Wednesday, 3 September 2014

संवेदनशील मुद्दों को साम्प्रदायिक बनाने का दौर


उत्तर-प्रदेश में ऑनर-किलिंग के नाम पर साल 2013 में 85 हत्याएं हुईं, वहीं बाक़ी देश में कुल मिलाकर 24.‘असोसिएशन फ़ॉर एड्वोकेसी ऐंड लीगल इनिशिएटिवके अनुसार उत्तर-प्रदेश में इज़्ज़त के नाम पर होने वाली हत्याएं पूरे देश में सबसे अधिक हैं. जाति, गोत्र और धर्म के बिन्दू प्रेम विवाह करने वालों के लिए ज़हर की गोलियों का काम करते हैं. भारतीय समाज में इज़्ज़त के लिए अपनी औलादों का कत्ल करने वालों के प्रति सहानुभूति पाई जाती है क्युंकि पुलिस और प्रशासन भी इसी समाज का हिस्सा हैं. अब सोचने वाली बात यह है कि जिस ज़मीन पर नफ़रत की फ़सल जंगली पौधों की तरह खुद खुद उग जाती है, वहां लव-जिहाद की खाद का असर क्या होगा!

उत्तर-प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों की नींव पड़नी शुरू हो गई है. लोकसभा चुनावों में परचम फहराने के बाद भाजपा का अपनी हिंन्दुत्ववादी रणनीतियों पर भरोसा मज़बूत हुआ है. उत्तर-प्रदेश में कोई अल्पसंख्यक उम्मीदवार खड़ा किए बिना 80 में से 71 सीटें जीतना छोटी बात है भी नहीं. यही वजह है कि सालों से सो रहेलव जिहादनामी कुंभकरण को जगा दिया गया है. 13 सितंबर को उत्तर-प्रदेश में होने वाले उपचुनावों में इसी कुंभकरण का क़द नापा जाएगा ताकि 2017 तक पहुंचने वाली सड़क तैयार की जा सके. हमेशा की तरह भाजपा ने बड़ी समझदारी से चिंगारी सुलगाकर किनारा करना शुरू कर दिया है और दक्षिणपंथी खेमा घी और हवा के साथ तैयार है. हाल ही में विश्व हिन्दू परिषद, हिन्दू जागरण मंच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा ने मेरठ में हाथ मिलाते हुएलव-जिहादसे लड़ने के लिएमेरठ बचाओ मंचनामक संगठन बनाया. माना जा रहा है कि ऐसे ही क़दम मुरादाबाद, मुज़फ़्फ़रनगर, बरेली, बुलंदशहर, सहारनपुर और भगतपुर में भी उठाए जाएंगे. गौरतलब है कि दक्षिणी उत्तर प्रदेश के ये ज़िले साम्प्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील हैं.

गोरखपुर से भाजपा के नवनिर्वाचित सांसद और उत्तर प्रदेश में पार्टी के स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ ने हिन्दुओं को प्रतिशोध लेने के लिए मुसलमान लड़कियों से शादी करने की बात कही. समझने की बात ये है कि क्या किसी की बीवी होना सज़ा है, जो शादी के बदले शादी से हिसाब बराबर होगा? दूसरी बात, समाज की कुरीतियों को खत्म करने के लिए धर्म के ये ठेकेदार कभी अन्तरजातीय विवाह के समर्थन में क्यों कुछ नहीं बोलते. किसी भी समाज के लिए ये यकीन करना हमेशा मुश्किल होता है कि बेटियां खुद अपनी मर्ज़ी से घर छोड़ रही हैं. लड़कियों ने सोच-समझ कर फ़ैसला लिया, अपना जीवन-साथी खुद चुना, बेहद बगावती ख्याल है. इससे बेहतर अपनी बहनों को बेवकूफ़ समझो, इतना समझ लो कि उन्हें प्यार की दो बातें करके बरगलाया गया है. असल में बात हिन्दू-मुसलमान की है ही नहीं, प्रेम-विवाह ही समाज की आंखों की किरकिरी है. जहां दुल्हे के गले में पड़ी नोटों की माला उसकी शान बढ़ाती हो, जहां दुल्हन की अहमियत उसपर लदे ज़ेवर से तय होती हो, वहां शादी व्यापार है. पूरे व्यापार को ज़िन्दा रखने के लिए व्यापारी छोटी-मोटी आहूतियों से कभी नहीं हिचकता. जिन संस्कृतियों में लड़के वालों और लड़की वालों का रुत्बा बराबर होता है, वहां प्रेम विवाह को समाज का दुश्मन भी नहीं समझा जाता.     

लव-जिहाद नाम का शगूफ़ा पहली बार साल 2009 में छोड़ा गया था, जब कर्नाटक में एक हिन्दू लड़की ने एक मुसलमान लड़के से घर के खिलाफ़ जाकर शादी कर ली थी. लड़की के घर वालों ने पुलिस में अपहरण का मामला दर्ज करवाया. क्लबों में घुसकर लड़कियों को पीटने वाली श्रीराम सेना ने इस मुद्दे को भुनाने की खूब कोशिश की. बाद में लड़की ने अदालत के सामने अपनी मर्ज़ी से शादी करने की बात रखी और वापस अपने पति के पास चली गई. उस वक्त कर्नाटक पुलिस और सीबीआई ने लव-जिहाद नामी किसी भी संगठन के अस्तित्व से इनकार किया था

शर्म की बात है, भारत में राजनीति का स्तर इतना गिर गया है कि यहां महिला तस्करी जैसे संगीन अपराध को भी राजनैतिक रंग दिया जा रहा है. राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की मानव तस्करी से संबंधित रिपोर्टों के मुताबिक साल 2011 में उत्तर-प्रदेश में 3517 लोगों की अवैध तस्करी हुई, वहीं 2012 में ये आंकड़ा 3554 तक पहुंचा. इसमें से बड़ा हिस्सा महिलाओं की तस्करी से जुड़ा है. ‘ एशिआ फ़ाउंडेशनके अनुसार भारत में 90 प्रतिशत महिला तस्करी अन्तर्राज्यीय होती है, जबकि दूसरे देशों में पैटर्न इसके उलट है. यानि भारत में महिला-तस्करी के लिए विक्रेता और क्रेता दोनों ही भारी मात्रा में उपलब्ध हैं.

पुरुष-प्रधान समाज का दोगलापन देखिए, औरत की खरीद-फ़रोख्त के खिलाफ़ कभी एकजुट नहीं होता. पर अपनी मर्ज़ी से जीवन-साथी चुन रही लड़कियों से भिड़ने के लिए संगठन तैयार कर लेता है. वैसे इसी साल जुलाई में बीजेपी नेता ओपी धनकड़ ने हरयाणा में गिरते सेक्स-रेशियो का एक हल सुझाया था, बल्कि रैली के दौरान नौजवानों से एक वादा किया था. उन्होंने कहा था कि अगर हरियाणा में बीजेपी की सरकार आती है, तो राज्य का कोई भी नौजवान कुंवारा नहीं रहेगा और वह बिहार से लड़कियां लाकर उनकी शादी रचाएंगे. अब जिस समाज की मान्यताएं ही ये हों कि लड़की एक वस्तु है, उसका कोई वुजूद नहीं है, उसकी कोई मर्ज़ी नहीं है, लड़की की हां या ना एक ही होती है. वहां उसके फ़ैसले को इज़्ज़त क्यूं मिलेगी, वहां उसे नासमझ ही समझा जाएगा.

जो संगठन जनता को असली मुद्दों से भटकाकर, अपने संगठनों का समय और ऊर्जाकॉन्सपिरेसी थ्योरीपर खर्च करते हैं, ‘लड़की के बदले लड़कीजैसी घटिया सोच को समर्थन देते हैं, सभ्य-समाज में उनकी कोई जगह नहीं होती, मगर फिर बात तो यही है कि क्या हम सभ्य-समाज का हिस्सा हैं

Wednesday, 27 August 2014

विज्ञापन कम्पनियों के रंगभेदी रवैये पर रोक


एक लड़की नौकरी के इन्टर्व्यू के लिए जाती है. उसका चुनाव सिर्फ़ इस वजह से नहीं होता क्यूंकि लड़की का रंग सांवला है. वो अपनी इस नाकामी से बहुत निराश होती है. तभी उसकी ज़िन्दगी में आशा की किरण बन कर आती है, वो फ़ेयरनेस क्रीम जिसके इस्तेमाल के कुछ रोज़ बाद ही आप गोरे हो जाते हैं. ये गोरापन कोई ऐसा वैसा गोरापन नहीं है, इस गोरेपन में आपका चेहरा ‘फ़्लोरोसेंट बल्ब’ की तरह चमकने लगता है. सो ये लड़की अब अपना ‘सीएफ़एल’ नुमा चेहरा लिए दोबारा इन्टर्व्यू के लिए जा पहुंचती है. लड़की के चेहरे से निकलते तेज के आगे नतमस्तक होने के लिए कम्पनी का मालिक अपनी कुर्सी से खड़ा हो जाता है. जब मालिक फ़िदा तो नौकरी आपकी मुट्ठी में.

एक लड़की गायिका बनना चाहती है. मगर किस्मत की मारी बेचारी सांवली है, अब अगर आपका रंग ही सांवला हो तो आप सुरीले कैसे हो सकते हैं. सो लड़की के पिता उसे चमत्कारी फ़ेयरनेस क्रीम लाकर देते हैं. बस फिर क्या, चेहरा लाइट बल्ब की तरह दमकने लगता है और सुर चहकने लगते हैं.  लड़की ‘स्टार सिंगर’ बन जाती है.

ऊपर लिखे दोनों ही किस्से किसी की भी असल ज़िन्दगी के हिस्से नहीं हैं. ये दोनों ही ‘ओवर द टॉप’ ऐड्वर्टाइज़िंग के नमूने हैं. कुछ साल पहले तक फ़ेयरनेस क्रीम के विज्ञापन विवाह या प्रेम केंद्रित होते थे. जैसे एक लड़की के सांवले होने की वजह से लड़के वालों ने रिश्ते से इन्कार कर दिया या एक लड़की किसी से प्रेम करती है मगर लड़के को दूसरी गोरी त्वचा वाली लड़की पसंद है. ऐसे में सात दिन के अन्दर रंग निखारिए और जीवन-साथी पा जाइए.

अब चूंकि समाज बदल रहा है और लड़कियां घर की चौखट लांघ रही हैं, तो कम्पनियों ने अपने ‘टार्गेट ग्रुप’ को लुभाने के पैंतरे बदल लिए हैं. बेशक ऐडवर्टाइंज़िंग में बदलाव कम्पनी के वित्त के लिए होते हैं, समाज के हित के लिए नहीं.

भारत में ब्यूटी प्रोडक्ट्स का बाज़ार 9000 करोड़ रुपयों से अधिक का है. इसमें फ़ेयरनेस क्रीम/ब्लीच का हिस्सा 3000 करोड़ से ज़्यादा का है. यही वजह है कि लॉ रियाल (L’Oreal) या नीविया (Nivea) जैसी बड़ी विदेशी कम्पनियां भी जब भारतीय बाज़ार में उतरती हैं, तो वो भी यहां की मार्केट के अनुसार अपनी-अपनी गोरेपन की डिब्बियां दुकानों में सजा देती हैं. आज बाज़ार में रंग निखारने के लिए फ़ेस क्रीम, बॉडी लोशन, फ़ेस वॉश के साथ ही अंडर-आर्म को गोरा बनाने के डियोडरंट तक मौजूद हैं. अंग्रेज़ी कहावत “टॉल, डार्क एंड हैंडसम” को “फ़ेयर एंड हैंडसम” में बदले की कवायद भी जारी है.

 

हर देश का इतिहास अपने संघर्ष की बुनियाद पर लिखा जाता है. पिछली सदी में दुनिया के एक बड़े हिस्से ने रंगभेद के संघर्ष को देखा और जिया. यही वजह है कि वक्त गुज़रने के साथ-साथ पश्चिमी और अफ़्रीकी देश रंग-भेद के मसले पर संवेदनशील हुए. हालांकि ये संवेदनशीलता दक्षिण-एशियाई देशों तक नहीं पहुंची, क्युंकि यहां धर्म और जाति ज़्यादा बड़ा मसला था. सो आज हमारा कानून धर्म और जाति के आधार पर हुए भेदभाव को लेकर सख्त है, वैसे अभी मन्ज़िल बहुत दूर है पर हमने चलना तो शुरू कर ही दिया है. धर्म या जाति की तरह रंग भी इन्सान पैदा होते हुए खुद नहीं चुनता, इन्सान धर्म बदल सकता है, आज के दौर में अपनी वर्ण व्यवस्था से बाहर निकलकर कोई दूसरा काम भी चुन सकता है. लेकिन प्रकृति ने आप पर जो रंग चढ़ाया है उसे उतारा या बदला नहीं जा सकता.   

 

फ़ेयरनेस प्रोडक्ट्स के विज्ञापन रंग भेद को बढ़ावा देते हैं. ये काले या सांवले रंग के लोगों के बीच हीन भावना भरकर उन्हें अपने उपभोक्ताओं में बदलने की कोशिश करते हैं. सेल्फ़-रेगुलेटरी संस्था ऐड्वर्टाइज़िंग स्टैन्डर्डस काउंसिल ऑफ़ इंडिया’ (ए.एस.सी.आई) की ‘कोड-बुक’ चैप्टर III 1 b में धर्म, जाति, नस्ल या रंग के आधार पर टिप्पणी करने की मनाही है पर ज़ाहिरी तौर पर विज्ञापन कम्पनियां लम्बे समय तक इसकी अनदेखी करती रही हैं. यही वजह है कि फ़ेयरनेस प्रोडक्ट्स ने त्वचा और स्वाभिमान के लिए हानिकारक होते हुए भी, बिना किसी संकोच के चारों तरफ़ पैर पसार लिए.

 

पिछले हफ़्ते ए.एस.सी.आई ने इन कम्पनियों के लिए खासतौर पर कुछ गाइडलाइंस लागू कीं. इनके अनुसार फ़ेयरनेस प्रोडक्ट्स के विज्ञापनों को कई बातों के लिए मना किया गया है, जैसे रंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव दिखाना. ढके हुए रंग के लोगों को निराश, नाकाम, नाखुश या ये दिखाना कि वो अपने रंग की वजह से किसी तरह के नुकसान में हैं. रंग के आधार पर लैंगिक भेदभाव. विज्ञापन में मॉडल के चेहरे पर उसके रंग की वजह से कोई नकारात्मक भाव दिखाना. साथ ही, काले या गोरे रंग को किसी खास समुदाय, जाति, व्यवसाय या नस्ल से जोड़ना. 

विज्ञापन खूबसूरती को बेहद बदसूरती के साथ स्टेरीओटाइप करते हैं. काले रंग को नाकामयाबी से जोड़ने का चलन, बिना मतलब ही गोरी त्वचा को कटघरे में खड़ा कर देता है.  कुछ इस तरह जैसे गोरी त्वचा के लोगों को सब कुछ सिर्फ़ उनके रंग की वजह से ही मिलता है, जीवन-साथी, प्रेमी, नौकरी हो या प्रोमोशन. हर इन्सान की ज़िन्दगी की लड़ाई अलग होती है, हर किसी का अपना रास्ता और संघर्ष होता है, हम किसी के सफ़र को सिर्फ़ उसके रंग-रूप से नहीं आंक सकते.  सामान्यीकरण ने न कभी समाज का भला किया है, न ही किसी व्यक्ति विशेष का.

Friday, 11 January 2013

शादी क्यूं करूं?




मैं शादी क्यूं करूं? क्या इसलिये कि सब कर रहे हैं? अगर ऐसा है तो सब धोखेबाज़ियां, जालसाज़ियां भी कर रहे हैं. तो आज से ही शुरु कर देती हूं. बड़ी खाला पिछले दिनों घर आई तो कह रही थीं “दुनिया की ज़रूरत है शादी.” मैंने कहा “दुनिया की ज़रूरत तो पट्रोल भी है, अब क्या कूंआ खोदने लगूं.” खाला चिढ़कर बड़बड़ाने लगीं “अरे, भई…कोई साथी तो होना चाहिये ना, पूरी पच्चीस की हो गयी हो” मैंने इतराते हुए खाला के कंधे में हाथ डाला “साथी की फ़िक्र क्युं करती हैं, बिटिया आपकी इतनी बुरी भी नहीं“ ये खाला के सब्र की इन्तेहा थी “सारा दिमाग पढ़ाई ने खराब किया है, अब तक मैं मैदान में उतर चुकी थी “लो, मानो जब आदम-हौआ ज़मीन पर आए तो अल्लाह ने साथ में काज़ी भी भेजा था.” 

मां बताती है, बचपन में मैं अपने टिफ़िन बॉक्स में चाय ले जाने की ज़िद करती थी. जब टीवी पर कूकिंग ऑयल का विज्ञापन आता भाग कर किचन में जाती और प्लेट लेकर आ जाती कि टीवी में से पूड़ियां और पकौड़े निकालेंगे. वो बचपना था. अट्ठारह साल की उम्र में दुनिया जीत लेने वाला एहसास टीन-ऐज का जोश था. यानि अब तक सब नॉर्मल ही था. किसी को बताउंगी तो वो इन बातों से इत्तेफ़ाक रखेगा कि सबके साथ ऐसा ही होता है. फिर आज मेरा हर कदम, मेरी हर बात सबको खटकती क्युं है? बचपन में ज़्यादातर बच्चियां शादी के ज़िक्र पर शर्माकर बुदबुदाती हैं “मुझे शादी नहीं करनी.” उस वक्त सब हंस देते हैं. लेकिन जब यही बात पच्चीस साल की कोई लड़की कहती है तो उसे फुंकार समझा जाता है.

“तुम शादी कब करोगी?” ये सवाल हर बार एक अलग शक़्ल लिये मेरी चौखट पर घंटी बजाता है. जब दादी सर पर हाथ रखकर “बिटिया” कह कर पूछती हैं तो मैं दरवाज़ा खोलती हूं और कहती हूं, “दादी अभी तो बच्ची हूं, देखिये ना मेरा कद  सिर्फ़ पांच फ़ुट ही है” दादी मुस्कुराती हैं और बताती हैं “ बहनी, हम तेरह साल की थीं जब बिदा हो गयी थीं, हम तब चार फ़ुट की रहीं. तुम्हरे दादा पंद्रह साल के रहे, ओ वक़्त हमसे लम्बे थे, पांच फुट के रहे. फिर धीरे-धीरे हम छ: फुट की हो गयीं और वो छोटे ही रह गये” दादी के इस मज़ेदार किस्से के साथ बात का रुख घूम जाता. अपने से छोटी किसी लड़की की शादी में जाना भी एक चैलेंज है. पिछले महिने ज़रीन की छोटी बहन ज़ैनब का निकाह था. स्टेज पर जब उससे मिलने गयी तो कहने लगी “बाजी, अब आप भी निकाह पढ़वा ही लो.” मैं उसके चेहरे से भी बड़ी नत्थ को देखती रही जो बार-बार उसके गोटे वाले दुपट्टे की झालर में फंस रही थी. उसके पर्स से मैचिंग, कस्टम- मेड जूती ने मेरा ज़ायका इतना बिगाड़ दिया कि कबाब का लुत्फ़ भी नहीं उठा सकी. 

हर जगह बगावत का झंडा बुलंद करने से अच्छा होता है, बस बालकनी से झांक कर सवाल को रफ़ा-दफ़ा कर दो, जैसे किसी सहकर्मी के पूछने पर कह दो, अच्छा रिश्ता मिलेगा तो ज़रूर कर लूंगी. बैंगलोर से जब बड़ी बहन फोन करती है तो बिना लाग लपेट वाला जवाब देती हूं “पहले इतने पैसे हो जायें कि अपना घर खरीद सकूं, तब शादी पर गौर फ़रमाया जायेगा.” वो परेशान होकर कहती है “बहना, उसमें तो सदियां लग जायेंगी, क्या बुढ़ापे में शादी करेगी.”  मैं पलटकर पूछती हूं “शादी का जवानी से क्या लेना देना” तो वो कुछ ना कहना ही बेहतर समझती है.
हद तो आज हुई जब मेरे रेडियो प्रोग्राम के दौरान लिस्नर का मैसेज आया “ईश्वर से प्राथना करूंगी कि आपकी शादी जल्दी हो जाये” मानो मुझे कोई जानलेवा बीमारी हुई हो जिसे ठीक करने के लिये दुआ की ज़रूरत हो. चार शादी याफ़्ता सलमान रुश्दी ने कहा था, लड़कियां शादी इसलिए करती हैं क्युंकि उन्हें शादी का जोड़ा पहनने का शौक होता है. सोच रही हूं करीना ने तो कोई खास जोड़ा नहीं पहना था...हां, लेकिन उसके पास अपना घर खरीदने जितने पैसे ज़रूर होंगे.

Tuesday, 1 January 2013

क्युंकि तुम मेरी जैसी थीं…


तुम्हें अभी नहीं मरना था. मैं तुम्हारा नाम नहीं जानती. फ़र्क भी नहीं पड़ता क्युंकि नाम ना जानते हुए भी मैं सुनती हूं कि तुम मेरे जैसी थीं. ऐसा नहीं है कि तुम मेरे अकेले का दूसरा रूप थीं. पर असल में तुम उन लड़कियों का दूसरा रूप थीं जो आज सड़कों पर हैं. जिनकी माएं आज नारे लगा रही हैं. तुम पर लोगों ने इल्ज़ाम लगाए कि तुमने रात के वक्त घर से बाहर कदम निकाल कर गलती की. ये भी कहा कि तुम जैसी ना जाने कितनी लड़कियों के साथ बलात्कार होते हैं बल्कि तुम्हारे दर्द को दूसरी स्त्रियों के दर्द के साथ नापा-तौला भी गया. छत्तीसगढ़ में क्या-क्या होता है. सोनी सूरी पर कितने सितम हुए, उसके मुकाबले तुम पर हुए प्रहार कितने छोटे थे. गुजरात के दंगों में औरतों के साथ कितना अन्याय हुआ.

मेरी मां ये सभी कुछ न्यूज़ या बातचीत में सुनती है, पर वो तुमसे जुड़ी क्युंकि उसे तुममें मैं नज़र आती थी. मैंने वो सारी गलतियां की हैं जो तुमने कीं, फ़िल्म देखने बाहर जाना, देर रात तक घूमना, लड़के दोस्तों के साथ बसों में चक्कर लगाना. मां जानती है मैं ये हिमाकतें जारी रखूंगी. इसीलिए कहती है उसने कहां सोचा होगा ऐसा हादसा हो जाएगा, बच्ची हंसी-खुशी फ़िल्म देखकर निकली होगी जबतक तुम सफ़दरजंग में थीं मां कहती रही वो अस्पताल सही नहीं है, ये नहीं कि किसी प्राइवेट अस्पताल में रखते जब पता चला कि सिंगापुर चली गईं तो कहने लगी सरकार बड़ी चालाक है, सोच रही है बच्ची वहीं मर-खप जाएगी तो दिल्ली में बवाल कम होगा…लोग क्या बेवकूफ़ हैं...सब समझते हैं

दिल्ली की लड़कियां अभीजीत मुखर्जी के हिसाब से सजधज कर विरोध कर रही हैं. ‘डेंटिड-पेंटिड’ औरतों की क्या हैसीयत. वो तो डिस्को भी जा रही हैं, उन्हें कुछ कहने का अधिकार क्युं होना चाहिए, वो तो जैसा कि विश्व-प्रख्यात है ‘डम्ब ब्लॉन्ड’ हैं. फ़लां औरत के साथ बलात्कार इसलिए जायज़ है क्युंकि वो मॉडर्न है, उसका क्या कैरेक्टर. फ़लां के साथ इस लिए सही है क्युंकि वो दलित है, उसकी क्या हैसीयत, वो तो पवित्र हो गई जो उंच्च-जाति के लड़कों ने उसे नोच खाया. चालीस साल की महिला का बलात्कार यूं हुआ क्युंकि फ़िल्मों में आइटम गाने होते हैं और दो साल की बच्ची को इसलिए चीरकर कर गटर में फेंक दिया गया क्युंकि लड़कों की शादी नहीं हो रही तो कुंठित हो गए हैं. हर बलात्कार के पीछे एक सफ़ाई. कहां से आती है ये सोच, किसके मन में पनपते हैं ये ख्यालात. हमारे ही भाई हैं जो सड़क पर निकलते ही किसी लड़की को टक्कर मारे बिना सड़क पार नहीं कर पाते. हमारे ही पिता या चाचा हैं जो पचास की उम्र में स्कूल जाने वाली बच्चियों की मोज़ों वाली टांगे देखते हैं. किसी और दुनिया से नहीं आए ये लार टपकाने वाले आदमी. इसी समाज के हैं, मज़े की बात तो ये है कि हम इन्हें समाज के इज़्ज़तदार लोगों का दर्जा देते हैं. ये इज़्ज़तदार हैं क्युंकि इनकी बेटी घर से नहीं भागी. इनकी बहनों की शादी बीस की उम्र में कर दी गई. इनकी बीवियां ज़बान नहीं चलातीं और खिड़कियों में नज़र नहीं आतीं. इनकी इज़्ज़त इनके घर की औरतें संभालती हैं, उसके तले दबती चली जाती हैं. मां नहीं चाहती कि मैं अकेले ऐसा कोई बोझ उठाऊं जो उन्होंने खुद उठाया. इज़्ज़तदार घर की लड़कियों की तरह मुझे किसी कोने में लटका कर नहीं रखा गया. दिल्ली में रहने वाली लड़कियां हर रोज़ किस आज़ाब को सह कर घर लौटती हैं मां जानती है. उन्हीं माओं की तरह जो सड़कों पर हैं।

तुम्हारी मौत का सुनकर मां सुन्न हो गई, वैसे लगता है कि मां जानती थी यही होगा. शाम से कह रही थी, रुक-रुक कर कह रही थी लगता है…अब नहीं बचेगी…नन्ही सी जान को दिल का दौरा भी पड़ गया मैं समझती हूं मां की इस कदर तकलीफ़ की वजह क्या है, मां तुममें मुझे देखती है. मां को लगता है तुम बच जाती तो मेरा एक रूप ज़िन्दा होता. वो तुम्हें सांस लेते देखना चाहती थी क्युंकि वो मुझे मरता हुआ नहीं देख सकती. जब पता चला तुम्हारी रूह वेंटिलेटर के साथ से ज़्यादा देर खुश नहीं रही और आखिरकार शरीर को छोड़ चल दी. मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मां को बताऊं पर वो इतनी दफ़ा तुम्हारी खैरियत पूछ चुकी थी कि बताना पड़ा. अम्मी…वो मर गई मैंने कहा तो मां चुप हो गई, थोड़ी देर बाद बोली उसे नहीं मरना था, ठीक हो जाती…इन सब से ऊपर उठकर आगे बढ़ती, पढ़ती-लिखती, धीरे-धीरे सारी तकलीफ़ें भूल जाती…मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी, डाक्टर बनती फिर मां चुप हो गई और धीरे-धीरे कहती रही उसे नहीं मरना था..उसे नहीं मरना था.” मां का सदमा उस बेनाम लड़की से होते हुए मुझ तक आता है, मैं जी रही हूं, मां मुझसे जुड़ा सब कुछ ज़िन्दा चाहती है वो नहीं जानती असम का हाल, ना समझती है कश्मीरी पंडितों को, उसे तुम ज़िन्दा चाहिए क्युंकि तुम मेरी जैसी थीं. लापरवाह…बेपरवाह…