लेकर खाया जाता है. इस्लाम में बकरा ईद के बारे में ये मान्यता है कि इन्सान को क़ुर्बानी दिये जाने वाले जानवर से जितना लगाव और जुड़ाव होगा क़ुरबानी उतना ही पुण्य दिलायेगी. ऐसा नहीं है कि क़ुर्बानी का चलन सिर्फ़ इस्लाम में है, भारत के कई हिस्सों में मनोकामना पूरी करने के लिये तांत्रिकों के सामने जानवरों यहां तक कि बच्चों की भी बलि दी जाती रही है. मगर फिर भी दोनों ही मसले पूरी तरह से अलग हैं. बकरा ईद पर जो होता है वो खुले आम सीना चौड़ा कर के बेहिसों की तरह होता है. सबसे बड़ी बात ये है कि ज़्यादातर घरों में ये सब इस कदर बेनियाज़ी से होता है कि घर के बच्चे भी जानते हैं उनका प्यारा पालतू बकरा कल खूंटी से बंधने की जगह प्लेट में आ जायेगा.

ऐसे ही बेशर्मी के त्योहारों में से एक है करवा-चौथ. कोई पति अपनी पत्नी से प्यार करता है, उसकी फ़िक्र करता है तो ये कैसे मुमकिन है कि पत्नी दिनभर कुछ खाये पिये ना और पति महोदय आराम से अपनी उम्र बढ़वाते रहें. इसी लिस्ट में छठ और तीज भी शामिल हैं जहां बेटे और भाई के लिये औरत दिन भर भूखी रहती है. ठंड के मौसम में पानी में नंगे पांव घंटों खड़ी रहती है. समाज के कई त्योहार इन्सान से इन्सानियत का लबादा उतारते रहते हैं.

इश्वर के आगे अपनी श्रद्दा साबित करने के लिये जानवर की क़ुरबानी देना ज़रूरी है. मर्द के आगे अपना प्यार साबित करने के लिये भूखा रहना ज़रूरी है. घूमफिर कर बात आती है खुद को या किसी और को तकलीफ़ देने की. ये तो साइकॉलजी भी मानती है कि जानते बूझते खुद को दर्द देना या फिर किसी को चोट पहुंचा कर खुशी मनाना दिमागी बीमारी है.

इन्सान से बड़ा वहशी जानवर कोई नहीं है, अगर आप इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते तो इन्सान के खुशियों भरे त्योहारों, मान्यताओं या फिर खेलों पर नज़र डाल लीजिये. इन्सान अपने फ़ायदे के लिए वक़्त-वक़्त पर कुदरत के तोहफ़ों को उजाड़ता रहा है. चाहे फ़र्नीचर बनाने के लिये पेड़ काटने हों या फ़ैक्ट्रियों के लिये जंगल के जंगल उजाड़ने हों.

अब हमारे खेल ही देख लीजिये कुश्ती या बॉक्सिंग. एक आदमी दूसरे को तब तक पीटेगा जब तक सामने वाला लहुलुहान ना हो जाये. एक के दांत टूटेंगे तो दूसरे की आंख फूटेगी. एक खिलाड़ी दूसरे को उठा कर ज़ोर से ज़मीन पर पटकेगा और भीड़ में जोश भर जायेगा. उस पर सफ़ाई में ये भी कहा जायेगा कि बॉक्सिंग में कैसे मारना है और कैसे नहीं इसके नियम होते हैं. इसीलिए ये खेल ग़ैर-कानूनी नहीं है बल्कि हैवानियत के मेडल भी मिलते हैं. अमरीका में यू.एफ़.सी (अल्टीमेट फ़ाइटिंग चैम्पियनशिप) की मार-काट को भी खेल ही कहा जाता है. यहां तक कि यू.एफ़.सी को खास कर ये कह कर प्रमोट किया जाता है कि इसमें को नियम नहीं. कई बड़े देशों में महंगे टिकट खरीद मां-बाप अपने बच्चों को लेकर ये वहशीपन देखने जाते हैं. इस खेल में भीड़ बस खून देखना चाहती है, शोर में बस यही सुनायी देता है “बहुत अच्छे, मारो, मारो”. एक खिलाड़ी को जब ज़ोर से मुंह पर मुक्का पड़ेगा और उसका जबड़ा टूट जायेगा तो शोर उठेगा “वाह! क्या बात है…किल हिम किल हिम”. स्पेन की बुलफ़ाइटिंग में हज़ारों लोग सांड और आदमी की भिड़ंत देखने जुटते हैं. सब लोग आदमी के ज़िंदा रहने की कामना करते हैं सांड को पहले एक तलवार से ज़ख्मी किया जाता है और फिर जंग शुरू होती है. खेल के आखिर में कोई एक मरता है, अगर आदमी मर जाये तो भीड़ को बड़ा दुख पहुंचता है. खेल को सफल तब माना जाता है जब सांड के खून से मिट्टी सन जाती है और वो मैदान में दम तोड़्ता है.

वैसे तो हम अक्सर ही अपने वहशी होने का सुबूत देते रहे हैं पर हमारे शौक़, त्योहार और मान्यताएं हमारी इन्सानियत की नौटंकी की पोल खोलती रहती है. स्वामी विवेकानंन्द के अनुसार “मज़बूत बनो क्युंकि बलि हमेशा भेड़ या बकरे की दी जाती है, शेर की नहीं” तो हम शेर तो नहीं बने क्युंकि उसके पास ज़िन्दा रहने का और कोई साधन नहीं है, वो मारेगा तभी जीएगा पर हम शौक़, स्वाद और आस्था का विश्वास दिलाने के लिये मारते हैं, भूखा रखते हैं यहां तक कि सिर्फ़ मज़े के लिये किसी को पीट-पीट कर उसका चेहरा सुजा देते हैं.

अगर आप अब भी मानते हैं कि इन्सान न्रम दिल है. तो पिछले दिनों चाइना में हुई घटना को याद कीजिये जहां दो साल की एक बच्ची को सड़क पर मरता हुआ छोड़ दिया गया था. क़रीब अठारह लोग बच्ची के पास से गुज़रे पर किसी ने भी उसे अस्पताल पहुंचाने की ज़हमत नहीं उठाई. एक-दो लोग आंख मूंद कर चलते बनें तो इत्तेफ़ाक मान सकते हैं पर इतने लोग बिना मदद किये गुज़र जायें तो सवाल खुद पर ही उठने लगता है. हमें ज़िन्दगी नहीं खून पसन्द है, हंसी नहीं चीख लुभाती है, सुकून नहीं खौफ़ सुलाता है. हम इन्सान नहीं हैवान हैं.