Wednesday, 27 August 2014

विज्ञापन कम्पनियों के रंगभेदी रवैये पर रोक


एक लड़की नौकरी के इन्टर्व्यू के लिए जाती है. उसका चुनाव सिर्फ़ इस वजह से नहीं होता क्यूंकि लड़की का रंग सांवला है. वो अपनी इस नाकामी से बहुत निराश होती है. तभी उसकी ज़िन्दगी में आशा की किरण बन कर आती है, वो फ़ेयरनेस क्रीम जिसके इस्तेमाल के कुछ रोज़ बाद ही आप गोरे हो जाते हैं. ये गोरापन कोई ऐसा वैसा गोरापन नहीं है, इस गोरेपन में आपका चेहरा ‘फ़्लोरोसेंट बल्ब’ की तरह चमकने लगता है. सो ये लड़की अब अपना ‘सीएफ़एल’ नुमा चेहरा लिए दोबारा इन्टर्व्यू के लिए जा पहुंचती है. लड़की के चेहरे से निकलते तेज के आगे नतमस्तक होने के लिए कम्पनी का मालिक अपनी कुर्सी से खड़ा हो जाता है. जब मालिक फ़िदा तो नौकरी आपकी मुट्ठी में.

एक लड़की गायिका बनना चाहती है. मगर किस्मत की मारी बेचारी सांवली है, अब अगर आपका रंग ही सांवला हो तो आप सुरीले कैसे हो सकते हैं. सो लड़की के पिता उसे चमत्कारी फ़ेयरनेस क्रीम लाकर देते हैं. बस फिर क्या, चेहरा लाइट बल्ब की तरह दमकने लगता है और सुर चहकने लगते हैं.  लड़की ‘स्टार सिंगर’ बन जाती है.

ऊपर लिखे दोनों ही किस्से किसी की भी असल ज़िन्दगी के हिस्से नहीं हैं. ये दोनों ही ‘ओवर द टॉप’ ऐड्वर्टाइज़िंग के नमूने हैं. कुछ साल पहले तक फ़ेयरनेस क्रीम के विज्ञापन विवाह या प्रेम केंद्रित होते थे. जैसे एक लड़की के सांवले होने की वजह से लड़के वालों ने रिश्ते से इन्कार कर दिया या एक लड़की किसी से प्रेम करती है मगर लड़के को दूसरी गोरी त्वचा वाली लड़की पसंद है. ऐसे में सात दिन के अन्दर रंग निखारिए और जीवन-साथी पा जाइए.

अब चूंकि समाज बदल रहा है और लड़कियां घर की चौखट लांघ रही हैं, तो कम्पनियों ने अपने ‘टार्गेट ग्रुप’ को लुभाने के पैंतरे बदल लिए हैं. बेशक ऐडवर्टाइंज़िंग में बदलाव कम्पनी के वित्त के लिए होते हैं, समाज के हित के लिए नहीं.

भारत में ब्यूटी प्रोडक्ट्स का बाज़ार 9000 करोड़ रुपयों से अधिक का है. इसमें फ़ेयरनेस क्रीम/ब्लीच का हिस्सा 3000 करोड़ से ज़्यादा का है. यही वजह है कि लॉ रियाल (L’Oreal) या नीविया (Nivea) जैसी बड़ी विदेशी कम्पनियां भी जब भारतीय बाज़ार में उतरती हैं, तो वो भी यहां की मार्केट के अनुसार अपनी-अपनी गोरेपन की डिब्बियां दुकानों में सजा देती हैं. आज बाज़ार में रंग निखारने के लिए फ़ेस क्रीम, बॉडी लोशन, फ़ेस वॉश के साथ ही अंडर-आर्म को गोरा बनाने के डियोडरंट तक मौजूद हैं. अंग्रेज़ी कहावत “टॉल, डार्क एंड हैंडसम” को “फ़ेयर एंड हैंडसम” में बदले की कवायद भी जारी है.

 

हर देश का इतिहास अपने संघर्ष की बुनियाद पर लिखा जाता है. पिछली सदी में दुनिया के एक बड़े हिस्से ने रंगभेद के संघर्ष को देखा और जिया. यही वजह है कि वक्त गुज़रने के साथ-साथ पश्चिमी और अफ़्रीकी देश रंग-भेद के मसले पर संवेदनशील हुए. हालांकि ये संवेदनशीलता दक्षिण-एशियाई देशों तक नहीं पहुंची, क्युंकि यहां धर्म और जाति ज़्यादा बड़ा मसला था. सो आज हमारा कानून धर्म और जाति के आधार पर हुए भेदभाव को लेकर सख्त है, वैसे अभी मन्ज़िल बहुत दूर है पर हमने चलना तो शुरू कर ही दिया है. धर्म या जाति की तरह रंग भी इन्सान पैदा होते हुए खुद नहीं चुनता, इन्सान धर्म बदल सकता है, आज के दौर में अपनी वर्ण व्यवस्था से बाहर निकलकर कोई दूसरा काम भी चुन सकता है. लेकिन प्रकृति ने आप पर जो रंग चढ़ाया है उसे उतारा या बदला नहीं जा सकता.   

 

फ़ेयरनेस प्रोडक्ट्स के विज्ञापन रंग भेद को बढ़ावा देते हैं. ये काले या सांवले रंग के लोगों के बीच हीन भावना भरकर उन्हें अपने उपभोक्ताओं में बदलने की कोशिश करते हैं. सेल्फ़-रेगुलेटरी संस्था ऐड्वर्टाइज़िंग स्टैन्डर्डस काउंसिल ऑफ़ इंडिया’ (ए.एस.सी.आई) की ‘कोड-बुक’ चैप्टर III 1 b में धर्म, जाति, नस्ल या रंग के आधार पर टिप्पणी करने की मनाही है पर ज़ाहिरी तौर पर विज्ञापन कम्पनियां लम्बे समय तक इसकी अनदेखी करती रही हैं. यही वजह है कि फ़ेयरनेस प्रोडक्ट्स ने त्वचा और स्वाभिमान के लिए हानिकारक होते हुए भी, बिना किसी संकोच के चारों तरफ़ पैर पसार लिए.

 

पिछले हफ़्ते ए.एस.सी.आई ने इन कम्पनियों के लिए खासतौर पर कुछ गाइडलाइंस लागू कीं. इनके अनुसार फ़ेयरनेस प्रोडक्ट्स के विज्ञापनों को कई बातों के लिए मना किया गया है, जैसे रंग के आधार पर किसी तरह का भेदभाव दिखाना. ढके हुए रंग के लोगों को निराश, नाकाम, नाखुश या ये दिखाना कि वो अपने रंग की वजह से किसी तरह के नुकसान में हैं. रंग के आधार पर लैंगिक भेदभाव. विज्ञापन में मॉडल के चेहरे पर उसके रंग की वजह से कोई नकारात्मक भाव दिखाना. साथ ही, काले या गोरे रंग को किसी खास समुदाय, जाति, व्यवसाय या नस्ल से जोड़ना. 

विज्ञापन खूबसूरती को बेहद बदसूरती के साथ स्टेरीओटाइप करते हैं. काले रंग को नाकामयाबी से जोड़ने का चलन, बिना मतलब ही गोरी त्वचा को कटघरे में खड़ा कर देता है.  कुछ इस तरह जैसे गोरी त्वचा के लोगों को सब कुछ सिर्फ़ उनके रंग की वजह से ही मिलता है, जीवन-साथी, प्रेमी, नौकरी हो या प्रोमोशन. हर इन्सान की ज़िन्दगी की लड़ाई अलग होती है, हर किसी का अपना रास्ता और संघर्ष होता है, हम किसी के सफ़र को सिर्फ़ उसके रंग-रूप से नहीं आंक सकते.  सामान्यीकरण ने न कभी समाज का भला किया है, न ही किसी व्यक्ति विशेष का.

Friday, 11 January 2013

शादी क्यूं करूं?




मैं शादी क्यूं करूं? क्या इसलिये कि सब कर रहे हैं? अगर ऐसा है तो सब धोखेबाज़ियां, जालसाज़ियां भी कर रहे हैं. तो आज से ही शुरु कर देती हूं. बड़ी खाला पिछले दिनों घर आई तो कह रही थीं “दुनिया की ज़रूरत है शादी.” मैंने कहा “दुनिया की ज़रूरत तो पट्रोल भी है, अब क्या कूंआ खोदने लगूं.” खाला चिढ़कर बड़बड़ाने लगीं “अरे, भई…कोई साथी तो होना चाहिये ना, पूरी पच्चीस की हो गयी हो” मैंने इतराते हुए खाला के कंधे में हाथ डाला “साथी की फ़िक्र क्युं करती हैं, बिटिया आपकी इतनी बुरी भी नहीं“ ये खाला के सब्र की इन्तेहा थी “सारा दिमाग पढ़ाई ने खराब किया है, अब तक मैं मैदान में उतर चुकी थी “लो, मानो जब आदम-हौआ ज़मीन पर आए तो अल्लाह ने साथ में काज़ी भी भेजा था.” 

मां बताती है, बचपन में मैं अपने टिफ़िन बॉक्स में चाय ले जाने की ज़िद करती थी. जब टीवी पर कूकिंग ऑयल का विज्ञापन आता भाग कर किचन में जाती और प्लेट लेकर आ जाती कि टीवी में से पूड़ियां और पकौड़े निकालेंगे. वो बचपना था. अट्ठारह साल की उम्र में दुनिया जीत लेने वाला एहसास टीन-ऐज का जोश था. यानि अब तक सब नॉर्मल ही था. किसी को बताउंगी तो वो इन बातों से इत्तेफ़ाक रखेगा कि सबके साथ ऐसा ही होता है. फिर आज मेरा हर कदम, मेरी हर बात सबको खटकती क्युं है? बचपन में ज़्यादातर बच्चियां शादी के ज़िक्र पर शर्माकर बुदबुदाती हैं “मुझे शादी नहीं करनी.” उस वक्त सब हंस देते हैं. लेकिन जब यही बात पच्चीस साल की कोई लड़की कहती है तो उसे फुंकार समझा जाता है.

“तुम शादी कब करोगी?” ये सवाल हर बार एक अलग शक़्ल लिये मेरी चौखट पर घंटी बजाता है. जब दादी सर पर हाथ रखकर “बिटिया” कह कर पूछती हैं तो मैं दरवाज़ा खोलती हूं और कहती हूं, “दादी अभी तो बच्ची हूं, देखिये ना मेरा कद  सिर्फ़ पांच फ़ुट ही है” दादी मुस्कुराती हैं और बताती हैं “ बहनी, हम तेरह साल की थीं जब बिदा हो गयी थीं, हम तब चार फ़ुट की रहीं. तुम्हरे दादा पंद्रह साल के रहे, ओ वक़्त हमसे लम्बे थे, पांच फुट के रहे. फिर धीरे-धीरे हम छ: फुट की हो गयीं और वो छोटे ही रह गये” दादी के इस मज़ेदार किस्से के साथ बात का रुख घूम जाता. अपने से छोटी किसी लड़की की शादी में जाना भी एक चैलेंज है. पिछले महिने ज़रीन की छोटी बहन ज़ैनब का निकाह था. स्टेज पर जब उससे मिलने गयी तो कहने लगी “बाजी, अब आप भी निकाह पढ़वा ही लो.” मैं उसके चेहरे से भी बड़ी नत्थ को देखती रही जो बार-बार उसके गोटे वाले दुपट्टे की झालर में फंस रही थी. उसके पर्स से मैचिंग, कस्टम- मेड जूती ने मेरा ज़ायका इतना बिगाड़ दिया कि कबाब का लुत्फ़ भी नहीं उठा सकी. 

हर जगह बगावत का झंडा बुलंद करने से अच्छा होता है, बस बालकनी से झांक कर सवाल को रफ़ा-दफ़ा कर दो, जैसे किसी सहकर्मी के पूछने पर कह दो, अच्छा रिश्ता मिलेगा तो ज़रूर कर लूंगी. बैंगलोर से जब बड़ी बहन फोन करती है तो बिना लाग लपेट वाला जवाब देती हूं “पहले इतने पैसे हो जायें कि अपना घर खरीद सकूं, तब शादी पर गौर फ़रमाया जायेगा.” वो परेशान होकर कहती है “बहना, उसमें तो सदियां लग जायेंगी, क्या बुढ़ापे में शादी करेगी.”  मैं पलटकर पूछती हूं “शादी का जवानी से क्या लेना देना” तो वो कुछ ना कहना ही बेहतर समझती है.
हद तो आज हुई जब मेरे रेडियो प्रोग्राम के दौरान लिस्नर का मैसेज आया “ईश्वर से प्राथना करूंगी कि आपकी शादी जल्दी हो जाये” मानो मुझे कोई जानलेवा बीमारी हुई हो जिसे ठीक करने के लिये दुआ की ज़रूरत हो. चार शादी याफ़्ता सलमान रुश्दी ने कहा था, लड़कियां शादी इसलिए करती हैं क्युंकि उन्हें शादी का जोड़ा पहनने का शौक होता है. सोच रही हूं करीना ने तो कोई खास जोड़ा नहीं पहना था...हां, लेकिन उसके पास अपना घर खरीदने जितने पैसे ज़रूर होंगे.

Tuesday, 1 January 2013

क्युंकि तुम मेरी जैसी थीं…


तुम्हें अभी नहीं मरना था. मैं तुम्हारा नाम नहीं जानती. फ़र्क भी नहीं पड़ता क्युंकि नाम ना जानते हुए भी मैं सुनती हूं कि तुम मेरे जैसी थीं. ऐसा नहीं है कि तुम मेरे अकेले का दूसरा रूप थीं. पर असल में तुम उन लड़कियों का दूसरा रूप थीं जो आज सड़कों पर हैं. जिनकी माएं आज नारे लगा रही हैं. तुम पर लोगों ने इल्ज़ाम लगाए कि तुमने रात के वक्त घर से बाहर कदम निकाल कर गलती की. ये भी कहा कि तुम जैसी ना जाने कितनी लड़कियों के साथ बलात्कार होते हैं बल्कि तुम्हारे दर्द को दूसरी स्त्रियों के दर्द के साथ नापा-तौला भी गया. छत्तीसगढ़ में क्या-क्या होता है. सोनी सूरी पर कितने सितम हुए, उसके मुकाबले तुम पर हुए प्रहार कितने छोटे थे. गुजरात के दंगों में औरतों के साथ कितना अन्याय हुआ.

मेरी मां ये सभी कुछ न्यूज़ या बातचीत में सुनती है, पर वो तुमसे जुड़ी क्युंकि उसे तुममें मैं नज़र आती थी. मैंने वो सारी गलतियां की हैं जो तुमने कीं, फ़िल्म देखने बाहर जाना, देर रात तक घूमना, लड़के दोस्तों के साथ बसों में चक्कर लगाना. मां जानती है मैं ये हिमाकतें जारी रखूंगी. इसीलिए कहती है उसने कहां सोचा होगा ऐसा हादसा हो जाएगा, बच्ची हंसी-खुशी फ़िल्म देखकर निकली होगी जबतक तुम सफ़दरजंग में थीं मां कहती रही वो अस्पताल सही नहीं है, ये नहीं कि किसी प्राइवेट अस्पताल में रखते जब पता चला कि सिंगापुर चली गईं तो कहने लगी सरकार बड़ी चालाक है, सोच रही है बच्ची वहीं मर-खप जाएगी तो दिल्ली में बवाल कम होगा…लोग क्या बेवकूफ़ हैं...सब समझते हैं

दिल्ली की लड़कियां अभीजीत मुखर्जी के हिसाब से सजधज कर विरोध कर रही हैं. ‘डेंटिड-पेंटिड’ औरतों की क्या हैसीयत. वो तो डिस्को भी जा रही हैं, उन्हें कुछ कहने का अधिकार क्युं होना चाहिए, वो तो जैसा कि विश्व-प्रख्यात है ‘डम्ब ब्लॉन्ड’ हैं. फ़लां औरत के साथ बलात्कार इसलिए जायज़ है क्युंकि वो मॉडर्न है, उसका क्या कैरेक्टर. फ़लां के साथ इस लिए सही है क्युंकि वो दलित है, उसकी क्या हैसीयत, वो तो पवित्र हो गई जो उंच्च-जाति के लड़कों ने उसे नोच खाया. चालीस साल की महिला का बलात्कार यूं हुआ क्युंकि फ़िल्मों में आइटम गाने होते हैं और दो साल की बच्ची को इसलिए चीरकर कर गटर में फेंक दिया गया क्युंकि लड़कों की शादी नहीं हो रही तो कुंठित हो गए हैं. हर बलात्कार के पीछे एक सफ़ाई. कहां से आती है ये सोच, किसके मन में पनपते हैं ये ख्यालात. हमारे ही भाई हैं जो सड़क पर निकलते ही किसी लड़की को टक्कर मारे बिना सड़क पार नहीं कर पाते. हमारे ही पिता या चाचा हैं जो पचास की उम्र में स्कूल जाने वाली बच्चियों की मोज़ों वाली टांगे देखते हैं. किसी और दुनिया से नहीं आए ये लार टपकाने वाले आदमी. इसी समाज के हैं, मज़े की बात तो ये है कि हम इन्हें समाज के इज़्ज़तदार लोगों का दर्जा देते हैं. ये इज़्ज़तदार हैं क्युंकि इनकी बेटी घर से नहीं भागी. इनकी बहनों की शादी बीस की उम्र में कर दी गई. इनकी बीवियां ज़बान नहीं चलातीं और खिड़कियों में नज़र नहीं आतीं. इनकी इज़्ज़त इनके घर की औरतें संभालती हैं, उसके तले दबती चली जाती हैं. मां नहीं चाहती कि मैं अकेले ऐसा कोई बोझ उठाऊं जो उन्होंने खुद उठाया. इज़्ज़तदार घर की लड़कियों की तरह मुझे किसी कोने में लटका कर नहीं रखा गया. दिल्ली में रहने वाली लड़कियां हर रोज़ किस आज़ाब को सह कर घर लौटती हैं मां जानती है. उन्हीं माओं की तरह जो सड़कों पर हैं।

तुम्हारी मौत का सुनकर मां सुन्न हो गई, वैसे लगता है कि मां जानती थी यही होगा. शाम से कह रही थी, रुक-रुक कर कह रही थी लगता है…अब नहीं बचेगी…नन्ही सी जान को दिल का दौरा भी पड़ गया मैं समझती हूं मां की इस कदर तकलीफ़ की वजह क्या है, मां तुममें मुझे देखती है. मां को लगता है तुम बच जाती तो मेरा एक रूप ज़िन्दा होता. वो तुम्हें सांस लेते देखना चाहती थी क्युंकि वो मुझे मरता हुआ नहीं देख सकती. जब पता चला तुम्हारी रूह वेंटिलेटर के साथ से ज़्यादा देर खुश नहीं रही और आखिरकार शरीर को छोड़ चल दी. मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मां को बताऊं पर वो इतनी दफ़ा तुम्हारी खैरियत पूछ चुकी थी कि बताना पड़ा. अम्मी…वो मर गई मैंने कहा तो मां चुप हो गई, थोड़ी देर बाद बोली उसे नहीं मरना था, ठीक हो जाती…इन सब से ऊपर उठकर आगे बढ़ती, पढ़ती-लिखती, धीरे-धीरे सारी तकलीफ़ें भूल जाती…मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी, डाक्टर बनती फिर मां चुप हो गई और धीरे-धीरे कहती रही उसे नहीं मरना था..उसे नहीं मरना था.” मां का सदमा उस बेनाम लड़की से होते हुए मुझ तक आता है, मैं जी रही हूं, मां मुझसे जुड़ा सब कुछ ज़िन्दा चाहती है वो नहीं जानती असम का हाल, ना समझती है कश्मीरी पंडितों को, उसे तुम ज़िन्दा चाहिए क्युंकि तुम मेरी जैसी थीं. लापरवाह…बेपरवाह…  

Wednesday, 26 December 2012

जब नियम की किताब एक होगी…



बलात्कार को लेकर तीन बातें सुनने में बहुत आती हैं. पहली, लड़कियों के कम कपड़ों की वजह से बलात्कार या छेड़-छाड़ होती है. ये एक ऐसा बयान है जो इस दर्जे का भी नहीं कि उसपर चर्चा की जा सके, क्योंकि हम बखूबी जानते हैं बलात्कार 6 साल की बच्ची का भी होता है और साठ साल की दादी की सूरत वाली बुज़ुर्ग महिला का भी. दूसरी, बलात्कार शहरों में होते हैं क्युंकि यहां लड़कियां घर से बाहर निकलती हैं, लेकिन हम ये भी जनते हैं कि बलात्कार या उत्पीड़न के अधिकतर मामले घर में मौजूद सदस्यों द्वारा ही अन्जाम दिए जाते हैं. तीसरी बात कम सुनने में आती है, वो है बलात्कार दबे-कुचले इलाकों में ज़्यादा होते हैं क्योंकि वहां मर्द के भीतर कुंठाएं होती हैं, जबकि ‘प्रोग्रेसिव’ समाज में लड़के-लड़कियां एक एक-दूसरे से घुले-मिले रहते हैं सो वहां ऐसा कम होता है. अगर हम न्यूयॉर्क को दिल्ली से ज़्यादा प्रोग्रेसिव और मॉडर्न मानते हैं तो ये जानकार हैरानी हो सकती है साल 2011 में जहां दिल्ली में 568 बलात्कार के केस दर्ज करवाए गए, वहीं न्यूयॉर्क में ये आंकड़ा 2752 को छूता है, लंडन में 3334 और अरसों तक बराबरी और हक के लिए लड़ने वाले नेल्सन मन्डेला के दक्षिण एफ़्रिका की प्रादेशिक राजधानी केपटाउन में साल 2011 में 64514 बलात्कार के केस दर्ज हुए.

नौकरी करने, पैसा कमाने, अपनी पसंद के कपड़े पहनने या शादी करने से अगर बराबरी और इज़्ज़त मिलती तो दुनिया के इन मशहूर शहरों में लड़कियों को कॉलेजों, अस्पतालों या सड़कों पर ज़ोर-ज़बर्दस्ती का सामना नहीं करना पड़ता. अपने पैरों पर खड़े होने का मतलब अगर बैंक-बैलेंस होता तो मशहूर पॉप स्टार रिहाना अपने बॉयफ़्रेंड क्रिस ब्राउन से लगातार पिटने के बाद, कम्प्लेंट करवाने के बाद, सज़ा दिलवाने के बाद फिर उसी के साथ हंसते मुस्कुराते हुए पार्टियों में नज़र नहीं आतीं. ये सूरते-हाल हमें साफ़-साफ़ कहती है तुम केवल एक शरीर हो, तुम अपने पति-प्रेमी से पिटोगी और फिर बाहों में भी भरोगी.”
बलात्कार एक ज़हनियत है, जो औरत को मर्द से कम आंकती है, जो उसे सिर्फ़ भोगने की वस्तू बनाती है. वही ज़हनियत जो कई पुलिस एस.एच.ओ से कहलवाती है बलात्कार में लड़की की मर्ज़ी शामिल होती है. वही ज़हनियत जो पढ़े-लिखे समाज में भी दहेज की परंपरा को बनाए हुए है, ये ज़हनियत घरेलू हिंसा को गांव हो या शहर, भारत हो या विदेश हवा देती रहती है. फ़र्क बस इतना है कि कोई साड़ी के पल्लू से चेहरे के निशान ढंकती है तो कोई काले चश्मे की शह लेती है.

मेरे पिछले ऑफ़िस में एक लड़की थी हर वक्त अपने काम में मगन रहती. उसका ऑफ़िस के एक साथी से प्रेम-संबंध था. एक दिन किसी ने दोनों को ऑफ़िस के एक हिस्से में चुंबन करते देख लिया. ज़ाहिर सी बात है फिर बॉस को तो पता चलना ही था. बॉस ने आनन-फ़ानन में उस लड़की को ऑफ़िस से निकाल दिया. मगर वो लड़का आज दो साल के बाद भी उसी कंपनी में सिर उठाकर काम कर रहा है. स्कूल के दिनों की बात है जब एक लड़की के माता-पिता को इसलिए तलब किया गया था क्योंकि उसे अपने जन्मदिन पर एक दोस्त ने गुलाब के फूल दिए थे. ज़ाहिर सी बात है यहां भी फूल देने वाले लड़के को टीचर ने खुद ही समझा-बुझा दिया था. जिस समाज में प्रेम संबंध से बढ़ी नज़दिकियों के लिए लड़की को दोषी समझा जाता है, बल्कि इसके लिए बिना सुनवाई किए सज़ा भी सुना दी जाती है. वहां उम्मीद करना कि रातोंरात कोई बदलाव आएगा और सदियों से चले आ रहे नियम बदल जाएंगे नादानी होगी. ऑफ़िस परिसर में अपने प्रेमी से नज़दिकियां बढ़ाना अगर गलत है तो उस जुर्म के सहभागी दोनों हुए, कच्ची उम्र में संभलने की सीख अगर फूल लेने वाली को मिलनी चाहिए तो फूल देने वाले को भी मिलनी चाहिए. औरत और मर्द होने के आधार पर समाज के नियम बदल जाना ही बलात्कार की नींव रखता है.

दिल्ली में हर साल मुम्बई के मुकाबले कितने अधिक बलात्कार के केस दर्ज होते हैं, इसपर रीसर्च की जा सकती है. गांव-देहात के छुपे कमरों में कितनी बच्चियां इन हालात के आगे आवाज़ किए बगैर घुटने टेक देती हैं, इसपर बहस सुनी जा सकती है या काश दामिनी बस की जगह द्वारका को जाने वाले मेट्रो ले लेती, सोचकर मन में उठी टीस पर छटपटाया जा सकता है। पर सवाल और जवाब अभी भी वही रहेंगे, इन्सान के लिए लिंग, जाति, धर्म या रंग के आधार पर बने अलग-अलग नियमों ने वक्त-वक्त पर सड़कों पर प्रदर्शन करवाए हैं, बसें जलवाई हैं और लाठियां बरसाई हैं. बदलाव की लहर को स्कूली किताबों से गुज़रते हुए, घरों के ड्रॉइंग रूम में चाय-पानी के वक्त रुकना होगा. मां-बाप जब बेटे और बेटी को अपनी राय रखने का बराबर मौका देंगे. भाई देखेगा कि उसकी बहन सिर्फ़ बात-बात पर डांट खाने के लिए नहीं है. बेटा देखेगा कि उसकी मां का अपना वुजूद है. वो जो नौकरी से आने के बाद सीधा किचन में नहीं घुस जाती, वो जो ऑफ़िस जाने से पहले अकेले खड़े होकर पूरे घर का खाना नहीं बनाती. जब औरत को आधुनिकता का लिबास उढ़ाकर उसके कमाए पैसे और जिस्म पर अधिकार नहीं जमाया जाएगा. 
बलात्कार के ऊपर जाते आंकड़े तब थमेंगे जब समाज में ये सोच विकसित हो सके कि बलात्कार शारिरिक उत्पीड़न से ज़्यादा कुछ भी नहीं. इससे कोई इज़्ज़त-विज़्ज़त नहीं जाती. जब गर्मियों के मौसम में आदमी के शॉर्ट्स पहने को आराम और औरत के शॉर्ट्स पहनने को फ़ैशन का नाम ना दिया जाए. जब आदमी का सेहतमंद होना और औरत का पतला-दुबला होना खूबसूरती का पैमाना ना हो. जब एक ही नियमों की किताब से हम पढ़ना और पढ़ाना सीख जाएं।  

Wednesday, 8 August 2012

क्यूं घुटती हैं फ़िज़ाएं


ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपी ‘नेशनल स्टडी ऑफ़ डेथ (इंडिया)’ 2010 के अनुसार एक पढ़े लिखे मर्द में आत्महत्या करने की गुंजाइश 46 प्रतिशत होती है. वहीं एक पढ़ी-लिखी महिला के लिये ये गुंजाइश बढ़ कर 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है. भारत में एक बच्ची के लिए घर से बाहर निकल कर स्कूल तक जाने का रास्ता कई सवालों और तानों को चीरकर निकलता है. कॉलेज तक पहुंचते-पहुंचते ज़्यादातर घरवालों की आज़ाद ख्याली पस्त हो जाती है. वो बच्ची से युवती बनी अपनी बेटी के सीने पर दुपट्टा डालकर उसे सिलाई-कढ़ाई में जीने की कला सिखाने लगते हैं. जो युवती सुई-धागों को पारकर युनिवर्सिटी के मैदान तक पहुंचती है वो प्रगतिशील मानी जाती है. 2009-2010 की कैटलिस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक जहां ग्रामीण इलाकों में पैसे कमाने वाली महिलाएं 26 प्रतिशत हैं वहीं शहरों में ये तादाद 14 प्रतिशत पर ठहर जाती है. यानि उच्च शिक्षा के बावजूद मुट्ठीभर महिलाएं ही आत्मनिर्भरता की तरफ़ कदम बढ़ा पाती हैं. बाकि बची महिलाओं की प्रगतिशीलता चूल्हे के धुंए के साथ उड़ जाती है.

मर्दों की इस दुनिया में औरत की हैसियत बदबू करती फ़िज़ा की लाश जैसी है. जिसके करीब जाने के लिए नाक को कपड़े से ढंकना पड़ता है. औरत का अस्तित्व गीतिका के ख्वाबों जैसा है जिसकी उड़ान कोई और तय करता है. रंग-बिरंगी, शोख़ और बेबाक ज़िंदगी जीने के बावजूद क्यूं एक औरत को अकेलापन चुनना पड़ता है. ऊंचे ओहदे तक पहुंचने के बावजूद ऐसा क्या है जो एक औरत ज़िंदगी की गोद में बेबस महसूस करने लगती है. मौत ही आखिरी रास्ता क्यों बचता है. विवेका बाबाजी, नफ़ीसा जोसेफ़ या कुलजीत रंधावा फ़ैशन जगत के झिलमिलाते सितारे थे, पैसा, शोहरत और आलिशान पोशाकों ने एक वक्त पर ज़िन्दगी को चमकदार बनाया हुआ था. रैंप पर चलते हुए इनकी चाल में वो शान होती जो हार को रास्ता बदने पर मज़बूर कर दे. लेकिन रैंप की वो अकड़ ज़िंदगी में क्यूं नहीं उतर सकी. करियर की ढलान के साथ ये खुद भी क्यूं ढल गईं.

एक आम राय है कि चकाचौंध आखिर अंधा ही करती है. लेकिन फ़िज़ा तो एक वकील थी. और गीतिका ऐयर-होस्टेस. ना तो मोटी-मोटी किताबों को पढ़कर काले कोट तक पहुंचना आसान है और ना ही ऊंची-ऊंची सैंडल पहनकर दिन भर खड़े रह कर मुस्कुराते हुए चाय परोसना आसान है. जहां एक को करते हुए सिर दुखता है, वहीं दूसरे से कमर. इन आत्महत्याओं से कवयित्री मधुमिता शुक्ला और गायिका भंवरी देवी की हत्या की डोर भी जुड़ती हुई दिखती है.

मर्दों का बनाया समाज औरत की आज़ादी की सीमा निर्धारित करता है. वो स्त्रीवाद के नाम पर औरत को उसके घर से बाहर तो निकाल लेता है लेकिन अपने घर में जगह नहीं देता. एक स्त्री को बचपन से ही निर्भरता की ट्रेनिंग दी जाती है. उसे चलना नहीं, घिसटना सिखाया जाता है. किताबों के बीच भी उसे चावल की किस्में सिखाई जाती हैं. होम-वर्क के साथ ही उसे भाई की किताबों पर कवर चढ़ाना याद करवाया जाता है. सुबह अपनी यूनिफ़ॉर्म के साथ वो भाई की स्कूल की शर्ट और पिता की टाई भी इस्त्री करती है. ट्यूशन जाने से पहले उसे किचन के बर्तन और भाई का कमरा साफ़ करना होता है. खेल में भाई उसे मार सकता है लेकिन उसे हंसते हुए बात को टालना होगा क्युंकि उसे सिखाया गया है कि भाई तुमसे प्यार करता है. हालांकि वो खुद प्यार में दो-चार मुक्के अपने भाई को नहीं रसीद कर सकती. क्युंकि उसके बाद प्यारा भाई उसका भुरता बना देगा. पति परमेश्वर है तो कॉलेज में बना दोस्त भी उसी कैटेगरी का ट्रीट्मेंट चाहता है. बचपन से पिलाई गई घुट्टी कितना असर करती है अब दिखेगा. दोस्त की ऐंठ वैसी ही जैसी पिता की मां पर देखती है. इससे क्यों बात की, उसकी तरफ़ क्यों देखा. बचपन में भाई का होमवर्क करती थी. अब परमेश्वर-दोस्त के असाइमेंट बनाने लगी. उसने देखा बचपन की सीख बिल्कुल सटीक है. रिश्ते निभाने के लिए उसे किनारे खड़े होना होगा. केंद्र में हमेशा कोई पुरुष होना ही चाहिए. कभी भाई, कभी पिता, कभी परमेश्वर-दोस्त, कभी पति. वहीं एक मर्द को ये समाज बचपन से ही शोषक बनना सिखाता है. हम अपने बेटों को ‘गोपाल कांडा’ बना रहे हैं. जिसके लिए औरत अपने घर से सिर्फ़ मर्दों का दिल बहलाने के लिए निकलती है.

एक स्त्री का अकेलापन पुरुष के अकेलेपन से बेहद अलग होता है. स्त्री को एक साथी चाहिए ताकि वो उस साथी की परवाह कर सके. किसी का ख्याल रख सके. उस किसी के सिर पर हाथ रखकर उसकी बंद होती आंखें देख सके. अब चाहे वो कितने भी ऊंचे ओहदे पर हो या उसके अकाउंट में कितना भी पैसा हो. वो इन सब के बल पर अपना ख्याल रखवाने के लिए नौकर तो रख सकती है लेकिन ऐसा साथी नहीं ढ़ूंढ़ सकती जिसके लिए खुद उसके मन में परवाह हो. समाज में पुरुष हमेशा संपूर्ण और निश्छल रहता है. फ़िज़ा उर्फ़ अनुराधा चांद मोहम्मद उर्फ़ चन्द्रमोहन से ये जानते हुए शादी करती है कि उसने अपनी पहली पत्नी को नहीं छोड़ा. वहीं चंद्रमोहन की पहली पत्नी भी फ़िज़ा और उसकी शादी की बात जानते हुए उसे फिर से अपना लेती है. हिसार के बिश्नोई मंदिर में पूजा-पाठ कर के चांद मोहम्मद को फिर से चंद्र मोहन बना लिया जाता है. 2007 में कोर्ट, गर्भवती मधुमिता शुक्ला की हत्या करवाने के मामले में उसके प्रेमी अमरमणी त्रिपाठी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाती है. और 2007 के उत्तर प्रदेश असेंबली इलेक्शन में वही अमरमणी त्रिपाठी महाराजगंज डिस्ट्रिक्ट से सीट जीतता है.

औरत के लिए वापसी का कोई दरवाज़ा नहीं है. उसकी गलतियों पर ना तो उसे समाज माफ़ करता है और ना ही खुद उसके अपने घर वाले. एक बार चौखट लांगने के बाद वो लौट नहीं सकती. शायद यही वजह है कि दुनिया जीतने के बाद भी वो खुद को हारा हुआ ही महसूस करती है. ज़िन्दगी की नींव हमारे सही-गलत फ़ैसलों पर रखी जाती है. लेकिन औरत को गलत फ़ैसले करने के बाद फिर से एक नई शुरुआत करने का हक नहीं है. जब सामने का रास्ता अंधकारमय हो और पीछे का किवाड़ अंदर से बंद हो तो फ़िज़ाएं घुटने लगती हैं.

Friday, 25 May 2012

गली-गली चोर है



मेरी मां की एक सहेली है. किसी भी मध्यवर्गीय हिन्दुस्तानी औरत की तरह मेरी मां की उस सहेली को भी धार्मिक कर्मकांड बहुत सुहाते हैं. उनकी बैचैन ज़िन्दगी बच्चों के दिन-रात परेशान करने, एक-एक पैसे का हिसाब रखने और पति के हर वक्त के गुस्से के बीच गुज़र रही है. ऐसे में उनके पास शांति के दो ही रास्ते हैं. एक तो औरत को साज़िशों का पिटारा बताने वाले टीवी सीरियल या फिर पूजा-पाठ को सुख का रास्ता बताने वाले मौलाना. अपने पति के दिमाग को ठंडा रखने और अपने बच्चों के परीक्षाओं में अच्छे नम्बर लाने की उम्मीद में वो मौलानाओं को झाड़-फूंक के लिए पैसे देती रहती हैं. अक्सर ही उन्हें अपने बेटे के गले में कोई नया ताबीज़ पहनाते हुए या चादर के नीचे मौलाना की दी हुई चीनी बिछाते हुए देखा जा सकता है. पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ कि उनके धार्मिक विश्वास को बहुत बड़ा झटका लगा.

तकरीबन पंद्रह दिन पहले की बात है, उनके पति ने घर पर एक मौलाना को बुलाया. शाहीन बाग़ (दिल्ली) में रहने वाले ये मौलाना इनके घर अक्सर आते रहते थे. उस दिन घर पर सिर्फ़ पति-पत्नी थे. दोपहर का वक्त था और बच्चे कहीं बाहर गए हुए थे. मौलाना ने घर में घुसते ही ऊंची आवाज़ में कहा “तुम्हारी पत्नी के ऊपर बुरा साया है, इसके अन्दर गंदगी घुस गई है जिसे बाहर निकालना होगा.” पत्नी घबरा गई और पति की तरफ़ देखने लगी. ऐसे में उस मौलाना ने पति की तरफ़ इशारा करके कहा कि तुम किचन में जाओ और थोड़ा सा आटा गूंध कर लाओ. मैं तुम्हारी पत्नी को ठीक करूंगा. उसके बाद उस मौलाना ने पत्नी को सामने एक कुर्सी पर बिठा लिया और उसके चहरे, गले और फिर सीने पर हाथ चलाने लगा. पत्नी अपने ऊपर बुरे साए की बात सुन कर पहले ही घबराई हुई थी और फिर मौलाना के इस तरह की हरकत से बिल्कुल रुंहासी हो गई. मौलाना की हिम्मत खुल गई और वो कुछ और करने के लिए आगे बढ़ने लगा, ऐसे में वो झट से खड़ी हुईं और उसे पीछे हटने के लिए कहा. तब तक उनके पति कमरे में आ चुके थे और हालात कुछ-कुछ समझ गये थे. मौलाना के जाने के बाद पति ने पत्नी से सवाल-जवाब शुरु किए जैसे उसके तुम्हारे साथ क्या किया, कहां-कहां छुआ और ये कि अगर उसने तुम्हें सीने पर हाथ लगाया है तो मैं तुम्हें तलाक़ दे दूंगा. पत्नी ने डर से अपने पति को एक लफ़्ज़ भी नहीं कहा और इतनी बड़ी बात चुपचाप सह गई. मेरी मां को ये सब बताते हुए वो बुरी तरह रो रही थीं और कह रही थीं कि मैं अब नरक में जाउंगी, मैं अपवित्र हो गई हूं.

मां को अपनी सहेली के आंसुओं में लाचारी दिखी, लेकिन मुझे उन आसुंओ में दो सवाल चमकते नज़र आए. ये कैसी व्यवस्था है जो पीड़ित को दोषी बना देती है. हमारा समाज बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामलों से इस तरह पेश आता है जिसमें अपराधी गर्व का पात्र बनता है. एक आदमी को ये गर्व से कहते सुना जा सकता है कि मैंने तो अपनी जवानी के दिनों में बहुत सी लड़कियां छेड़ीं. आज होने वाले हर अपराध को यह कह कर पल्ला झाड़ा जा सकता है कि कलयुग में पाप का वास रहेगा. लेकिन ये कोई आज की कहानी नहीं है. हमारे पुराणों में अहल्या बस्ती है. जिसके शरीर को इन्द्र ने छल से हासिल किया. इन्द्र को स्वर्ग का देवता माना जाता है, अगर स्वर्ग का शासक ऐसा है तो बेशक स्वर्ग किसी स्त्री के लिए सुरक्षित नहीं होगा. खैर, उस समय गौतम महर्षि ने अहल्या को शाप देकर पत्थर का बना दिया था. अर्थात उन्होंने अहल्या को त्याग दिया था. सतयुग और कलयुग में फ़र्क कहां है. आज भी जिस्म पर बात आए तो औरत की गलती मान कर उसे तलाक दे दिया जाता है और उस समय भी औरत को इन्सान नहीं खाने की चीज़ समझा जाता था जिसे अगर जूठा कर दिया जाए तो खा नहीं सकते.

इस घटना ने एक और सवाल उठाया है और वो ये है कि हम टीवी पर आने वाले निर्मल बाबा पर शोर मचाते हैं लेकिन गली-गली में बैठे ऐसे हज़ारों ठगों को नज़र अन्दाज़ क्यूं कर देते हैं. हमारे विवेक पर मिट्टी डालने का काम कोई एक खास बहरूपिया नहीं कर रहा बल्कि छोटे-बड़े स्तर पर आज हर मौहल्ले में ऐसे ढोंगियों ने लूट मचाई हुई है. अगर आज शाहीन बाग़ के उस मौलाना के खिलाफ़ कोई आवाज़ उठाए तो धर्म पर हमले का हावाला देकर, कई गुट खतरनाक हालात पैदा कर सकते हैं. किसी भी अच्छे या बुरे काम की शुरुआत एक छोटे क़दम से ही होती है. अगर हम एक अच्छे काम को उसके शुरुआती दौर में ना सराहें तो मुमकिन है कि वो जल्दी सांस तोड़ दे. उसी तरह अगर हम गलत क़दमों को शुरु में ही ना रोकें तो वो बढ़ते चले जाएंगे, हम पर चढ़ते चले जाएंगे. सौ-दो सौ रुपए लेकर घर में सुख-शांति का दावा करने वाले और सौ- दो सौ करोड़ का चैनल चलाने वाले, ’ऑनलाइन’ पैसा मंगाने वाले बाबाओं में ज़्यादा फ़र्क नहीं है. बस इतना कि एक गली में गुंडा-गर्दी करने वाला मवाली है और एक ए.सी में बैठकर ड्र्ग डीलींग करता डॉन.

सबसे बड़ी व्यथा ये है कि औरत कमज़ोर है इसलिए किसी गैर के छूने से तलाक़ के लायक हो जाती है. लेकिन ऐसे कपटी बाबाओं और मौलानाओं के पीछे खड़ी भीड़ के डर से हम उनपर उंगली उठाने से भी डरते हैं.

Thursday, 24 May 2012

मॉर्डन भारत का पिछड़ापन




भारतीय समाज में बलात्कार या शारिरिक उत्पीड़न के मामलों में औरत को दोषी करार देने का रवैया बहुत पुराना है. ये वही देश है जहां अहल्या को इन्द्र की वासना के कारण पत्थर बनने का शाप दिया गया. इसी समाज में बलात्कार पीड़ित फांसी की रस्सी गले में डाल कर, बेगुनाह होते हुए भी गुनहगार बन जाता है. यही वो मुल्क है जहां नाबालिग बच्ची का शोषण होने की खबर आने पर उसकी पढ़ाई-लिखाई बंद करवा दी जाती है. इसी महान देश के भरे बाज़ारों में शरीफ़ मर्द एक औरत को वैश्या कह उसके कपड़े नोचते हैं. और इसी मुल्क में माल्या परिवार के होनहार, पढ़े-लिखे, ऊंचे तबके वाले सिद्धार्थ अपनी आईपीएल टीम के एक खिलाड़ी का पक्ष लेते हुए एक स्त्री को ‘कैरक्टर सर्टीफिकेट’ देते हुए फ़ेल करते हैं.

ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ‘ल्यूक पॉमर्शबैक’ आईपीएल में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के लिए खेलते हैं, पिछले दिनों एक अमरीकी महिला ने उनके खिलाफ़ पुलिस में शारीरिक उत्पीड़न का मामला दर्ज करवाया. उस महिला के अनुसार ल्यूक पॉमर्शबैक मैच के बाद होटल के उनके कमरे तक आए जहां उन्होंने छेड़छाड़ की और साथ ही कमरे में मौजूद उनके मंगेतर के साथ मारपीट भी की. वैसे तो सही-गलत का फ़ैसला कानून करेगा लेकिन जैसा कि हमारे समाज में होता आया है, किसी भी बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामले में कानूनी लड़ाई से पहले ही स्त्री को दोषी करार दे दिया जाता है. सिद्धार्थ माल्या की पढ़ाई भले ही विदेशी हो, उनकी भाषा भले ही विलायती हो मगर उनके भीतर एक हिन्दुस्तानी मर्द बैठा है. उनके पिता के दुनियाभर में खरीदे हुए बहुत से बंगले ज़रूर हैं लेकिन उनके अन्दर सिर्फ़ एक ही समाज है, ये समाज वही है जो स्त्री को ‘अच्छी पत्नी’ बनने की सलाह देता है.

सिद्धार्थ माल्या ने इस घटना के बाद एक ट्वीट किया था जिसके तहत वो अमरीकी महिला अपने मंगेतर के साथ होते हुए भी उनपर डोरे डाल रही थी, उस महिला ने सिद्धार्थ से उनका ‘ब्लैकबेरी मैसेंजर पिन’ मांगा था और उसका बर्ताव एक होने वाली पत्नी जैसा नहीं था. हमारे समाज में ये माप-दंड तय हैं कि एक पत्नी का बर्ताव कैसा होना चाहिए, उसे कितने कदम चलना चाहिये, किसी पराए मर्द से कितनी बात करनी चाहिए या कितना और कैसे हंसना चाहिये. तथाकथित मॉडर्न हिंदुस्तानी समाज में ऐसी सोच का पनपना दिखाता है कि ऑक्सफ़ॉर्ड, हॉवर्ड या फिर डॉलर में पैसे लेने वाली फ़र्ज़ी विदेशी यूनिवर्सिटियों से डिग्री ले लेने से किसी की ज़हनियत नहीं खुल जाती. ना ही ‘अरमानी’ और ‘वरसाचे’ के कपड़े पहनने से कोई अपना मूल स्वभाव छुपा सकता है. स्त्री का संघर्ष अभी चल रहा है, हर तबका अपने तरीके से उसे टांग पकड़ कर नीचे खींचेगा. ये मान लेना भूल होगी कि अमीर और तथाकथित ’एलीट’ समाज में स्त्री का कोई अस्तित्व है. अगर आपके पड़ोस वाले घर की लड़की बालकनी में ज़्यादा वक्त बिताती है तो वो मौहल्ले की ‘रंभा’ बन जाती है, वहीं अगर कोई रईस तबके की लड़की अपने मंगेतर के साथ होते हुए भी किसी ‘पराए’ मर्द से ‘ब्लैकबैरी मैसेंजर पिन’ मांगती है तो वो ’वाइफ़ मटीरिअल’ नहीं कहलाती. ये दोनों ही मामले अलग-अलग समाज के ज़रूर हैं पर इनके पीछे आधार एक ही है. स्त्री का एक लगा-बंधा, पुरुषों द्वारा तय किया कैरक्टर होता है. बीवी हो तो शर्मीली हो, बहन हो तो कहना सुनती हो, मां हो तो त्याग की देवी हो. प्रेमिका अपनी है तो बाइक पर चढ़ना, पार्क में बैठना सही, दोस्त की है तो चालू कहलाएगी. अगर मान लिया जाए कि वो अमरीकी लड़की सिद्धार्थ के साथ ’फ़्लर्ट’ कर रही थी तो क्या इसका ये मतलब हुआ कि वो एक अच्छी बीवी बनने लायक नहीं है. लेकिन सिद्धार्थ जिस विदेशी माहौल में पले-बढ़े हैं वहां तो ‘फ़्लर्ट’ करने, ‘ब्लाइंड डेट’ पर जाने या फिर किसी लड़की के आगे बढ़ कर फोन नंबर मांगने तक को बुरा नहीं समझा जाता. तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि ये उदारवादी सोच खोखली है. सिद्धार्थ के इस बयान के हिसाब से तो हर साल ‘किंगफ़िशर कैलेंडर’ में छपने वाली कोई भी लड़की शादी के लायक नहीं है.

आधुनिकता का लिहाफ़ ओढ़ने वाले एलीट समाज के भीतर छुपी दकियानूस बू वक्त-वक्त पर पिछड़े समाज तक पहुंचती रहती है. ऐसे में पिछड़ेपन के समर्थक सीना चौड़ा कर के यही कहते हैं “ऐश्वर्या राय हॉलीवुड चली गयी, फिर भी मंगलिक थी तो पेड़ के फेरे लिए ना, कुछ भी कर लो रहोगी तो लड़की ही.”  असल में हम एक बेहद ‘कनफ़्यूज़ड’ दौर से गुज़र रहे हैं, औरत की आज़ादी का राग अलापते हुए उसे लोहे की ज़ंजीरों से निकाल कर, चांदी की हथकड़ियां पहना रहे हैं. जहां अब तक संघर्ष परदे और घूंघट से था, वहीं अब मिनी स्कर्ट और बिकीनी से भी निपटना है. कमर चौबिस इन्च से ज़्यादा नहीं, गले पर ‘कॉलर बोन’ और चार इन्च की पेंसिल हील की ज़बर्दस्ती ने इसी आधुनिक समाज की स्त्री को कई लाइलाज जोड़ों की बीमारी और पीठ दर्द सौंपा है. स्त्री-विमर्श का ढोल पीटने वालों को अब सिर्फ़ चारदिवारी पर सवाल नहीं उठाने बल्कि ‘स्लट वॉक’ का समर्थन करने वालों से भी पूछना है कि क्या हंसी-ठहाके लगाते हुए टोरॉंटो की नकल कर लेना काफ़ी है. क्या कैनेडा की स्त्री की आज़ादी की लड़ाई और एक भारतीय स्त्री के स्वावलंबी होने के संघर्ष का रास्ता एक ही होगा.

हम दोहरी मार झेल रहे हैं. हमें एक सड़े-गले समाज में रहते हुए खुली हवा में सांस लेने का नाटक करना है. इन हालात में खुद को आज़ाद ख्याल साबित करने के लिए छोटे कपड़े पहनने की मजबूरी वैसी ही है, जैसे पवित्रता साबित करने के लिए साड़ी पहनना. ऐसे आधुनिक समाज से स्त्री का कोई भला नहीं होने वाला जहां शॉर्ट-टॉप तो पहना जा सकता है लेकिन लॉंग मगंलसूत्र के साथ.